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Civil services — Free MCQ Questions & Mock Test

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Civil services ki taiyari ke liye 2576+ free MCQ questions, explanation ke saath — practice karein aur apni tayyari mazboot banayein.

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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग XX' के अंतर्गत 'संविधान संशोधन' की प्रक्रिया (अनुच्छेद 368) और उसकी सीमाओं के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 368 के तहत संसद को संविधान के किसी भी उपबंध में संशोधन करने की शक्ति प्राप्त है, और संशोधन विधेयक संसद के किसी भी सदन में केवल राष्ट्रपति की पूर्व सिफ़ारिश से ही पुनःस्थापित किया जा सकता है। 2. संविधान के कुछ विशिष्ट उपबंधों, जैसे राष्ट्रपति के निर्वाचन की प्रक्रिया या संघ और राज्यों की कार्यपालिका शक्तियों के विस्तार से संबंधित संशोधनों के लिए, संसद के दोनों सदनों द्वारा विशेष बहुमत के साथ-साथ देश के कुल राज्यों में से कम-से-कम आधे राज्यों के विधानमंडलों द्वारा साधारण बहुमत से अनुसमर्थन (Ratification) होना अनिवार्य है। 3. उच्चतम न्यायालय द्वारा 'केशवानंद भारती वाद' (1973) में प्रतिपादित 'संविधान की मूल संरचना' (Basic Structure) के सिद्धांत के अंतर्गत न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) की शक्ति और मौलिक अधिकारों तथा नीति निर्देशक तत्वों के बीच संतुलन को शामिल किया गया है, और संसद संविधान संशोधन के माध्यम से भी मूल संरचना का उल्लंघन नहीं कर सकती है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग IX' (पंचायतें - अनुच्छेद 243 से 243O) के अंतर्गत त्रि-स्तरीय प्रणाली, सीटों के आरक्षण और वित्तीय शक्तियों के प्रावधानों के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 243B के अनुसार प्रत्येक राज्य में ग्राम, मध्यवर्ती और जिला स्तर पर पंचायतों का गठन किया जाएगा, किंतु बीस लाख से कम जनसंख्या वाले किसी राज्य के लिए यह अनिवार्य नहीं है कि वह मध्यवर्ती स्तर पर पंचायत का गठन करे। 2. संविधान के अनुच्छेद 243D के तहत प्रत्येक पंचायत में अनुसूचित जातियों (SCs) और अनुसूचित जनजातियों (STs) के लिए सीटों का आरक्षण उनकी जनसंख्या के अनुपात में प्रदान किया जाएगा, और महिलाओं के लिए सभी स्तरों पर कुल भरी जाने वाली प्रत्यक्ष निर्वाचन की सीटों में से कम-से-कम एक-तिहाई (1/3rd) सीटें आरक्षित होना अनिवार्य है, जिसमें महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों के भीतर SCs/STs की महिलाओं के लिए उप-आरक्षण का प्रावधान भी शामिल है। 3. संविधान के अनुच्छेद 243H के अंतर्गत किसी राज्य का विधानमंडल विधि द्वारा पंचायतों को कुछ कर, शुल्क, टोल और फीस आरोपित करने, वसूलने और विनियमित करने के लिए अधिकृत कर सकता है, तथा राज्य की संचित निधि से पंचायतों को सहायता-अनुदान (Grants-in-aid) देने का प्रावधान कर सकता है, जिसके लिए प्रत्येक राज्य में हर पाँच वर्ष पर एक 'वित्त आयोग' का गठन किया जाता है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग IV' के अंतर्गत 'राज्य के नीति निर्देशक तत्व' (Directive Principles of State Policy - DPSP - अनुच्छेद 36 से 51) तथा उनकी न्यायसंगतता के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 37 के अनुसार DPSP देश के शासन में मौलिक हैं और देश के लिए कानून बनाने में इन तत्वों को लागू करना राज्य का कर्तव्य होगा, किंतु ये तत्व किसी भी न्यायालय द्वारा न्यायसंगत (Justiciable) नहीं हैं, अर्थात इन्हें किसी न्यायालय द्वारा प्रवर्तित नहीं कराया जा सकता है। 