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भारतीय और विश्व भूगोल के संदर्भ में, 'भूकंपीय छाया क्षेत्र' (Seismic Shadow Zone) और इसके निर्माण की क्रियाविधि के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. भूकंप का 'छाया क्षेत्र' वह विशिष्ट क्षेत्र होता है जहाँ भूकंपीय तरंगें (P-तरंगें और S-तरंगें दोनों) अभिलेखी यंत्रों (Seismographs) द्वारा या तो दर्ज ही नहीं की जाती हैं या अत्यंत कमजोर रूप में दर्ज की जाती हैं, और यह क्षेत्र भूकंप के अधिकेंद्र (Epicenter) से 105° और 145° के बीच एक विस्तृत पट्टे (Belt) के रूप में पृथ्वी के चारों ओर पाया जाता है।
- 2. प्राथमिक तरंगों (P-waves) का छाया क्षेत्र द्वितीयक तरंगों (S-waves) के छाया क्षेत्र की तुलना में अधिक विस्तृत होता है, क्योंकि P-तरंगें पृथ्वी के तरल बाह्य क्रोड़ (Outer Core) में प्रवेश करते ही पूरी तरह से अवशोषित हो जाती हैं और आगे गमन नहीं कर पाती हैं।
- 3. चूँकि S-तरंगें केवल ठोस माध्यम से ही गमन कर सकती हैं और तरल माध्यम (Outer Core) में प्रवेश करते ही लुप्त हो जाती हैं, इसलिए S-तरंगों का छाया क्षेत्र अधिकेंद्र से 105° से आगे के संपूर्ण गोलार्ध को कवर करता है, जो पृथ्वी के लगभग 40 प्रतिशत से अधिक हिस्से को आच्छादित करता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: भूकंप का छाया क्षेत्र वह क्षेत्र होता है जहाँ सिस्मोग्राफ द्वारा भूकंपीय तरंगें दर्ज नहीं की जाती हैं। अध्ययन से पता चलता है कि प्रत्येक भूकंप का एक अलग छाया क्षेत्र होता है, जो अधिकेंद्र से 105° और 145° के बीच एक चौड़ी पट्टी के रूप में होता है।
कथन 2 गलत है: P-तरंगों (प्राथमिक तरंगों) का छाया क्षेत्र S-तरंगों की तुलना में छोटा होता है। P-तरंगें तरल माध्यम से गुजर सकती हैं (हालांकि उनका अपवर्तन होता है), जिसके कारण 105° से 145° के बीच का क्षेत्र उनका छाया क्षेत्र बनता है। इसके विपरीत, S-तरंगों का छाया क्षेत्र अधिक व्यापक होता है क्योंकि वे तरल बाह्य क्रोड़ से बिल्कुल नहीं गुजर सकतीं।
कथन 3 सही है: S-तरंगों का छाया क्षेत्र अधिकेंद्र से 105° से परे दोनों दिशाओं में पृथ्वी के चारों ओर विस्तृत होता है (यानी 105° से 180° तक), क्योंकि S-तरंगें तरल बाह्य क्रोड़ में प्रवेश नहीं कर पाती हैं और पूरी तरह से विलुप्त हो जाती हैं। यह क्षेत्र पृथ्वी के कुल क्षेत्रफल का लगभग 40 प्रतिशत से अधिक हिस्सा कवर करता है।
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भारतीय पर्यावरण, पारिस्थितिकी एवं जैव विविधता के संदर्भ में, 'राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन' (NMCG) और 'नमामि गंगे कार्यक्रम' के प्रावधानों और संस्थागत तंत्र के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (NMCG) की स्थापना 'पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986' के अंतर्गत वर्ष 2011 में एक पंजीकृत सोसायटी के रूप में की गई थी, जिसे बाद में 'राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण' (NGRBA) के स्थान पर गठित 'राष्ट्रीय गंगा परिषद' (National Ganga Council) के समग्र नियंत्रण और अधीक्षण के अधीन रखा गया है।
2. 'नमामि गंगे कार्यक्रम' एक समेकित केंद्रीय क्षेत्र की पहल (Central Sector Initiative - 100% funding by Central Government) है, जिसका उद्देश्य गंगा नदी के प्रदूषण को प्रभावी ढंग से समाप्त करना तथा उसके संरक्षण और पुनर्जीवन को सुनिश्चित करना है, और इसके तहत नदी बेसिन में किसी भी राज्य सरकार या स्थानीय निकाय को वित्तीय सहायता प्रदान करने का कोई प्रावधान नहीं है।
3. राष्ट्रीय गंगा परिषद (NGC), जिसकी अध्यक्षता देश के प्रधानमंत्री करते हैं, गंगा नदी बेसिन के प्रदूषण निवारण और पुनर्जीवन से संबंधित मामलों की समीक्षा के लिए सर्वोच्च नीति निर्माण निकाय है, और इसके सदस्यों में संबंधित राज्यों के मुख्यमंत्री तथा केंद्रीय मंत्रालयों के मंत्री शामिल होते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग XI' के अंतर्गत केंद्र-राज्य विधायी संबंधों और 'अवशिष्ट शक्तियों' (Residuary Powers) के प्रावधानों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 248 के अनुसार, संसद को किसी भी ऐसे विषय के संबंध में विधि बनाने की अनन्य शक्ति प्राप्त है जो समवर्ती सूची या राज्य सूची में शामिल नहीं है, और इस अवशिष्ट विधायी शक्ति के अंतर्गत कर लगाने (Taxation) से संबंधित विषय शामिल नहीं किए गए हैं।
2. कनाडा के संविधान के विपरीत, जहाँ अवशिष्ट शक्तियाँ प्रांतीय (राज्य) सरकारों में निहित हैं, भारतीय संविधान में अवशिष्ट शक्तियों को केंद्र सरकार (संसद) में निहित किया गया है, जो भारत के अर्ध-संघीय (Quasi-federal) स्वरूप को और अधिक सुदृढ़ करती है।
