Indian Polity
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भारतीय संविधान के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) की शक्तियों, अधिकारिता और संवैधानिक प्रावधानों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 137 के अनुसार उच्चतम न्यायालय को संसद द्वारा बनाई गई किसी विधि के या अनुच्छेद 135 के अधीन बनाए गए नियमों के उपबंधों के अधीन रहते हुए, अपने द्वारा सुनाए गए निर्णय या दिए गए आदेश का पुनर्विलोकन (Review) करने की शक्ति प्राप्त है, और यह शक्ति संसद के किसी भी अधिनियम द्वारा छीनी नहीं जा सकती क्योंकि यह न्यायिक पुनरावलोकन के बुनियादी ढाचे का हिस्सा है।
- 2. संविधान के अनुच्छेद 143 के तहत राष्ट्रपति को उच्चतम न्यायालय से परामर्श करने की शक्ति प्राप्त है, जिसके अंतर्गत यदि राष्ट्रपति किसी लोक महत्व के प्रश्न पर ऐसी राय मांगता है, तो उच्चतम न्यायालय के लिए उस पर अपनी राय देना संवैधानिक रूप से अनिवार्य (Mandatory) होता है।
- 3. अनुच्छेद 142 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय अपनी अधिकारिता का प्रयोग करते हुए ऐसा डिक्री या आदेश पारित कर सकता है जो उसके समक्ष लंबित किसी वाद या विषय में 'पूर्ण न्याय' (Complete Justice) करने के लिए आवश्यक हो, और भारत के राज्य क्षेत्र में ऐसे प्रत्येक आदेश का प्रवर्तनीय होना संसद द्वारा बनाई गई विधि या राष्ट्रपति के आदेश के अधीन होता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: संविधान के अनुच्छेद 137 के अनुसार उच्चतम न्यायालय को अपने द्वारा सुनाए गए निर्णय या आदेश का पुनर्विलोकन करने की शक्ति प्राप्त है। यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता और संविधान के मूल ढाँचे का अभिन्न अंग है। कथन 2 गलत है: अनुच्छेद 143 के तहत राष्ट्रपति विधि या तथ्य के किसी प्रश्न पर उच्चतम न्यायालय से परामर्श कर सकता है। यदि प्रश्न किसी पूर्व-संविधान संधि, समझौते या प्रसंविदा से संबंधित है, तो न्यायालय के लिए राय देना **अनिवार्य** है, किंतु अन्य सार्वजनिक महत्व के मामलों में उच्चतम न्यायालय के लिए राय देना अनिवार्य नहीं है, वह परामर्श देने से इनकार भी कर सकता है। कथन 3 गलत है: अनुच्छेद 142 के तहत 'पूर्ण न्याय' करने के लिए उच्चतम न्यायालय द्वारा पारित आदेश पूरे भारत में **स्वतः प्रवर्तनीय** होते हैं, और इसके लिए संसद की विधि या राष्ट्रपति के आदेश की कोई शर्त नहीं होती, बल्कि संसद या कार्यपालिका के कानून इसके अधीन हो सकते हैं। भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था के विस्तृत अध्ययन के लिए इस पोर्टल पर विजिट करें।
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भारतीय संविधान के अंतर्गत उच्च न्यायालयों (High Courts) की अधिकारिता, स्वतंत्रता और अधीनस्थ न्यायपालिका के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 215 के अनुसार प्रत्येक उच्च न्यायालय एक 'अभिलेख न्यायालय' (Court of Record) होगा और उसे अपनी अवमानना के लिए दंड देने की शक्ति सहित ऐसी न्यायालय के सभी शक्तियाँ प्राप्त होंगी, जिसमें संसद द्वारा बनाई गई किसी विधि के अधीन उसके क्षेत्राधिकार का विस्तार किसी संघ राज्य क्षेत्र (Union Territory) पर भी किया जा सकता है।
2. संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत प्रत्येक उच्च न्यायालय को अपने क्षेत्रीय अधिकारिता के भीतर आने वाले सभी न्यायालयों और अधिकरणों (Tribunals) पर अधीक्षण (Superintendence) की शक्ति प्राप्त है, और यह अधीक्षण शक्ति केवल प्रशासनिक मामलों तक ही सीमित है, न्यायिक निर्णयों की समीक्षा या पुनरीक्षण के लिए इस शक्ति का प्रयोग नहीं किया जा सकता है।
3. जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति, पोस्टिंग और पदोन्नति के संबंध में अनुच्छेद 233 के अंतर्गत राज्यपाल द्वारा राज्य के उच्च न्यायालय से परामर्श करना अनिवार्य है, किंतु न्यायिक सेवा के अन्य सदस्यों (जिला न्यायाधीशों से भिन्न) की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा राज्य लोक सेवा आयोग और उच्च न्यायालय के संयुक्त परामर्श से बनाए गए नियमों के तहत की जाती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के भाग-IV के अंतर्गत वर्णित राज्य के नीति निर्देशक तत्वों (DPSP) और उनके संशोधनों तथा ऐतिहासिक निर्णयों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 39A के अंतर्गत 'समान न्याय और निःशुल्क विधिक सहायता' का प्रावधान 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा जोड़ा गया था, जिसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि आर्थिक या अन्य असमर्थता के कारण कोई भी नागरिक न्याय पाने से वंचित न रहे।
2. सर्वोच्च न्यायालय ने 'मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ (1980)' मामले में यह निर्धारित किया था कि भारतीय संविधान की नींव मूल अधिकारों और नीति निर्देशक तत्वों के संतुलन पर आधारित है, और इनमें से किसी एक को पूर्णतः प्राथमिकता देना संविधान के बुनियादी ढाँचे (Basic Structure) का उल्लंघन होगा।
3. संविधान के अनुच्छेद 48A के अनुसार राज्य, देश के पर्यावरण के संरक्षण और संवर्द्धन का तथा वन और वन्य जीवों की रक्षा करने का प्रयास करेगा, जिसे मूल संविधान में ही शामिल किया गया था और बाद में 44वें संविधान संशोधन द्वारा इसमें संशोधन किया गया।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) और राज्य लोक सेवा आयोग (SPSC) की स्वतंत्रता, उनके सदस्यों की सेवा शर्तों और संवैधानिक प्रावधानों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 316 के अनुसार संघ लोक सेवा आयोग या किसी संयुक्त राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और अन्य सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है, जबकि राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और अन्य सदस्यों की नियुक्ति संबंधित राज्य के राज्यपाल द्वारा की जाती है।
2. संघ लोक सेवा आयोग या राज्य लोक सेवा आयोग के किसी सदस्य को उसकी पदावधि की समाप्ति पर उस आयोग के अध्यक्ष के रूप में अथवा किसी अन्य राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त किया जा सकता है, किंतु उसे भारत सरकार या किसी राज्य सरकार के अधीन किसी अन्य रोजगार का पात्र नहीं बनाया गया है।
3. संविधान के अनुच्छेद 318 के अंतर्गत संघ लोक सेवा आयोग के सदस्यों की संख्या और उनकी सेवा की शर्तों को विनियमित करने की शक्ति राष्ट्रपति में निहित है, जबकि राज्य लोक सेवा आयोग के संदर्भ में यह शक्ति संबंधित राज्य के राज्यपाल के पास होती है, तथा आयोग के सदस्यों की सेवा शर्तें उनकी नियुक्ति के पश्चात् उनके अहित में परिवर्तित की जा सकती हैं यदि राज्य में वित्तीय आपातकाल लागू हो।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के भाग-III (मूल अधिकार) के अंतर्गत प्रदत्त निवारक नजरबंदी (Preventive Detention) और उससे संबंधित संवैधानिक एवं विधिक सुरक्षा उपायों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 22 के उपबंधों के अनुसार किसी भी व्यक्ति को, जिसे निवारक नजरबंदी के अधीन गिरफ्तार किया गया है, तीन महीने से अधिक की अवधि के लिए तब तक निरुद्ध नहीं रखा जा सकता, जब तक कि किसी उच्च न्यायालय के न्यायाधीश या उसके समकक्ष योग्यता रखने वाले व्यक्तियों से मिलकर बने सलाहकार बोर्ड (Advisory Board) ने इस अवधि को बढ़ाने के लिए पर्याप्त कारण प्रतिवेदित न कर दिया हो।
