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भारतीय संविधान के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) की शक्तियों, क्षेत्राधिकारों और अवमानना से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. संविधान के अनुच्छेद 129 के तहत उच्चतम न्यायालय को एक 'अभिलेख न्यायालय' (Court of Record) का दर्जा दिया गया है, जिसके अंतर्गत उसे न केवल अपने निर्णयों और अभिलेखों को सुरक्षित रखने का अधिकार है, बल्कि उसे स्वयं की अवमानना (Contempt of Court) के लिए दंडित करने की शक्ति भी प्राप्त है, जिसमें आपराधिक अवमानना के मामलों में सच्चाई (Truth) को एक पूर्ण और सर्वव्यापी बचाव के रूप में मान्यता दी गई है।
  2. 2. संविधान के अनुच्छेद 137 के अधीन उच्चतम न्यायालय को संसद द्वारा बनाई गई किसी भी विधि या अनुच्छेद 145 के अधीन बनाए गए नियमों के अधीन रहते हुए, अपने द्वारा दिए गए किसी निर्णय या आदेश का पुनरावलोकन (Review) करने की शक्ति प्राप्त है।
  3. 3. जनहित याचिका (PIL) की अवधारणा के विकास के साथ उच्चतम न्यायालय ने ' epistolary jurisdiction' (पत्राचार क्षेत्राधिकार) को स्वीकार किया है, जिसके तहत न्यायालय किसी भी सार्वजनिक हित के मामले में पीड़ित व्यक्ति द्वारा औपचारिक याचिका दायर न किए जाने पर केवल एक पत्र या पोस्टकार्ड को भी रिट याचिका के रूप में संज्ञान में ले सकता है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 असत्य है क्योंकि 'न्यायालय की अवमानना (संशोधन) अधिनियम, 2006' के अनुसार, यदि जनहित में किसी आपराधिक अवमानना के मामले में कथित बात या तथ्य पूर्णतः सत्य (True) है और उसका प्रकाशन जनहित में सद्भावपूर्वक किया गया है, तो न्यायालय इसे अवमानना की कार्यवाही में बचाव के रूप में स्वीकार कर सकता है; किंतु यह कोई पूर्ण और सर्वव्यापी (Absolute) बचाव नहीं है, बल्कि अदालत संतुष्ट होने पर ही इसे मानती है। इसके अतिरिक्त, न्यायालय की अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 13 के तहत न्यायालय बिना लोक हित और न्याय के वास्तविक प्रभाव की संतुष्टि के केवल सत्य को आधार नहीं मानता, लेकिन सामान्यतः कथन 1 में आपराधिक अवमानना में सच्चाई को पूर्ण बचाव बताना तकनीकी रूप से विधि और संशोधनों के संदर्भ में त्रुटिपूर्ण है क्योंकि न्यायालय सच्चाई को तभी स्वीकार करता है जब लोकहित जुड़ा हो और न्याय में बाधा न आए। कथन 2 सत्य है, अनुच्छेद 137 के तहत सर्वोच्च न्यायालय को अपने निर्णयों की समीक्षा (Review) करने की शक्ति प्राप्त है। कथन 3 सत्य है, पीआईएल के तहत पत्र या पोस्टकार्ड को भी रिट याचिका के रूप में स्वीकार करने की परंपरा 'एपिस्टोलरी ज्यूरिसडिक्शन' कहलाती है। अधिक जानकारी के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पोर्टल पर विजिट करें।
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