BaalVikas
Menu
History of India
Asked 2 months ago · Viewed 18 times

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना (1885) से लेकर सूरत विभाजन (1907) तक के कालखंड में नरम दल और गरम दल के वैचारिक संघर्ष, रणनीतियों तथा राष्ट्रीय आंदोलन के विकास के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. कांग्रेस के प्रारंभिक 'नरमपंथी' चरण (1885-1905) के नेताओं का मुख्य विश्वास 'ब्रिटिश न्यायप्रियता' में था, और वे अपनी मांगों को मनवाने के लिए मुख्य रूप से प्रार्थना, याचिका, प्रतिनिधिमंडल और प्रेस के माध्यम से 'संवैधानिक आंदोलन' की नीति पर चलते थे जिसे गरम दल के नेताओं ने 'राजनीतिक भिक्षावृत्ति' (Political Mendicancy) कहा था।
  2. 2. वर्ष 1905 में बंगाल विभाजन के विरोध में उपजे स्वदेशी और बहिष्कार आंदोलन के दौरान गरम दल के नेताओं (लाल-बाल-पाल तथा अरविंद घोष) ने इस आंदोलन को केवल बंगाल तक सीमित रखने के बजाय पूरे देश में फैलाने तथा ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ 'निष्क्रिय प्रतिरोध' (Passive Resistance) और स्वराज प्राप्ति का सीधा आह्वान किया था।
  3. 3. वर्ष 1906 के कलकत्ता अधिवेशन में दादाभाई नौरोजी की अध्यक्षता में कांग्रेस ने पहली बार 'स्वराज' (Self-Government) को अपने लक्ष्य के रूप में स्वीकार किया, किंतु गरम दल और नरम दल के वैचारिक मतभेदों के कारण वर्ष 1907 के सूरत अधिवेशन में कांग्रेस का औपचारिक विभाजन हो गया और संगठन पर नरमपंथियों का नियंत्रण हो गया।
  4. 4. सूरत विभाजन के पश्चात ब्रिटिश सरकार ने गरम दल के नेताओं के विरुद्ध कठोर दमन चक्र चलाया, जिसके तहत लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक को राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर 6 वर्ष के कारावास के लिए मांडले (बर्मा) भेज दिया गया, जबकि लाला लाजपत राय और बिपिन चंद्र पाल को भी निर्वासित कर दिया गया था।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?

Detailed Explanation

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रारंभिक चरण में उदारवादियों (नरम दल) की कार्यपद्धति ब्रिटिश न्यायप्रियता पर आधारित थी जिसे गरम दल ने 'राजनीतिक भिक्षावृत्ति' की संज्ञा दी। बंगाल विभाजन के बाद गरम दल ने 'स्वराज' और 'निष्क्रिय प्रतिरोध' को राष्ट्रीय एजेंडा बनाया। 1906 के कलकत्ता अधिवेशन में स्वराज का प्रस्ताव पारित हुआ और 1907 के सूरत अधिवेशन में वैचारिक मतभेदों के चलते कांग्रेस का विभाजन हुआ, जिसके बाद बाल गंगाधर तिलक को मांडले जेल भेजा गया। इस ऐतिहासिक कालखंड के विस्तृत अध्ययन के लिए आप विकिपीडिया संदर्भ देख सकते हैं।
Share:
अगला प्रश्न → मध्यकालीन भारत के भक्ति और सूफी आंदोलनों के वैचारिक विकास, संतों के दार्शनिक… ← पिछला प्रश्न बंगाल विभाजन (1905) के निर्णय की घोषणा के पश्चात उपजे…