2. संविधान में यद्यपि DPSP को गैर-न्यायसंगत बनाया गया है, किंतु सर्वोच्च न्यायालय ने अपने विभिन्न ऐतिहासिक निर्णयों (जैसे मिनर्वा मिल्स वाद, 1980) में यह प्रतिपादित किया है कि मौलिक अधिकारों और नीति निर्देशक तत्वों के बीच संतुलन संविधान की मूल संरचना (Basic Structure) का एक अनिवार्य हिस्सा है, और नीति निर्देशक तत्वों के क्रियान्वयन के लिए बनाए गए कानून को अनुच्छेद 14 या अनुच्छेद 19 के उल्लंघन के आधार पर पूरी तरह असंवैधानिक घोषित नहीं किया जा सकता यदि वह अनुच्छेद 39(b) या (c) के उद्देश्यों को पूरा करता हो। 3. संविधान के अनुच्छेद 44 के अंतर्गत 'समान नागरिक संहिता' (Uniform Civil Code) का प्रावधान एक ऐसा नीति निर्देशक तत्व है जिसे केवल संसद द्वारा ही पूरे देश के लिए एक साथ अधिनियमित किया जा सकता है, और किसी भी राज्य के विधानमंडल को अपने राज्य क्षेत्र के भीतर समान नागरिक संहिता से संबंधित कोई भी कानून बनाने की संवैधानिक शक्ति प्राप्त नहीं है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग IXख' (सहकारी समितियाँ - अनुच्छेद 243ZH से 243ZT) के अंतर्गत सहकारी समितियों के गठन, संचालन और उनके प्रावधानों के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान (97वाँ संशोधन) अधिनियम, 2011 द्वारा सहकारी समितियों के गठन के अधिकार को अनुच्छेद 19(1)(c) के तहत एक मूल अधिकार बनाया गया, तथा 'भाग IXख' को अंतःस्थापित करके सहकारी समितियों के स्वैच्छिक गठन, स्वायत्त कामकाज और लोकतांत्रिक नियंत्रण को संवैधानिक संरक्षण प्रदान किया गया। 2. संविधान के अनुच्छेद 243ZK के अनुसार किसी सहकारी समिति के बोर्ड के निदेशकों का निर्वाचन उस स्थिति में पाँच वर्ष की अवधि समाप्त होने से पहले कराया जाएगा, और यदि किसी सहकारी समिति के बोर्ड का किसी कारणवश अधिक्रमण (Supersession) या निलंबन किया जाता है, तो उसके विघटन की तिथि से अधिकतम छह महीने की अवधि के भीतर नए बोर्ड के गठन के लिए चुनाव कराना अनिवार्य होगा। 3. संविधान के अनुच्छेद 243ZF के प्रावधान के अनुसार किसी राज्य का विधानमंडल सहकारी समितियों से संबंधित कोई भी कानून बना सकता है, किंतु 97वें संविधान संशोधन अधिनियम के लागू होने की तिथि से पूर्व प्रवृत्त कोई भी राज्य सहकारी कानून यदि इस नए भाग के उपबंधों के असंगत है, तो वह स्वतः ही तुरंत शून्य (Void) हो जाएगा, बिना किसी राज्य विधायिका के संशोधन के। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग XIV' (संघ और राज्यों के अधीन सेवाएँ - अनुच्छेद 308 से 323) के अंतर्गत 'अखिल भारतीय सेवाओं' (All India Services) और लोक सेवा आयोगों के प्रावधानों के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 312 के अनुसार संसद को यह शक्ति प्राप्त है कि वह कानून द्वारा भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) और भारतीय पुलिस सेवा (IPS) के अतिरिक्त किसी अन्य नई अखिल भारतीय सेवा के सृजन का प्रावधान कर सके, बशर्ते राज्य सभा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम-से-कम दो-तिहाई बहुमत से यह संकल्प पारित कर दे कि राष्ट्रीय हित में ऐसा करना आवश्यक है। 2. अखिल भारतीय सेवाओं के सदस्यों की नियुक्ति और सेवा की शर्तों का निर्धारण करने की अंतिम शक्ति राष्ट्रपति में निहित होती है, किंतु इन सेवाओं के अधिकारियों को उनके पद से हटाने या अनुशासनात्मक कार्रवाई करने का अधिकार केवल संबंधित राज्य सरकार के पास होता है जहाँ वे सेवारत हैं, और केंद्र सरकार इस मामले में कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकती है। 3. संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) के किसी सदस्य को उसकी पदावधि की समाप्ति से पहले केवल राष्ट्रपति द्वारा साबित कदाचार या असमर्थता के आधार पर सर्वोच्च न्यायालय की जाँच रिपोर्ट के पश्चात ही हटाया जा सकता है, तथा UPSC के अध्यक्ष या सदस्य अपने पद से हटने के बाद भारत सरकार या किसी राज्य की सरकार के अधीन किसी भी प्रकार के नियोजन (Employment) के पात्र नहीं होते हैं। