शिक्षा का अधिकार (RTE Act 2009)
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समावेशी शिक्षा (Inclusive Education) के प्रभावी क्रियान्वयन और भारतीय संविधान के प्रावधानों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21A (शिक्षा का अधिकार) और निशक्तजन अधिकार अधिनियम, 2016 के तहत 6 से 18 वर्ष तक के सभी दिव्यांग बच्चों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का वैधानिक प्रावधान किया गया है।
- 2. समावेशी शिक्षा का मुख्य उद्देश्य सामान्य विद्यालयों में सभी बच्चों (चाहे वे शारीरिक, मानसिक, सामाजिक या आर्थिक रूप से किसी भी वर्ग से हों) को एक साथ समान अवसर प्रदान करना है, जिसमें 'विशिष्ट बालकों' के लिए विशेष विद्यालयों का पृथक्करण अनिवार्य रूप से पहले किया जाता है।
- 3. राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा (NCF-2005) बाल-केन्द्रित शिक्षा और लचीले पाठ्यक्रम (Flexible Curriculum) की वकालत करती है ताकि विभिन्न योग्यताओं वाले छात्र बिना किसी बाधा के एक ही कक्षा में सीख सकें।
- 4. समावेशी कक्षा कक्ष में 'सार्वभौमिक डिजाइन फॉर लर्निंग' (Universal Design for Learning - UDL) के सिद्धांतों का पालन करते हुए शिक्षण अधिगम सामग्री (TLM) और मूल्यांकन विधियों में आवश्यक संशोधन किया जाता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है, क्योंकि संविधान के अनुच्छेद 21A और RPWD Act, 2016 के तहत बच्चों को शिक्षा का अधिकार प्राप्त है (हालांकि अधिनियम के अनुसार 6-18 वर्ष तक के दिव्यांग बच्चों को विशेष ध्यान दिया जाता है)। कथन 2 गलत है क्योंकि समावेशी शिक्षा 'पृथक्करण' (Segregation) का पूर्णतः विरोध करती है; यह सामान्य विद्यालयों में ही सभी बच्चों को बिना किसी अलगाव के एक साथ पढ़ाने पर बल देती है। कथन 3 सही है, NCF-2005 समावेशी शिक्षा के लिए लचीले पाठ्यक्रम और बाल-केंद्रित दृष्टिकोण का समर्थन करता है। कथन 4 सही है, 'सार्वभौमिक डिजाइन फॉर लर्निंग' (UDL) समावेशी शिक्षा का एक मुख्य आधार है जो सभी विद्यार्थियों की भिन्न आवश्यकताओं के अनुसार शिक्षण पद्धतियों को ढालने पर जोर देता है। अतः विकल्प (a) सही है।
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राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा (NCF 2005) तथा शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE Act 2009) के संकलित प्रावधानों और दार्शनिक संस्तुतियों का गहन विश्लेषण करने पर, यदि कोई विद्यालय बाल-केंद्रित शिक्षा प्रणाली को अपनाते हुए ज्ञान के निर्माण में बच्चों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करता है, रटने की प्रवृत्ति (Rote Learning) का पूर्णतः निषेध करता है, तथा प्रारंभिक शिक्षा के स्तर पर किसी भी प्रकार की प्रवेश परीक्षा या साक्षात्कार को प्रतिबंधित करते हुए गुणवत्तापूर्ण समावेशी शिक्षा का प्रावधान करता है, तो इन दोनों वैधानिक एवं शैक्षणिक दस्तावेजों के अंतर्संबंधों के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सर्वाधिक प्रामाणिक एवं वैज्ञानिक रूप से सत्य है?
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राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा (NCF 2005) के मूल सिद्धांतों तथा निःशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE Act 2009) की वैधानिक धाराओं का गहन विश्लेषण करने पर, बाल-केन्द्रित शिक्षा, ज्ञान के निर्माण, मूल्यांकन प्रणालियों और समावेशी शिक्षा के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सर्वाधिक प्रामाणिक एवं तात्विक रूप से सत्य है?
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राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा (NCF 2005) के मूल सिद्धांतों तथा निःशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE Act 2009) के वैधानिक प्रावधानों का गहन विश्लेषण करने पर, यदि कोई विद्यालय बच्चों के ज्ञान को विद्यालय के बाहरी जीवन से जोड़ने के लिए अनुभवात्मक अधिगम (Experiential Learning) और समावेशी शिक्षा का प्रभावी क्रियान्वयन करता है, तो इन दोनों दस्तावेजों के आलोक में मूल्यांकन की प्रणालियों और शैक्षणिक वातावरण के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सर्वाधिक प्रामाणिक एवं वैज्ञानिक रूप से सत्य है?
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राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा (NCF 2005) तथा शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE Act 2009) के संकलित एवं वैधानिक प्रावधानों का तात्विक विश्लेषण करने पर, बाल-केन्द्रित शिक्षा, समावेशी दृष्टिकोण और मूल्यांकन पद्धतियों के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सर्वाधिक प्रामाणिक रूप से सत्य है?
