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गांधीजी के आंदोलनों के कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. चंपारण (1917) पहला सत्याग्रह था,
- 2. खेड़ा कर माफी से संबंधित था,
- 3. अहमदाबाद मिल हड़ताल 1918 में हुई थी।
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Detailed Explanation
तीनों कथन गांधीजी के इन आंदोलनों के बारे में सही हैं।
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 143' (Article 143) के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय के 'सलाहकार क्षेत्राधिकार' (Advisory Jurisdiction) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राष्ट्रपति को यह शक्ति प्राप्त है कि वह कानून या तथ्य के किसी ऐसे प्रश्न पर, जो सार्वजनिक महत्व का हो, उच्चतम न्यायालय की राय मांग सकता है, और उच्चतम न्यायालय के लिए राष्ट्रपति द्वारा भेजे गए ऐसे किसी भी प्रश्न पर अपनी राय देना संवैधानिक रूप से अनिवार्य (Compulsory) होता है।
2. यदि राष्ट्रपति द्वारा अनुच्छेद 143 के तहत कोई मामला उच्चतम न्यायालय को परामर्श के लिए भेजा जाता है, तो न्यायालय को इस पर विचार करने के लिए कम से कम 5 (पाँच) न्यायाधीशों की संविधान पीठ (Constitution Bench) का गठन करना अनिवार्य होता है।
3. उच्चतम न्यायालय द्वारा सलाहकार क्षेत्राधिकार के अंतर्गत दी गई सलाह (Advice) राष्ट्रपति के लिए किसी भी स्थिति में बाध्यकारी नहीं होती है, और न ही यह सलाह भारतीय न्यायिक मिसाल (Judicial Precedent) के रूप में अन्य अदालतों के लिए बाच्य होती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के 'मूल अधिकार' (Fundamental Rights) और 'संविधान की संशोधन शक्ति' के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. 'गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य (1967)' मामले में उच्चतम न्यायालय की 11-न्यायाधीशों की पीठ ने यह निर्णय दिया था कि संसद को मौलिक अधिकारों में संशोधन करने की कोई शक्ति प्राप्त नहीं है, क्योंकि संविधान का अनुच्छेद 13(2) 'विधि' शब्द के अंतर्गत संविधान संशोधन अधिनियमों को भी शामिल करता है।
2. चौबीसवां संविधान संशोधन अधिनियम, 1971 द्वारा संसद ने अनुच्छेद 13 और अनुच्छेद 368 में संशोधन करते हुए यह स्पष्ट कर दिया कि अनुच्छेद 368 के तहत किया गया संविधान संशोधन अनुच्छेद 13 के अर्थ के अंतर्गत कोई 'विधि' (Law) नहीं है, जिससे संसद को मूल अधिकारों सहित संविधान के किसी भी हिस्से में संशोधन करने की असीमित शक्ति मिल गई।
3. 'केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973)' मामले में उच्चतम न्यायालय ने 24वें संविधान संशोधन की संवैधानिक वैधता को तो बरकरार रखा, किंतु साथ ही 'न्यायिक समीक्षा' और 'संविधान के बुनियादी ढाँचे (Basic Structure)' के सिद्धांत को प्रतिपादित करते हुए यह स्पष्ट किया कि संसद अनुच्छेद 368 के तहत मौलिक अधिकारों में संशोधन तो कर सकती है, किंतु संविधान के मूल स्वरूप को नष्ट नहीं कर सकती।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 124' और 'अनुच्छेद 217' के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति, 'कॉलेजियम प्रणाली' (Collegium System) तथा इससे संबंधित न्यायिक निर्णयों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के मूल पाठ में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति के संबंध में 'कॉलेजियम' शब्द का उल्लेख नहीं था, और यह प्रणाली वर्ष 1993 में 'द्वितीय न्यायाधीश मामला (Supreme Court Advocates-on-Record Association बनाम भारत संघ)' के न्यायिक निर्णय के माध्यम से अस्तित्व में आई, जिसके तहत भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) और उनके चार वरिष्ठतम सहयोगियों का कॉलेजियम न्यायाधीशों की नियुक्ति और स्थानांतरण पर अंतिम निर्णय लेता है।
2. 'तृतीय न्यायाधीश मामला (1998)' में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए राष्ट्रपति के परामर्श (Article 143 के अंतर्गत) के उत्तर में यह स्पष्ट किया गया कि कॉलेजियम में CJI के अतिरिक्त केवल दो वरिष्ठतम न्यायाधीशों का होना अनिवार्य है, और यदि कॉलेजियम के दो न्यायाधीश भी किसी नाम पर लिखित आपत्ति जता देते हैं, तो CJI उस नाम की सिफारिश सरकार को नहीं भेज सकते हैं।
3. 99वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2014 और 'राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग अधिनियम, 2014' को 'सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन बनाम भारत संघ (2015)' मामले में सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ द्वारा असंवैधानिक घोषित कर दिया गया, क्योंकि न्यायालय ने यह माना कि यह आयोग न्यायपालिका की स्वतंत्रता (Independence of the Judiciary) का उल्लंघन करता है जो संविधान के 'मूल ढांचे' (Basic Structure) का एक अभिन्न हिस्सा है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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