2. 44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 द्वारा यह प्रावधान किया गया था कि निवारक नजरबंदी की अधिकतम अवधि को बिना सलाहकार बोर्ड की संस्तुति के तीन महीने से घटाकर दो महीने कर दिया जाए, तथा संसद को यह शक्ति दी गई कि वह बिना किसी संशोधन के इस अवधि को अनिश्चितकाल तक बढ़ा सकती है।
3. अनुच्छेद 22(5) के अंतर्गत निरुद्ध किए गए व्यक्ति को यह अधिकार प्राप्त है कि वह अपने ऊपर लगाए गए आदेश के विरुद्ध यथाशीघ्र अभ्यावेदन (Representation) करने का अवसर प्राप्त करे, किंतु राज्य प्राधिकारियों के लिए यह अनिवार्य नहीं है कि वे उस व्यक्ति द्वारा दिए गए अभ्यावेदन पर शीघ्रातिशीघ्र विचार करें।
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भारतीय संविधान के भाग-IV के अंतर्गत वर्णित 'राज्य के नीति निर्देशक तत्वों' (DPSP - अनुच्छेद 36-51) की प्रकृति, संशोधनों और न्यायिक व्याख्या के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 39(b) और 39(c) के अंतर्गत निहित नीति निर्देशक सिद्धांतों को प्रभावी बनाने के लिए संसद या राज्य विधानमंडलों द्वारा बनाई गई किसी विधि को इस आधार पर असंवैधानिक घोषित नहीं किया जा सकता कि वह अनुच्छेद 14 या अनुच्छेद 19 द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारों को छीनती या न्यून करती है, और यह संरक्षण मूल संविधान में ही निहित था जिसे बाद में 42वें संविधान संशोधन द्वारा विस्तारित किया गया था।
2. निर्देशक तत्वों को न्यायपालिका द्वारा अपरिवर्तनीय (Non-justiciable) घोषित किया गया है, किंतु सर्वोच्च न्यायालय ने अपने कई ऐतिहासिक निर्णयों (जैसे मिनर्वा मिल्स वाद, 1980) में यह स्पष्ट किया है कि मूल अधिकार और नीति निर्देशक तत्व एक-दूसरे के पूरक हैं और इनके बीच का संतुलन संविधान के 'मूल ढाँचे' (Basic Structure) का एक अनिवार्य हिस्सा है।
3. अनुच्छेद 48 के तहत राज्य कृषि और पशुपालन को आधुनिक और वैज्ञानिक प्रणालियों से संगठित करने के प्रयास करेगा, और विशेष रूप से गायों और बछड़ों तथा अन्य दुधारू और वाहक पशुओं की नस्लों के परीक्षण और सुधार के लिए तथा उनके वध का प्रतिषेध करने के लिए कदम उठाएगा, और यह एक समाजवादी विचारधारा पर आधारित नीति निर्देशक तत्व है।
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भारतीय संविधान के भाग I के अंतर्गत 'संघ एवं उसके राज्य क्षेत्र' (अनुच्छेद 1-4) और नए राज्यों के निर्माण या सीमा परिवर्तन की विधायी प्रक्रिया के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 2 के अंतर्गत संसद को यह शक्ति प्राप्त है कि वह संघ में नए राज्यों का प्रवेश या उनकी स्थापना ऐसे निबंधनों और शर्तों पर कर सके जो वह ठीक समझे, जबकि अनुच्छेद 3 के तहत संसद को मौजूदा राज्यों के क्षेत्रों, सीमाओं या नामों में परिवर्तन करने की शक्ति प्रदान की गई है।
2. अनुच्छेद 3 के तहत नए राज्यों के निर्माण या किसी राज्य के क्षेत्र, सीमा या नाम में परिवर्तन करने वाला कोई भी विधेयक संसद के किसी भी सदन में केवल तभी प्रस्तुत किया जा सकता है जब राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश प्राप्त हो, और राष्ट्रपति द्वारा ऐसा विधेयक संबंधित राज्य के विधानमंडल के पास उसकी राय जानने के लिए भेजा जाना संवैधानिक रूप से अनिवार्य है, भले ही राज्य विधानमंडल द्वारा दी गई राय को मानना संसद के लिए बाध्यकारी न हो।
3. अनुच्छेद 4 के स्पष्ट प्रावधान के अनुसार, अनुच्छेद 2 या अनुच्छेद 3 के तहत नए राज्यों के प्रवेश, स्थापना, या राज्यों के पुनर्गठन से संबंधित किए गए कानून संविधान के अनुच्छेद 368 के प्रयोजन के लिए 'संविधान संशोधन' माने जाएंगे, जिसके लिए संसद के विशेष बहुमत तथा आधे राज्यों के विधानमंडलों के अनुसमर्थन की अनिवार्य आवश्यकता होती है।
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