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भारतीय संविधान के अंतर्गत प्रदत्त 'मूल अधिकार', 'राज्य के नीतिनिदेशक तत्व' (DPSP) और 'मूल कर्त्तव्य' के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. मूल अधिकार न्यायोचित (Justiciable) हैं और इनका उल्लंघन होने पर अनुच्छेद 32 एवं अनुच्छेद 226 के तहत क्रमशः उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय की शरण ली जा सकती है, जबकि नीतिनिदेशक तत्व न्यायोचित नहीं हैं, किंतु देश के शासन में ये मूलभूत हैं और कानून बनाते समय इन्हें लागू करना राज्य का कर्तव्य है।
2. स्वर्ण सिंह समिति (1976) की सिफारिशों के आधार पर 42वें संविधान संशोधन द्वारा संविधान के भाग IV-A में अनुच्छेद 51A जोड़कर मूल कर्तव्यों को शामिल किया गया था, जिनमें प्रारंभ में 10 मूल कर्तव्य थे, और वर्ष 2002 के 86वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा इसमें 6 से 14 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए शिक्षा का अवसर प्रदान करने से संबंधित 11वां मूल कर्तव्य जोड़ा गया।
3. अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन के अधिकार में 'निजता का अधिकार' (Right to Privacy) को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा एक मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी गई है, किंतु नीतिनिदेशक तत्वों के अंतर्गत आने वाले 'समान नागरिक संहिता' (UCC - अनुच्छेद 44) को अभी तक देश में पूर्ण रूप से लागू नहीं किया गया है क्योंकि यह राज्य की नीति पर निर्भर करता है और इसके गैर-कार्यान्वयन के लिए न्यायालय द्वारा राज्य को बाध्य नहीं किया जा सकता है।
4. मूल कर्तव्यों का पालन करना प्रत्येक नागरिक के लिए विधिक रूप से बाध्यकारी है, और यदि कोई नागरिक किसी मूल कर्तव्य का उल्लंघन करता है, तो संसद द्वारा बनाए गए किसी विशेष कानून के तहत उसे सीधे संविधान के अनुच्छेद 51A के अंतर्गत दंडित करने का प्रावधान किया गया है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन पूर्णतः सत्य है/हैं?
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भारतीय संविधान में प्रदत्त मूल अधिकार, राज्य के नीतिनिदेशक तत्वों (DPSP) और मूल कर्तव्यों के अंतर्संबंधों तथा उनके न्यायिक पुनरावलोकन के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. केशवानंद भारती मामले (1973) के पश्चात न्यायपालिका ने यह स्पष्ट किया कि यद्यपि मौलिक अधिकार और नीतिनिदेशक तत्व एक-दूसरे के पूरक हैं, तथापि किसी भी स्थिति में संसद अनुच्छेद 368 के तहत संविधान संशोधन करके नीतिनिदेशक तत्वों को लागू करने के लिए भाग III (मूल अधिकारों) के प्रावधानों को पूर्णतः निष्प्रभावी या समाप्त नहीं कर सकती यदि वह संविधान के 'मूल ढांचा' (Basic Structure) का उल्लंघन करता हो।
2. स्वर्ण सिंह समिति की संस्तुतियों के आधार पर 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा संविधान में जोड़े गए अनुच्छेद 31-C के अंतर्गत यह प्रावधान किया गया कि अनुच्छेद 39(b) और 39(c) में वर्णित नीतिनिदेशक तत्वों को प्रभावी बनाने के लिए बनाए गए किसी भी कानून को इस आधार पर शून्य घोषित नहीं किया जा सकता कि वह अनुच्छेद 14 या अनुच्छेद 19 द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारों का उल्लंघन करता है।
3. वर्ष 2002 में 86वें संविधान संशोधन अधिनियम के माध्यम से जोड़े गए 11वें मूल कर्तव्य (अनुच्छेद 51A(k)) के अंतर्गत 6 से 14 वर्ष की आयु के बच्चों के माता-पिता या संरक्षक का यह कर्तव्य बनाया गया कि वे अपने बच्चों को शिक्षा के अवसर प्रदान करें, तथा इसी संशोधन द्वारा संविधान में अनुच्छेद 21A जोड़कर शिक्षा के अधिकार को मौलिक अधिकार का दर्जा दिया गया।
4. मूल कर्तव्य, जो कि मुख्य रूप से आयरिश संविधान से प्रेरित होकर भारतीय संविधान के भाग IV-A में शामिल किए गए हैं, प्रकृति में न्यायोचित (Justiciable) हैं, अर्थात उनके उल्लंघन की स्थिति में देश के उच्च न्यायालयों या उच्चतम न्यायालय द्वारा रिट (Writ) जारी करके इन्हें प्रवर्तित कराया जा सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन पूर्णतः सत्य है/हैं?
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