Related Questions

→ चंपारण सत्याग्रह (1917) और खेड़ा सत्याग्रह (1918) के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. चंपारण में यूरोपीय नील बागान मालिकों द्वारा किसानों पर 'तीनकठिया' प्रणाली थोपी गई थी, जिसके तहत किसानों को अपनी भूमि के प्रत्येक बीघे के तीन-बीसवें हिस्से पर अनिवार्य रूप से नील की खेती करनी पड़ती थी। 2. खेड़ा सत्याग्रह के दौरान फसलें नष्ट हो जाने और अकाल की स्थिति होने के बावजूद जब ब्रिटिश प्रशासन ने राजस्व वसूली माफ नहीं की, तो गांधीजी ने किसानों को लगान न चुकाने का आह्वान किया, और इसी आंदोलन के दौरान सरदार वल्लभभाई पटेल गांधीजी के प्रमुख सहयोगियों के रूप में उभरे। 3. चंपारण सत्याग्रह के सफल होने के बाद महात्मा गांधी ने पहली बार भारत में 'भूख हड़ताल' (Hunger Strike) का अस्त्र के रूप में प्रयोग किया था, तथा खेड़ा सत्याग्रह उनका पहला सविनय अवज्ञा (Civil Disobedience) प्रयोग था। 4. चंपारण जाँच समिति के समक्ष किसानों की समस्याओं को उजागर करने में राजकुमार शुक्ल ने निर्णायक भूमिका निभाई थी, और इस समिति के एक सदस्य के रूप में महात्मा गांधी ने भी हस्ताक्षर किए थे जिससे बागान मालिकों की मनमानी समाप्त हुई। उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं? → वैदिक सभ्यता और वैदिक साहित्य के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. ऋग्वैदिक काल में लोहे का व्यापक प्रयोग शुरू हो चुका था, जिसके कारण किसानों ने जंगलों को साफ करके उपजाऊ भूमि तैयार की और स्थायी कृषि बस्तियों का निर्माण किया। 2. उत्तर वैदिक काल में 'गोत्र' प्रथा की संस्थागत स्थापना हुई, जिसका शाब्दिक अर्थ 'गोष्ठ' या वह स्थान है जहाँ पूरे कुल का मवेशी पाला जाता था, और इस काल में गोत्र के भीतर विवाह (सगोत्र विवाह) पूरी तरह वर्जित कर दिए गए। 3. ऋग्वैदिक समाज में वर्ण व्यवस्था मुख्य रूप से जन्म पर आधारित थी, जहाँ किसी भी व्यक्ति का वर्ण उसके जन्म के साथ ही तय हो जाता था और उसमें परिवर्तन करने की कोई गुंजाइश नहीं थी। 4. वैदिक साहित्य में 'शतपथ ब्राह्मण' में कृषि की चारों क्रियाओं—जुताई, बुआई, कटाई और मड़ाई—का विस्तृत वर्णन मिलता है, जो उत्तर वैदिक काल में कृषि अर्थव्यवस्था के महत्व को दर्शाता है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं? → 1857 के महान विद्रोह के दौरान बिहार के विभिन्न क्षेत्रों (पटना, दानापुर, आरा, मुजफ्फरपुर और छपरा) में हुए घटनाक्रमों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. पटना में 3 जुलाई 1857 को हुए विद्रोह का नेतृत्व पीर अली खान नामक एक पुस्तक विक्रेता ने किया था, जिसे कमिश्नर विलियम टेलर के कठोर दमन चक्र के तहत गिरफ्तार कर सार्वजनिक रूप से फांसी दे दी गई थी। 2. दानापुर छावनी के 7वीं, 8वीं और 40वीं देशी पैदल सेना (Infantry) के सिपाहियों ने 25 जुलाई 1857 को विद्रोह कर दिया और सोन नदी पार कर जगदीशपुर के बाबू कुंवर सिंह से जा मिले। 3. मुजफ्फरपुर और छपरा के क्षेत्रों में यूरोपीय अधिकारियों तथा अफीम एजेंटों के विरुद्ध स्थानीय सिपाहियों, अफीम गोदाम के कर्मचारियों और भूमिहीनों ने अंग्रेजों के संचार साधनों को बाधित करते हुए विद्रोह का झंडा बुलंद किया था। 4. छपरा में विद्रोहियों ने कमिश्नर विलियम टेलर को पराजित कर शहर पर पूर्ण अधिकार कर लिया था और वहां एक समानांतर ब्रिटिश-विरोधी सरकार की औपचारिक स्थापना की घोषणा कर दी थी। उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं? → मध्यकालीन भारत के भक्ति और सूफी आंदोलनों के वैचारिक विकास, प्रमुख संतों के दार्शनिक सिद्धांतों तथा उनके ऐतिहासिक प्रभावों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. वल्लभाचार्य ने 'शुद्धअद्वैतवाद' (Pure Non-dualism) के दर्शन का प्रतिपादन किया, जिसके अनुसार जगत माया का परिणाम नहीं बल्कि स्वयं ब्रह्म का वास्तविक रूपांतरण है, तथा उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण की 'पुष्टिमार्ग' (Grace-based devotion) के माध्यम से उपासना पर विशेष बल दिया। 2. सूफी सिलसिले के अंतर्गत 'फिरदौसी सिलसिला' मुख्य रूप से बिहार क्षेत्र में अत्यधिक लोकप्रिय हुआ, और इस सिलसिले के सबसे प्रसिद्ध एवं सम्मानित संत शेख बदरुद्दीन समरकंदी थे, जिन्होंने स्थानीय जनता के बीच आध्यात्मिक और सामाजिक सुधारों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 3. मध्यकालीन संत मीराबाई ने राजसी सुखों का त्याग कर भगवान कृष्ण को अपना पति मानकर 'माधुर्य भाव' की भक्ति की, और उनके पद मुख्य रूप से मारवाड़ी और ब्रज भाषा में रचे गए हैं, जिन्हें राजस्थान और गुजरात के लोक-मानस में अत्यधिक प्रतिष्ठा प्राप्त हुई। 4. सूफी संतों में 'सुहरावर्दी सिलसिला' ने चिश्ती सिलसिले के ठीक विपरीत रुख अपनाते हुए शाही अनुदान, जागीरें और उच्च राजकीय पदों को सहर्ष स्वीकार किया, तथा उनके संतों का मानना था कि आध्यात्मिक उन्नति के लिए राज्य का संरक्षण और धन का होना आवश्यक है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं? → मुगल काल में "खुलासत-उत-तवारीख" के लेखक कौन हैं? → महाभारत का फारसी अनुवाद "रज़्मनामा" किसके निर्देशन में किया गया था?
Log in to add to quiz, bookmark, or report issues.