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History of India
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गुप्तकालीन प्रशासन, राजस्व प्रणाली तथा समाज के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. गुप्त काल में 'अग्रहार' भूमि वह भूमि होती थी जो ब्राह्मणों को कर-मुक्त रूप से दान दी जाती थी, और इस प्रकार की भूमि पर किसानों से कर वसूलने का अधिकार पूरी तरह से राजा के पास सुरक्षित रहता था, दानग्राही ब्राह्मण के पास नहीं।
  2. 2. गुप्त प्रशासन में विकेंद्रीकरण की प्रवृत्ति स्पष्ट रूप से दिखाई देती है, जहाँ केंद्रीय अधिकारियों के साथ-साथ 'विषयपति' (जिला अधिकारी) और स्थानीय निकायों जैसे 'पुश्तपाल' (रजिस्ट्रार) व श्रेणियों की महत्वपूर्ण भूमिका हुआ करती थी।
  3. 3. गुप्त राजवंश के शासकों ने सर्वाधिक संख्या में शुद्ध सोने के सिक्के (दीनार) जारी किए, किंतु फाह्यान के यात्रा विवरण से ज्ञात होता है कि दैनिक लेन-देन में कौड़ियों (Cowries) का प्रयोग बहुतायत में होता था।
  4. 4. शूद्रों की स्थिति में मौर्योत्तर काल की तुलना में कुछ सुधार हुआ, क्योंकि गुप्तकालीन स्मृति ग्रंथों और पुराणों में उन्हें कृषि कार्य करने और पशुपालन की अनुमति प्रदान की गई, तथा वे कुछ धार्मिक अनुष्ठानों में भी भाग लेने लगे थे।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 असत्य है क्योंकि 'अग्रहार' या ब्रह्मदेय भूमि अनुदानों के तहत ब्राह्मणों को न केवल कर-मुक्त भूमि दी जाती थी, बल्कि उन्हें उस भूमि से स्वयं कर वसूलने और प्रशासनिक नियंत्रण रखने का अधिकार भी मिल जाता था, जिससे राजा का उस क्षेत्र पर प्रत्यक्ष नियंत्रण समाप्त हो जाता था। कथन 2, 3 और 4 पूर्णतः सत्य हैं। गुप्त काल में विकेंद्रीकरण बढ़ा, विषयपति जिलों के प्रमुख थे और भूमि व संपत्ति के दस्तावेजों के रखरखाव के लिए 'पुस्तपाल' (Mahakshapatalik/Pustapala) का उल्लेख मिलता है। गुप्त शासकों ने अत्यधिक मात्रा में स्वर्ण मुद्राएं (दीनार) जारी कीं, किंतु दैनिक व्यापार में कौड़ियों का व्यापक प्रचलन था जैसा कि चीनी यात्री फाह्यान ने उल्लेख किया है। इस काल में शूद्रों की स्थिति में आर्थिक रूप से कुछ सुधार दर्ज किया गया, वे कृषि और शिल्प से जुड़े तथा उन्हें धार्मिक अनुष्ठानों में भी थोड़ी बहुत छूट मिलने लगी। अधिक जानकारी के लिए देखें विकिपीडिया संदर्भ.
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