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग XII' के अंतर्गत 'वित्त, संपत्ति, संविदाएं और वाद' (अनुच्छेद 264 से 300क) तथा कर-आरोपण की विधायी शक्ति के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 265 के अनुसार किसी भी कर (Tax) को विधि के प्राधिकार (Authority of law) के बिना न तो अधिरोपित किया जा सकता है और न ही एकत्र किया जा सकता है, जिसका अर्थ है कि यह संरक्षण केवल कार्यपालिका के विरुद्ध उपलब्ध है और राज्य का विधानमंडल भी पूर्वव्यापी (Retrospective) प्रभाव से कर आरोपित नहीं कर सकता है। 2. संविधान की सातवीं अनुसूची की संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची में विभिन्न करों को आरोपित करने की स्पष्ट शक्तियाँ दी गई हैं, किंतु 'वस्तु एवं सेवा कर' (GST) से संबंधित विशेष प्रावधानों के तहत संसद और किसी भी राज्य के विधानमंडल को समवर्ती सूची के अंतर्गत GST से जुड़े विषयों पर कानून बनाने की अनन्य शक्ति 101वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2016 द्वारा प्रदान की गई है। 3. संविधान के अनुच्छेद 300क के अनुसार किसी भी व्यक्ति को उसकी संपत्ति से विधि के प्राधिकार के बिना वंचित नहीं किया जाएगा, और संपत्ति का अधिकार अब एक संवैधानिक अधिकार होने के साथ-साथ अनुच्छेद 300क के तहत एक विधिक अधिकार भी है, जिसके उल्लंघन पर सीधे अनुच्छेद 32 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया जा सकता है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग XV' (निर्वाचन - अनुच्छेद 324 से 329क) तथा 'भारत निर्वाचन आयोग' (Election Commission of India) के प्रावधानों के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 324 के अनुसार संसद, राज्य के विधानमंडलों, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के पदों के निर्वाचनों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की समस्त शक्ति एक निर्वाचन आयोग में निहित होगी, जिसमें मुख्य निर्वाचन आयुक्त और उतने ही अन्य निर्वाचन आयुक्त होते हैं जितने राष्ट्रपति समय-समय पर निर्धारित करें। 2. मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है, और मुख्य निर्वाचन आयुक्त को उसके पद से उसी रीति और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है जिस रीति और जिन आधारों पर उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है, जबकि अन्य निर्वाचन आयुक्तों को मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सिफारिश के बिना राष्ट्रपति द्वारा नहीं हटाया जा सकता है। 3. संविधान में निर्वाचन आयोग के सदस्यों की अर्हताओं (Qualifications) का विस्तार से उल्लेख किया गया है, जिसके तहत यह अनिवार्य किया गया है कि निर्वाचन आयोग का कोई भी सदस्य बनने के लिए व्यक्ति के पास विधायी या न्यायिक क्षेत्र का न्यूनतम 10 वर्षों का व्यावहारिक अनुभव होना चाहिए। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग XVIII' (आपात उपबंध - अनुच्छेद 352 से 360) के अंतर्गत 'राष्ट्रीय आपातकाल' (National Emergency) के उद्घोषणा और उसके प्रभावों के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 352 के अनुसार राष्ट्रपति द्वारा राष्ट्रीय आपातकाल की उद्घोषणा केवल तभी की जा सकती है जब मंत्रिमंडल (Cabinet) द्वारा इस आशय का लिखित विनिश्चय राष्ट्रपति को संसूचित किया जाए, और यह उद्घोषणा संसद के दोनों सदनों द्वारा इसके जारी होने की तिथि से एक महीने के भीतर विशेष बहुमत द्वारा अनुमोदित होना अनिवार्य है। 2. राष्ट्रीय आपातकाल के प्रवृत्त होने पर संविधान के अनुच्छेद 19 द्वारा प्रदत्त सभी छह मूल अधिकार स्वतः ही निलंबित हो जाते हैं, और इसके लिए राष्ट्रपति द्वारा किसी अलग से आदेश जारी करने की आवश्यकता नहीं होती है, तथा आपातकाल समाप्त होने के तुरंत बाद ये अधिकार पुनर्जीवित हो जाते हैं। 