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भारतीय इतिहास, कला एवं संस्कृति के संदर्भ में, 'गुप्तोत्तर काल' (Post-Gupta Period) के दौरान प्रचलित भूमि अनुदान प्रणालियों और प्रशासनिक शब्दावली के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. गुप्त और गुप्तोत्तर काल में राजाओं द्वारा ब्राह्मणों, मंदिरों और प्रशासनिक अधिकारियों को जो कर-मुक्त भूमि अनुदान (Agrahara Grants) दिए जाते थे, उनके परिणामस्वरूप स्थानीय स्तर पर एक नए सामंती वर्ग (Feudal Order) का उदय हुआ, जिससे किसानों की स्थिति धीरे-धीरे उप-कृषकों या अर्ध-दासों (Serfs) जैसी होने लगी।
  2. 2. इस काल के अभिलेखों में प्रयुक्त 'अग्रहार' (Agrahara) शब्द उस भूमि को इंगित करता था जो केवल बौद्ध विहारों को दान में दी जाती थी, जबकि जैन संस्थाओं को दिए जाने वाले भूमि अनुदानों को 'देवदान' कहा जाता था।
  3. 3. भूमि अनुदान दस्तावेजों में उल्लिखित 'विष्टि' (Vishti) का तात्पर्य जबरन श्रम या बेगार से था, जिसका उपयोग राजाओं और भूमि अनुदान प्राप्तकर्ताओं द्वारा बिना किसी पारिश्रमिक के सार्वजनिक कार्यों या व्यक्तिगत खेतों में काम करवाने के लिए किया जाता था।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 सही है: गुप्त और गुप्तोत्तर काल में बड़े पैमाने पर ब्राह्मणों, मंदिरों और मठों को कर-मुक्त भूमि अनुदान दिए गए। इन अनुदानों ने भारत में सामंतवाद (Feudalism) के बीजारोपण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जहाँ भूमि के साथ-साथ किसानों के अधिकार भी अनुदान प्राप्तकर्ताओं को हस्तांतरित होने लगे, जिससे किसानों की स्थिति दयनीय होने लगी। कथन 2 गलत है: 'अग्रहार' (Agrahara) भूमि अनुदान वे थे जो मुख्य रूप से ब्राह्मणों को दिए जाते थे। बौद्ध विहारों को दिए जाने वाले अनुदानों को 'ब्रह्मदेय' या बौद्ध संदर्भों से जोड़ा जाता था, जबकि जैन संस्थाओं को दिए जाने वाले अनुदानों को 'पल्लीचदम' (Pallichchhandam) कहा जाता था, न कि देवदान (देवदान मंदिरों को दी जाने वाली भूमि को कहते थे)। कथन 3 सही है: 'विष्टि' (Vishti) प्राचीन और मध्यकालीन भारत में जबरन श्रम या बेगार (Forced Labour) को कहा जाता था, जिसके लिए कामगारों को कोई वेतन या पारिश्रमिक नहीं दिया जाता था और यह राज्य या भूमि अनुदान प्राप्तकर्ताओं का एक महत्वपूर्ण अधिकार बन गया था।
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