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भारतीय संविधान के 'मूल अधिकार' (Fundamental Rights) और 'संविधान की संशोधन शक्ति' के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. 'गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य (1967)' मामले में उच्चतम न्यायालय की 11-न्यायाधीशों की पीठ ने यह निर्णय दिया था कि संसद को मौलिक अधिकारों में संशोधन करने की कोई शक्ति प्राप्त नहीं है, क्योंकि संविधान का अनुच्छेद 13(2) 'विधि' शब्द के अंतर्गत संविधान संशोधन अधिनियमों को भी शामिल करता है।
- 2. चौबीसवां संविधान संशोधन अधिनियम, 1971 द्वारा संसद ने अनुच्छेद 13 और अनुच्छेद 368 में संशोधन करते हुए यह स्पष्ट कर दिया कि अनुच्छेद 368 के तहत किया गया संविधान संशोधन अनुच्छेद 13 के अर्थ के अंतर्गत कोई 'विधि' (Law) नहीं है, जिससे संसद को मूल अधिकारों सहित संविधान के किसी भी हिस्से में संशोधन करने की असीमित शक्ति मिल गई।
- 3. 'केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973)' मामले में उच्चतम न्यायालय ने 24वें संविधान संशोधन की संवैधानिक वैधता को तो बरकरार रखा, किंतु साथ ही 'न्यायिक समीक्षा' और 'संविधान के बुनियादी ढाँचे (Basic Structure)' के सिद्धांत को प्रतिपादित करते हुए यह स्पष्ट किया कि संसद अनुच्छेद 368 के तहत मौलिक अधिकारों में संशोधन तो कर सकती है, किंतु संविधान के मूल स्वरूप को नष्ट नहीं कर सकती।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: 'गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य (1967)' के ऐतिहासिक मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने बहुमत से यह निर्णय दिया था कि संसद को मौलिक अधिकारों को छीनने या न्यून करने का कोई अधिकार नहीं है। न्यायालय ने माना कि संविधान संशोधन भी अनुच्छेद 13(2) के अंतर्गत 'विधि' (Law) के दायरे में आते हैं।
कथन 2 सही है: गोलकनाथ मामले के प्रभाव को निष्प्रभावी करने के लिए संसद ने 24वां संविधान संशोधन अधिनियम, 1971 पारित किया। इसके तहत अनुच्छेद 13 और 368 में संशोधन करके यह जोड़ा गया कि अनुच्छेद 368 के अधीन किया गया कोई भी संशोधन अनुच्छेद 13 के प्रयोजनों के लिए 'विधि' नहीं माना जाएगा।
कथन 3 सही है: 'केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973)' मामले में उच्चतम न्यायालय ने 24वें संविधान संशोधन की संवैधानिक वैधता को वैध ठहराया, लेकिन साथ ही 'संविधान के आधारभूत ढांचे' (Basic Structure) के सिद्धांत को प्रतिपादित किया। न्यायालय ने कहा कि संसद मूल अधिकारों सहित संविधान के किसी भी हिस्से में संशोधन कर सकती है, बशर्ते वह संशोधन संविधान के मूल ढाँचे को नष्ट या क्षीण न करे। अतः तीनों कथन सही हैं।
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग XVI' के अंतर्गत 'कुछ वर्गों के संबंध में विशेष उपबंध' (Special Provisions Relating to Certain Classes - अनुच्छेद 330 से 342A) तथा लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में आरक्षण के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 330 और 332 के अनुसार लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं में अनुसूचित जातियों (SCs) और अनुसूचित जनजातियों (STs) के लिए सीटों का आरक्षण उनकी जनसंख्या के अनुपात में किया जाता है, और मूल संविधान में यह प्रावधान किया गया था कि यह आरक्षण संविधान के लागू होने के दस वर्षों के भीतर स्वतः समाप्त हो जाएगा।
2. 104वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2019 के माध्यम से लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए सीटों के आरक्षण की समय-सीमा को बढ़ाकर 25 जनवरी 2030 तक कर दिया गया है, तथा इसी संशोधन द्वारा संसद और राज्य विधानसभाओं में आंग्ल-भारतीय (Anglo-Indian) समुदाय के लिए मनोनीत सीटों के प्रावधान को भी अनिश्चितकाल के लिए बढ़ा दिया गया है।
3. संविधान के अनुच्छेद 338 और 338A के तहत क्रमशः 'राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग' (NCSC) और 'राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग' (NCST) का गठन किया गया है, जहाँ राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग को 89वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2002 द्वारा अनुच्छेद 338 से अलग करके एक स्वतंत्र संवैधानिक निकाय के रूप में स्थापित किया गया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 263' के अंतर्गत स्थापित 'अंतर-राज्य परिषद' (Inter-State Council) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 263 के अनुसार राष्ट्रपति को यह शक्ति प्राप्त है कि यदि किसी समय लोक हित में ऐसा प्रतीत हो कि अंतर-राज्य परिषद की स्थापना से राज्यों के बीच उत्पन्न होने वाले विवादों की जांच, उन पर विचार-विमर्श या उनकी सामान्य हित से संबंधित विषयों की बेहतर नीतिगत रूपरेखा तैयार करने में सहायता मिलेगी, तो वह इस परिषद की स्थापना कर सकता है।
