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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 25 और 26' के अंतर्गत प्रदत्त 'धर्म की स्वतंत्रता के अधिकार' तथा इसके न्यायिक आयामों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान का अनुच्छेद 25 न केवल अंतःकरण की स्वतंत्रता और किसी भी धर्म को अबाध रूप से मानने, आचरण करने और प्रचार करने का अधिकार प्रदान करता है, बल्कि यह अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था, सदाचार और स्वास्थ्य के अधीन होने के साथ-साथ राज्य को किसी भी आर्थिक, वित्तीय, राजनीतिक या अन्य धर्मनिरपेक्ष क्रियाकलाप का विनियमन या निर्बंधन करने की शक्ति भी देता है।
- 2. ऐतिहासिक 'शिरूर मठ वाद (1954)' में उच्चतम न्यायालय ने 'आवश्यकता के सिद्धांत' (Doctrine of Essentiality) को प्रतिपादित किया था, जिसके तहत न्यायालय यह निर्धारित करता है कि कौन-ся धार्मिक अभ्यास या अनुष्ठान किसी धर्म का एक अनिवार्य (Essential) और अभिन्न हिस्सा है, और केवल उन्हीं अनिवार्य प्रथाओं को संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत संवैधानिक संरक्षण प्राप्त होता है।
- 3. अनुच्छेद 26 प्रत्येक धार्मिक संप्रदाय या उसके किसी अनुभाग को धार्मिक और दान प्रयोजनों के लिए संस्थाओं की स्थापना और पोषण करने का अधिकार देता है, किंतु इसके तहत किसी भी धार्मिक संप्रदाय को अपनी धार्मिक मामलों के प्रबंधन के लिए अपनी संपत्ति का प्रशासन करने का अनन्य अधिकार प्राप्त है, और राज्य किसी भी विधि के माध्यम से इस प्रशासनिक शक्ति का अधिग्रहण नहीं कर सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: संविधान का अनुच्छेद 25(1) सभी व्यक्तियों को अंतःकरण की स्वतंत्रता और धर्म को अबाध रूप से मानने, आचरण करने और प्रचार करने का समान हक देता है। अनुच्छेद 25(2)(a) के अनुसार, राज्य धार्मिक आचरण से जुड़े किसी भी आर्थिक, वित्तीय, राजनीतिक या अन्य धर्मनिरपेक्ष क्रियाकलाप का विनियमन या निर्बंधन कर सकता है। यह अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था (Public order), नैतिकता (Morality) और स्वास्थ्य (Health) के अधीन है।
कथन 2 सही है: 'कमिश्रर, हिंदू रिलीजियस एंड चैरिटेबल एंडोमेंट्स बनाम श्री लक्ष्मंडार स्वामीार (शिरूर मठ वाद, 1954)' में उच्चतम न्यायालय ने 'आवश्यकता के सिद्धांत' (Doctrine of Essentiality) को प्रतिपादित किया था। इसके तहत यह परीक्षण किया जाता है कि कौन-सी प्रथाएं किसी धर्म का मूल और अनिवार्य हिस्सा हैं। केवल आवश्यक धार्मिक प्रथाओं को ही अनुच्छेद 25 और 26 के तहत संवैधानिक सुरक्षा मिलती है।
कथन 3 गलत है: अनुच्छेद 26 के तहत धार्मिक संप्रदायों को अपने धार्मिक मामलों के प्रबंधन का अधिकार है, जिसमें अपनी संपत्ति का स्वामित्व और प्रशासन करना शामिल है। हालांकि, यह अधिकार 'विधि के अनुसार' (according to law) है, जिसका अर्थ है कि राज्य लोक व्यवस्था, नैतिकता या स्वास्थ्य के नियमन के लिए धार्मिक संपत्तियों के प्रशासन को विनियमित करने के वास्ते कानून बना सकता है और कुछ समय के लिए इसका अधिग्रहण भी कर सकता है (बशर्ते प्रबंधन का मूल अधिकार समाप्त न किया जाए)। अतः कथन 3 गलत है।