3. संविधान के अनुच्छेद 359 के अंतर्गत राष्ट्रपति को यह शक्ति प्राप्त है कि वह आदेश द्वारा राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान भाग III द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारों (अनुच्छेद 20 और 21 को छोड़कर) के प्रवर्तन को किसी न्यायालय में निलंबित कर सकता है, किंतु ऐसा आदेश संपूर्ण भारत या उसके किसी भाग तक ही सीमित हो सकता है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग XV' (निर्वाचन - अनुच्छेद 324 से 329क) तथा 'भारत निर्वाचन आयोग' (Election Commission of India) के अतिरिक्त अन्य संवैधानिक निकायों एवं निर्वाचन सुधारों के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 326 के अनुसार लोकसभा और राज्य की विधानसभाओं के लिए निर्वाचन वयस्क मताधिकार के आधार पर होंगे, जिसका तात्पर्य यह है कि प्रत्येक भारतीय नागरिक जो 18 वर्ष की आयु पूरी कर चुका है, उसे मतदान का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है और किसी भी व्यक्ति को केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर निर्वाचक नामावली में सम्मिलित किए जाने के लिए अपात्र घोषित नहीं किया जा सकता है। 2. संविधान के अनुच्छेद 327 के तहत संसद को यह अनन्य शक्ति प्राप्त है कि वह समय-समय पर विधि द्वारा संसदों और राज्य के विधानमंडलों के निर्वाचनों से संबंधित सभी मामलों (जिनमें मतदाता सूचियों की तैयारी, निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन और निर्वाचन के संचालन से जुड़े सभी अन्य विषय शामिल हैं) के संबंध में उपबंध कर सकती है। 3. 'परिसीमन आयोग अधिनियम' के अंतर्गत गठित परिसीमन आयोग (Delimitation Commission) के आदेशों को देश के किसी भी न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है, यदि वह आदेश संसद द्वारा निर्धारित नियमों या संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन करता हो, क्योंकि भारत में कोई भी वैधानिक निकाय न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर नहीं है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

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भारतीय अर्थव्यवस्था एवं सतत विकास के संदर्भ में, 'राष्ट्रीय हरित अधिकरण' (National Green Tribunal - NGT) और पर्यावरण संरक्षण से संबंधित सांविधिक प्रावधानों के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) की स्थापना राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 के अंतर्गत की गई थी, और यह देश का ऐसा पहला न्यायिक निकाय है जिसने अपने कामकाज के लिए भारत के संविधान की सातवीं अनुसूची की समवर्ती सूची के अंतर्गत पर्यावरण से जुड़े मामलों को हल करने के लिए अनिवार्य रूप से 'सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908' के कड़े प्रावधानों और सिद्धांतों का पालन करना वैधानिक रूप से अनिवार्य बनाया है। 2. NGT पर्यावरण से जुड़े किसी भी मामले में सिविल न्यायालयों की अधिकारिता को पूर्णतः बहिष्कृत करता है, तथा इस अधिकरण द्वारा दिए गए आदेश या निर्णय के विरुद्ध सीधे सर्वोच्च न्यायालय में न जाकर केवल संबंधित राज्य के उच्च न्यायालय में अपील दायर की जा सकती है, जिसके लिए अधिनियम के तहत 90 दिनों की समयावधि निर्धारित की गई है। 3. NGT को पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 की धारा 5 के तहत पर्यावरण प्रदूषण के निवारण और नियंत्रण से जुड़े आदेश पारित करने की शक्ति प्राप्त है, किंतु यह अधिकरण किसी भी उद्योग या इकाई के विरुद्ध स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लेते हुए पर्यावरण क्षतिपूर्ति (Environmental Compensation) या हर्जाने का आदेश जारी करने की शक्ति नहीं रखता है, जब तक कि कोई औपचारिक याचिका दायर न की जाए। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

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