2. अंतर-राज्य परिषद एक स्थायी संवैधानिक निकाय (Permanent Constitutional Body) है जिसका गठन संविधान के लागू होने के साथ ही वर्ष 1950 में कर दिया गया था, और यह अनिवार्य रूप से सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों और केंद्र शासित प्रदेशों के प्रशासकों की एक अनिवार्य बैठक के रूप में कार्य करती है।
3. सरकारी आयोग (Sarkaria Commission) की सिफारिशों के आधार पर वर्ष 1990 में राष्ट्रपति की एक औपचारिक उद्घोषणा द्वारा अंतर-राज्य परिषद की स्थापना की गई थी, जिसके अध्यक्ष केंद्रीय गृह मंत्री होते हैं और प्रधानमंत्री इसके स्थायी सदस्यों में शामिल नहीं होते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय पर्यावरण, पारिस्थितिकी और जैव विविधता के संदर्भ में, 'राष्ट्रीय हरित अधिकरण' (National Green Tribunal - NGT) के गठन, क्षेत्राधिकार और इसकी कार्यप्रणाली के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राष्ट्रीय हरित अधिकरण की स्थापना 'राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010' के अंतर्गत पर्यावरण संरक्षण, वनों और अन्य प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण से संबंधित कानूनी अधिकारों के प्रवर्तन और मामलों के प्रभावी तथा त्वरित निपटान के लिए की गई थी।
2. यह अधिकरण अपने निर्णयों या आदेशों की सुनवाई करते समय सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (Code of Civil Procedure, 1908) के सख्त नियमों से बंधा नहीं होता है, बल्कि यह 'प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत' (Principles of Natural Justice) द्वारा निर्देशित होता है।
3. राष्ट्रीय हरित अधिकरण के किसी आदेश, निर्णय या पुरस्कार के विरुद्ध केवल सर्वोच्च न्यायालय में ही अपील दायर की जा सकती है, और इसके आदेशों को उच्च न्यायालयों (High Courts) की रिट अधिकारिता के अंतर्गत चुनौती नहीं दी जा सकती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग XX' के अंतर्गत 'संविधान का संशोधन' (Amendment of the Constitution - अनुच्छेद 368) की प्रक्रिया के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 368 के तहत संविधान में संशोधन करने की पहल संसद के किसी भी सदन में केवल एक मंत्री या एक निजी सदस्य द्वारा पुरःस्थापित (Introduce) किए जाने वाले विधेयक के माध्यम से की जा सकती है, जिसके लिए राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति (Prior Permission) लेना अनिवार्य होता है।
2. कुछ विशिष्ट प्रावधानों, जैसे कि राष्ट्रपति के निर्वाचन की प्रक्रिया या राज्यों के प्रतिनिधित्व से संबंधित मामलों में संशोधन के लिए न केवल संसद के दोनों सदनों द्वारा विशेष बहुमत से पारित होना आवश्यक है, बल्कि कम से कम आधे राज्यों के विधानमंडलों द्वारा साधारण बहुमत से उसका अनुसमर्थन (Ratification) प्राप्त करना भी अनिवार्य है।
3. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 'केशवानंद भारती वाद (1973)' में यह प्रतिपादित किया गया कि अनुच्छेद 368 के तहत संसद को संविधान के किसी भी हिस्से में संशोधन करने की असीमित शक्ति प्राप्त है, और संसद 'संविधान की मूल संरचना' (Basic Structure) में भी संशोधन कर सकती है बशर्ते वह न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर हो।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय इतिहास और स्वतंत्रता आंदोलन के संदर्भ में, वर्ष 1928 में प्रस्तुत 'नेहरू रिपोर्ट' (Nehru Report) और उससे जुड़े राजनीतिक घटनाक्रम के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. पंडित मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में गठित सर्वदलीय समिति द्वारा तैयार की गई इस रिपोर्ट में भारत के लिए एक नए डोमिनियन स्टेटस (Dominion Status) के संविधान की रूपरेखा प्रस्तुत की गई थी, जिसका मुख्य उद्देश्य भारत को ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर स्वशासन प्रदान करना था।
2. इस रिपोर्ट में अन्य बातों के अलावा केंद्र और प्रांतों में शक्ति के विभाजन, भाषाई आधार पर प्रांतों के गठन, सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार (Universal Adult Suffrage), और अल्पसंख्यकों के लिए पृथक निर्वाचक मंडलों (Separate Electorates) की व्यवस्था को स्वीकार करते हुए इसकी जोरदार सिफारिश की गई थी।
3. रिपोर्ट में औपनिवेशिक स्वराज्य (Dominion Status) की मांग किए जाने के कारण कांग्रेस के भीतर युवा नेताओं, विशेषकर जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस ने इसका कड़ा विरोध किया, जिसके परिणामस्वरूप 'इंडिपेंडेंस लीग' (Independence League) की स्थापना हुई और पूर्ण स्वराज्य (Complete Independence) का लक्ष्य सामने आया।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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