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भारतीय पर्यावरण, पारिस्थितिकी और जैव विविधता संरक्षण के संदर्भ में, 'राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010' (National Green Tribunal Act, 2010) के अंतर्गत स्थापित 'राष्ट्रीय हरित अधिकरण' (NGT) की शक्तियों, अधिकार क्षेत्र और सीमाओं के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) को भारत के संविधान के 'अनुच्छेद 21' के अंतर्गत प्रदत्त जीवन के अधिकार के तहत स्वस्थ पर्यावरण के अधिकार को लागू करने का वैधानिक जनादेश प्राप्त है, और यह अधिकरण सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) के कड़े प्रक्रियात्मक नियमों से बंधा नहीं है, बल्कि यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों (Principles of Natural Justice) द्वारा निर्देशित होता है।
2. NGT अधिनियम की धारा 14 के तहत यह प्रावधान किया गया है कि अधिकरण के समक्ष किसी भी पर्यावरण से जुड़े विवाद या आवेदन को उस कारण के उत्पन्न होने की तारीख से 'छह महीने' की अवधि के भीतर दायर किया जाना अनिवार्य है, किंतु अधिकरण के पास यह विवेकाधीन शक्ति (Discretionary Power) है कि वह पर्याप्त कारणों से संतुष्ट होने पर इस अवधि को अधिकतम 'अतिरिक्त साठ दिन' (60 days) तक बढ़ा सकता है।
3. 'वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980' और 'जैविक विविधता अधिनियम, 2002' को NGT के वैधानिक क्षेत्राधिकार की पहली अनुसूची (Schedule I) में शामिल किया गया है, किंतु 'वन अधिकार अधिनियम, 2006' (Scheduled Tribes and Other Traditional Forest Dwellers Act, 2006) को इसके क्षेत्राधिकार से पूर्णतः बाहर रखा गया है, जिसके कारण वनवासियों के अधिकारों से जुड़े मामलों की सुनवाई NGT द्वारा नहीं की जा सकती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग IV' के अंतर्गत 'राज्य के नीति निर्देशक तत्व' (Directive Principles of State Policy - DPSP - अनुच्छेद 36 से 51) तथा उनसे संबंधित संवैधानिक संशोधनों के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 38 के अनुसार राज्य, लोक कल्याण की अभिवृद्धि के लिए ऐसी सामाजिक व्यवस्था बनाएगा जिसमें सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय राष्ट्रीय जीवन की सभी संस्थाओं को अनुप्राणित करे, जिसे 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा जोड़ा गया था ताकि आय, प्रतिष्ठा और अवसरों की असमानताओं को कम किया जा सके।
2. 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा नीति निर्देशक तत्वों में कई नए निर्देश जोड़े गए थे, जिनमें बच्चों के स्वस्थ विकास के लिए अवसरों को सुरक्षित करना (अनुच्छेद 39), समान न्याय और निःशुल्क विधिक सहायता (अनुच्छेद 39A), उद्योगों के प्रबंधन में श्रमिकों की भागीदारी (अनुच्छेद 43A) तथा पर्यावरण का संरक्षण और संवहन तथा वन एवं वन्य जीवों की रक्षा (अनुच्छेद 48A) शामिल हैं।
3. 44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 द्वारा राज्य के नीति निर्देशक तत्वों में एक नया निर्देश (अनुच्छेद 38 का खंड 2) जोड़ा गया, जिसके तहत यह अनिवार्य किया गया कि राज्य विशेष रूप से आय की असमानताओं को कम करने का प्रयास करेगा और साथ ही प्रतिष्ठा, सुविधाओं और अवसरों की असमानता को केवल व्यक्तियों के बीच ही नहीं बल्कि विभिन्न क्षेत्रों में रहने वाले और विभिन्न व्यवसायों में लगे समूहों के बीच भी समाप्त करने का प्रयास करेगा।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग IV' (राज्य के नीति निर्देशक तत्व - अनुच्छेद 36 से 51) तथा 42वें एवं 44वें संविधान संशोधनों के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. वर्ष 1976 के 42वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा नीति निर्देशक तत्वों में कुछ नए सिद्धांत जोड़े गए, जिनमें बच्चों के स्वस्थ विकास के लिए अवसरों को सुरक्षित करना, समान न्याय और निःशुल्क विधिक सहायता, तथा उद्योगों के प्रबंधन में कामगारों की भागीदारी सुनिश्चित करना शामिल था।
