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भारतीय इतिहास, कला एवं संस्कृति के संदर्भ में, 'महायान बौद्ध धर्म' तथा 'बौद्धिसत्वों की अवधारणा' के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. महायान बौद्ध धर्म का उदय कुषाण काल के दौरान, विशेषकर कनिष्क के शासनकाल में आयोजित चतुर्थ बौद्ध संगीति के उपरांत स्पष्ट रूप से सामने आया, जिसमें बुद्ध की मूर्तियों की पूजा और बोधिसत्वों की परिकल्पना को मुख्यधारा में अपनाया गया।
- 2. वज्रपाणि, अवलोकितेश्वर और मैत्रेय प्रमुख बोधिसत्व हैं, जिनमें से 'अवलोकितेश्वर' (पद्मपाणि) को भविष्य के बुद्ध के रूप में चित्रित किया गया है जो इस कल्प के अंत में धर्म की पुनर्स्थापना के लिए धरती पर अवतरित होंगे।
- 3. महायान परंपरा में 'पारमिता' (Perfections) के मार्ग का अनुसरण करते हुए बोधिसत्वों द्वारा स्वयं की व्यक्तिगत मुक्ति (निर्वाण) से पहले समस्त sentient beings (प्राणियों) की मुक्ति का संकल्प लिया जाता है, जिसे महायान दर्शन में 'बोधिसत्व आदर्श' कहा गया है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: महायान बौद्ध धर्म का स्पष्ट उदय कुषाण सम्राट कनिष्क के शासनकाल में (कुंडलवन, कश्मीर में आयोजित चतुर्थ बौद्ध संगीति के दौरान) हुआ। इसमें बुद्ध की पूजा मूर्ति रूप में आरंभ हुई और बोधिसत्वों की संकल्पना को प्रमुखता मिली। कथन 2 गलत है: 'मैत्रेय' (Maitreya) को भविष्य का बुद्ध माना गया है, न कि अवलोकितेश्वर को। अवलोकितेश्वर (पद्मपाणि) करुणा के अवतार बोधिसत्व हैं, जिन्हें दुखी मानवता की सहायता करने वाला माना गया है। कथन 3 सही है: महायान दर्शन में बोधिसत्व का मुख्य आदर्श यह है कि वे अपनी व्यक्तिगत मुक्ति प्राप्त करने के बावजूद तब तक निर्वाण प्राप्त नहीं करते जब तक कि संसार के सभी प्राणी मोक्ष या मुक्ति प्राप्त नहीं कर लेते। वे 'पारमिता' (उत्कृष्ट गुणों या पूर्णताओं) के मार्ग पर चलते हैं।
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 161' के अंतर्गत राज्यपाल की 'क्षमादान की शक्ति' (Pardoning Power) तथा इससे संबंधित न्यायिक निर्णयों और प्रावधानों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 161 के तहत राज्य के राज्यपाल को उस विषय से संबंधित, जिस पर राज्य की कार्यकारी शक्ति का विस्तार है, किसी विधि के विरुद्ध किसी अपराध के लिए दोषी ठहराए गए किसी व्यक्ति के दंड को क्षमा, प्रविलंबन, विराम या परिहार करने अथवा दंडादेश का निलंबन, परिहार या लघुकरण करने की शक्ति प्राप्त है, किंतु राज्यपाल को किसी भी परिस्थिति में मृत्युदंड (Death Sentence) को माफ करने की शक्ति प्राप्त नहीं है।
2. 'हरगोविन्द पंत बनाम रघुकुल तिलक (1979)' और अन्य मामलों में उच्चतम न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि राज्यपाल का पद केंद्र सरकार के अधीन एक अधीनस्थ या रोजगार का कार्यालय नहीं है, बल्कि यह एक स्वतंत्र संवैधानिक कार्यालय है, और राज्य का राज्यपाल मंत्रिपरिषद की सलाह के बिना अपने वैयक्तिक स्वविवेक से अनुच्छेद 161 के अंतर्गत क्षमादान की शक्तियों का प्रयोग कर सकता है।