3. भारत सरकार अधिनियम, 1935 (Government of India Act, 1935) के अंतर्गत भी अवशिष्ट विधायी शक्तियाँ गवर्नर-जनरल के अधीन थीं, न कि प्रांतीय विधानमंडलों के पास, और भारतीय संविधान निर्माताओं ने इसी ऐतिहासिक प्रशासनिक निरंतरता को ध्यान में रखते हुए केंद्र को अवशिष्ट शक्तियाँ प्रदान की हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय इतिहास, कला एवं संस्कृति के संदर्भ में, 'गुप्तोत्तर काल' (Post-Gupta Period) के दौरान प्रचलित भूमि अनुदान प्रणालियों और प्रशासनिक शब्दावली के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. गुप्त और गुप्तोत्तर काल में राजाओं द्वारा ब्राह्मणों, मंदिरों और प्रशासनिक अधिकारियों को जो कर-मुक्त भूमि अनुदान (Agrahara Grants) दिए जाते थे, उनके परिणामस्वरूप स्थानीय स्तर पर एक नए सामंती वर्ग (Feudal Order) का उदय हुआ, जिससे किसानों की स्थिति धीरे-धीरे उप-कृषकों या अर्ध-दासों (Serfs) जैसी होने लगी।
2. इस काल के अभिलेखों में प्रयुक्त 'अग्रहार' (Agrahara) शब्द उस भूमि को इंगित करता था जो केवल बौद्ध विहारों को दान में दी जाती थी, जबकि जैन संस्थाओं को दिए जाने वाले भूमि अनुदानों को 'देवदान' कहा जाता था।
3. भूमि अनुदान दस्तावेजों में उल्लिखित 'विष्टि' (Vishti) का तात्पर्य जबरन श्रम या बेगार से था, जिसका उपयोग राजाओं और भूमि अनुदान प्राप्तकर्ताओं द्वारा बिना किसी पारिश्रमिक के सार्वजनिक कार्यों या व्यक्तिगत खेतों में काम करवाने के लिए किया जाता था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय पर्यावरण, पारिस्थितिकी एवं जैव विविधता के संदर्भ में, 'राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकार' (National Biodiversity Authority - NBA) और 'जैव विविधता अधिनियम, 2002' के प्रावधानों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकार (NBA) की स्थापना जैव विविधता अधिनियम, 2002 के अंतर्गत चेन्नई, तमिलनाडु में एक सांविधिक (Statutory) और स्वायत्त निकाय के रूप में की गई थी, जिसका मुख्य उद्देश्य देश के जैविक संसाधनों के संरक्षण, उनके सतत उपयोग और जैव विविधता से प्राप्त लाभों के न्यायसंगत बँटवारे को विनियमित करना है।
2. जैव विविधता अधिनियम, 2002 के प्रावधानों के तहत किसी भी भारतीय नागरिक या भारत में पंजीकृत कंपनी को अपने व्यावसायिक उपयोग के लिए देश के जैविक संसाधनों तक पहुँच प्राप्त करने से पहले राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकार की पूर्व अनुमति लेना अनिवार्य रूप से आवश्यक होता है।
3. यह अधिनियम त्रि-स्तरीय विधिक और प्रशासनिक तंत्र की परल्पना करता है, जिसके अंतर्गत राष्ट्रीय स्तर पर 'राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकार', राज्य स्तर पर 'राज्य जैव विविधता बोर्ड' (SBB) तथा स्थानीय स्तर पर 'जैव विविधता प्रबंधन समितियाँ' (BMCs) गठित की जाती हैं, जिनमें स्थानीय समुदायों के पारंपरिक ज्ञान का दस्तावेजीकरण करने के लिए 'लोक जैव विविधता रजिस्टर' (PBR) तैयार करने की जिम्मेदारी होती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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हुरुन ग्लोबल यूनिकॉर्न इंडेक्स 2026 में भारत की रैंक क्या है?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग IVक' (मूल कर्तव्य - अनुच्छेद 51क) तथा सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए विभिन्न निर्णयों के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. मूल कर्तव्यों को मूल संविधान में शामिल नहीं किया गया था, बल्कि इन्हें स्वर्ण सिंह समिति की संस्तुति पर 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा संविधान के भाग IVक में जोड़ा गया, और वर्तमान में संविधान में कुल 11 मूल कर्तव्य हैं जिन्हें वर्ष 2002 के 86वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा अंतिम बार संशोधित किया गया था।
2. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51क के अंतर्गत उल्लिखित सभी 11 मूल कर्तव्य प्रकृति से वाद योग्य (Justiciable) हैं, जिसका अर्थ है कि यदि कोई नागरिक अपने किसी मूल कर्तव्य का पालन नहीं करता है, तो उसके विरुद्ध उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अनुच्छेद 226 और अनुच्छेद 32 के तहत सीधे रिट याचिका जारी की जा सकती है।
3. 'रंगनाथ मिश्रा बनाम भारत संघ' (2003) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया था कि मूल कर्तव्यों को केवल कानूनी रूप से लागू करने या दण्डित करने का विषय नहीं बनाया जाना चाहिए, बल्कि देश में नागरिकों के बीच इनके प्रति जन-जागरूकता पैदा की जानी चाहिए और इन्हें कानून के अन्य प्रावधानों के साथ समेकित करके लागू किया जाना चाहिए।
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