2. संविधान के अनुच्छेद 48-क के अंतर्गत पर्यावरण का संरक्षण तथा संवहन और वन तथा वन्यजीवों की रक्षा करने का प्रावधान मूल संविधान में ही वर्ष 1950 से विद्यमान था, जिसे बाद में 42वें संशोधन द्वारा और अधिक कड़ा किया गया।
3. वर्ष 1978 के 44वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा नीति निर्देशक तत्वों में एक नया खंड (अनुच्छेद 38 का खंड 2) जोड़ा गया, जिसके तहत राज्य को विशेष रूप से आय की असमानताओं को कम करने और विभिन्न क्षेत्रों में रहने वाले या विभिन्न पेशों में लगे लोगों के समूहों के बीच प्रतिष्ठा, सुविधाओं और अवसरों की असमानता को समाप्त करने का निर्देश दिया गया।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 202' से 'अनुच्छेद 207' तक उल्लिखित 'राज्य विधानमंडल की वित्तीय प्रक्रिया और धन विधेयकों' (Financial Procedures and Money Bills) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 199 के अनुसार, कोई विधेयक 'धन विधेयक' (Money Bill) तभी माना जाएगा जब उसमें केवल ऐसे उपबंध शामिल हों जो करों के अधिरोपण, उत्सादन, परिहार, परिवर्तन या विनियमन, अथवा राज्य की संचित निधि से धन के विनियोजन से संबंधित हों, और यदि किसी विधेयक में धन संबंधी मामलों के साथ-साथ अन्य गैर-वित्तीय मामले भी मिला दिए जाते हैं, तो वह स्वतः एक धन विधेयक बन जाता है।
2. 'राज्य के वित्त विधेयक' (Financial Bills) के संदर्भ में, अनुच्छेद 207 के तहत यह प्रावधान किया गया है कि ऐसा कोई भी विधेयक जो राज्य की संचित निधि से व्यय उपबंधित करता है, राज्य विधानसभा में तब तक पुनर्स्थापित या पारित नहीं किया जा सकता जब तक कि राज्यपाल ने उस विधेयक को उस विधानसभा में विचार के लिए संस्तुति (Recommendation) न दे दी हो।
3. राज्य विधान परिषद (Legislative Council) को किसी धन विधेयक के संबंध में अत्यंत सीमित शक्तियां प्राप्त हैं; वह न तो धन विधेयक को अस्वीकार कर सकती है और न ही उसमें संशोधन कर सकती है, तथा उसे विधानसभा द्वारा पारित किए जाने के पश्चात अधिकतम चौदह दिनों की अवधि के भीतर अपनी सिफारिशों के साथ या बिना सिफारिशों के विधानसभा को वापस लौटाना होता है, अन्यथा उस अवधि की समाप्ति पर वह विधेयक दोनों सदनों द्वारा पारित मान लिया जाता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय इतिहास, कला एवं संस्कृति के संदर्भ में, 'महायान बौद्ध धर्म' तथा 'बौद्धिसत्वों की अवधारणा' के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. महायान बौद्ध धर्म का उदय कुषाण काल के दौरान, विशेषकर कनिष्क के शासनकाल में आयोजित चतुर्थ बौद्ध संगीति के उपरांत स्पष्ट रूप से सामने आया, जिसमें बुद्ध की मूर्तियों की पूजा और बोधिसत्वों की परिकल्पना को मुख्यधारा में अपनाया गया।
2. वज्रपाणि, अवलोकितेश्वर और मैत्रेय प्रमुख बोधिसत्व हैं, जिनमें से 'अवलोकितेश्वर' (पद्मपाणि) को भविष्य के बुद्ध के रूप में चित्रित किया गया है जो इस कल्प के अंत में धर्म की पुनर्स्थापना के लिए धरती पर अवतरित होंगे।
3. महायान परंपरा में 'पारमिता' (Perfections) के मार्ग का अनुसरण करते हुए बोधिसत्वों द्वारा स्वयं की व्यक्तिगत मुक्ति (निर्वाण) से पहले समस्त sentient beings (प्राणियों) की मुक्ति का संकल्प लिया जाता है, जिसे महायान दर्शन में 'बोधिसत्व आदर्श' कहा गया है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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