3. 'श्रीसंत बनाम केरल राज्य' तथा 'मारु राम बनाम भारत संघ' जैसे मामलों के परिप्रेक्ष्य में सर्वोच्च न्यायालय ने यह व्यवस्था दी है कि यद्यपि राज्यपाल की क्षमादान की शक्ति एक संवैधानिक विशेषाधिकार है, किंतु इस शक्ति का प्रयोग मनमाने ढंग से, दुर्भावनापूर्ण तरीके से या राजनीतिक कारणों से नहीं किया जा सकता है, और यह न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के दायरे के अंतर्गत आती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 72' के अंतर्गत 'भारत के राष्ट्रपति की क्षमादान की शक्ति' (Pardoning Power) के प्रावधानों और उनकी सीमाओं के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राष्ट्रपति की क्षमादान की शक्ति का विस्तार उन सभी मामलों तक है जहाँ दंडादेश ऐसे विषय से संबंधित है जिस पर संघ की कार्यकारी शक्ति का विस्तार होता है, सैन्य न्यायालय (Court Martial) द्वारा दिए गए दंड के मामलों में, तथा ऐसे मामलों में जहाँ मृत्युदंड (Death Sentence) दिया गया हो।
2. सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न निर्णयों के अनुसार, राष्ट्रपति द्वारा क्षमादान की शक्ति के प्रयोग (अनुच्छेद 72 के तहत) को न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के दायरे से पूरी तरह बाहर रखा गया है, और किसी भी स्थिति में न्यायालय राष्ट्रपति के इस निर्णय या उसकी दया याचिका पर लिए गए विलंब की वैधता की जांच नहीं कर सकता है।
3. राष्ट्रपति द्वारा किसी दया याचिका पर निर्णय लेते समय केंद्रीय मंत्रिमंडल की सलाह लेना संवैधानिक रूप से अनिवार्य होता है, और राष्ट्रपति मंत्रिमंडल की सलाह के विरुद्ध जाकर अपनी व्यक्तिगत इच्छा से किसी भी दोषी को क्षमादान नहीं दे सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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दिल्ली सल्तनत की प्रथम और एकमात्र महिला सुल्तान कौन थी?
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ई. वी. रामास्वामी को 'पेरियार' की उपाधि किसने दी थी?
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भारतीय इतिहास और स्वतंत्रता आंदोलन के संदर्भ में, वर्ष 1942 के 'भारत छोड़ो आंदोलन' (Quit India Movement) तथा उससे जुड़े विभिन्न घटनाक्रमों और भूमिगत गतिविधियों के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. बंबई में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के ऐतिहासिक अधिवेशन (अगस्त 1942) में 'भारत छोड़ो' प्रस्ताव पारित होने के ठीक दूसरे दिन प्रातः काल ऑपरेशन जीरो आवर (Operation Zero Hour) के तहत कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को गिरफ्तार कर लिया गया, जिसके परिणामस्वरूप यह आंदोलन पूरी तरह से नेतृत्वहीन हो गया और इसमें किसी भी प्रकार की केंद्रीय दिशा या संगठित भूमिगत नेटवर्क का अभाव रहा।
2. आंदोलन के दौरान देश के विभिन्न हिस्सों में साहसिक भूमिगत गतिविधियाँ (Underground Activities) संचालित की गईं, जिनमें उषा मेहता द्वारा बंबई में 'कांग्रेस रेडियो' (Congress Radio) का गुप्त रूप से संचालन करना प्रमुख था, जिसके माध्यम से नियमित रूप से बुलेटिन प्रसारित किए जाते थे और ब्रिटिश सेंसरशिप को चकमा दिया जाता था।
3. इस आंदोलन के दौरान देश के कुछ क्षेत्रों में 'समानांतर सरकारों' (Parallel Governments) की स्थापना की गई, जिनमें बलिया (उत्तर प्रदेश) में चित्तू पांडेय के नेतृत्व में, ताम्रलिूक (बंगाल) में 'जातीय सरकार' के तहत, और सतारा (महाराष्ट्र) में 'प्रति सरकार' (यशवंतराव चव्हाण और नाना पाटिल के नेतृत्व में) का गठन शामिल था, जो काफी लंबे समय तक सफलतापूर्वक कार्यरत रहीं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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