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भारतीय पर्यावरण कानून और 'राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड' (National Board for Wildlife - NBWL) तथा 'वन संरक्षण अधिनियम, 1980' के विधिक एवं संस्थागत ढांचे के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. 'राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड' (NBWL) एक सांविधिक निकाय (Statutory Body) है जिसका गठन वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के प्रावधानों के तहत किया गया है, और इसकी अध्यक्षता स्वयं देश के प्रधानमंत्री करते हैं।
  2. 2. वन्यजीव अभ्यारण्यों और राष्ट्रीय उद्यानों की सीमाओं के भीतर किसी भी प्रकार के गैर-वानिकी गतिविधियों या वाणिज्यिक उपयोग की अनुमति देने के लिए 'स्थाई समिति' (Standing Committee) के अनुमोदन की आवश्यकता होती है, और इस स्थाई समिति की अध्यक्षता केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री द्वारा की जाती है।
  3. 3. 'वन संरक्षण अधिनियम, 1980' के तहत किसी भी आरक्षित वन (Reserved Forest) या गैर-वन भूमि को गैर-वानिकी उद्देश्यों के लिए उपयोग करने हेतु केंद्र सरकार की पूर्व स्वीकृति अनिवार्य है, और इस अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन करने पर राज्यों को यह शक्ति प्राप्त है कि वे बिना केंद्र की अनुमति के वन भूमि का डायवर्जन कर सकते हैं यदि मामला लोक कल्याण से जुड़ा हो।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 सही है: राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड (NBWL) वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की धारा 5A के तहत स्थापित एक सांविधिक निकाय है। इस बोर्ड के अध्यक्ष प्रधानमंत्री होते हैं। कथन 2 सही है: NBWL की एक 'स्थाई समिति' (Standing Committee) होती है, जिसके माध्यम से वन्यजीव अभ्यारण्यों और राष्ट्रीय उद्यानों के पारिस्थितिकी-संवेदनशील क्षेत्रों (Eco-Sensitive Zones) या सीमाओं के भीतर परियोजनाओं को मंजूरी दी जाती है। इस स्थाई समिति की अध्यक्षता केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री करते हैं। कथन 3 गलत है: 'वन संरक्षण अधिनियम, 1980' के तहत किसी भी वन भूमि को गैर-वानिकी उद्देश्यों के लिए उपयोग करने (डाइवर्ट करने) के लिए केंद्र सरकार की पूर्व स्वीकृति लेना सख्त अनिवार्य है। राज्य सरकारें केंद्र सरकार की पूर्व स्वीकृति के बिना किसी भी वन भूमि को गैर-वानिकी उपयोग के लिए डायवर्ट नहीं कर सकती हैं, भले ही मामला लोक कल्याण या विकास परियोजनाओं से जुड़ा क्यों न हो।
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