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Indian Polity
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भारतीय संविधान के भाग-III (मूल अधिकार) के अंतर्गत प्रदत्त निवारक नजरबंदी (Preventive Detention) और उससे संबंधित संवैधानिक एवं विधिक सुरक्षा उपायों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. संविधान के अनुच्छेद 22 के उपबंधों के अनुसार किसी भी व्यक्ति को, जिसे निवारक नजरबंदी के अधीन गिरफ्तार किया गया है, तीन महीने से अधिक की अवधि के लिए तब तक निरुद्ध नहीं रखा जा सकता, जब तक कि किसी उच्च न्यायालय के न्यायाधीश या उसके समकक्ष योग्यता रखने वाले व्यक्तियों से मिलकर बने सलाहकार बोर्ड (Advisory Board) ने इस अवधि को बढ़ाने के लिए पर्याप्त कारण प्रतिवेदित न कर दिया हो।
  2. 2. 44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 द्वारा यह प्रावधान किया गया था कि निवारक नजरबंदी की अधिकतम अवधि को बिना सलाहकार बोर्ड की संस्तुति के तीन महीने से घटाकर दो महीने कर दिया जाए, तथा संसद को यह शक्ति दी गई कि वह बिना किसी संशोधन के इस अवधि को अनिश्चितकाल तक बढ़ा सकती है।
  3. 3. अनुच्छेद 22(5) के अंतर्गत निरुद्ध किए गए व्यक्ति को यह अधिकार प्राप्त है कि वह अपने ऊपर लगाए गए आदेश के विरुद्ध यथाशीघ्र अभ्यावेदन (Representation) करने का अवसर प्राप्त करे, किंतु राज्य प्राधिकारियों के लिए यह अनिवार्य नहीं है कि वे उस व्यक्ति द्वारा दिए गए अभ्यावेदन पर शीघ्रातिशीघ्र विचार करें।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 असत्य है: संविधान के अनुच्छेद 22(4) के अनुसार किसी भी व्यक्ति को निवारक नजरबंदी के अधीन 3 महीने से अधिक समय तक तब तक निरुद्ध नहीं रखा जा सकता जब तक कि सलाहकार बोर्ड (Advisory Board) ने निर्धारित अवधि के भीतर प्रतिवेदन न दे दिया हो। इस बोर्ड में उच्च न्यायालय के न्यायाधीश या वैसे ही योग्य व्यक्ति होते हैं, न कि केवल 'उच्च न्यायालय के न्यायाधीश'। कथन 2 असत्य है: 44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 द्वारा निवारक नजरबंदी की अवधि को बिना सलाहकार बोर्ड की संस्तुति के 3 महीने से घटाकर **दो महीने** करने का प्रावधान किया गया था, किंतु यह संशोधन आज तक लागू (प्रवृत्त) नहीं हो सका है, इसलिए वर्तमान में भी सामान्यतः 3 महीने की अवधि ही प्रभावी है। इसके अतिरिक्त, संसद को यह शक्ति नहीं है कि वह बिना बोर्ड की संस्तुति के इस अवधि को अनिश्चितकाल तक बढ़ा सके। कथन 3 असत्य है: अनुच्छेद 22(5) के तहत निरुद्ध व्यक्ति को नजरबंदी आदेश के विरुद्ध यथाशीघ्र अभ्यावेदन करने का अधिकार देने के साथ-साथ राज्य प्राधिकारियों का यह संवैधानिक दायित्व भी है कि वे उस अभ्यावेदन पर यथाशीघ्र (शीघ्रातिशीघ्र) विचार करें। इस विषय पर विस्तृत अध्ययन के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था का संदर्भ लें। अतः कोई भी कथन सही नहीं है।
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