Indian Polity
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भारतीय संविधान के अंतर्गत राज्य के नीति निर्देशक तत्वों (DPSP - अनुच्छेद 36-51) में शामिल विभिन्न सिद्धांतों तथा उनके वर्गीकरण के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान में नीति निर्देशक तत्वों को स्पष्ट रूप से समाजवादी, गांधीवादी और उदारवादी-बौद्धिक श्रेणियों में वर्गीकृत नहीं किया गया है, किंतु इनकी वैचारिक अंतर्वस्तु (Ideological Content) के आधार पर अनुच्छेद 40 (ग्राम पंचायतों का संगठन) और अनुच्छेद 43 (कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहन) को गांधीवादी आदर्शों के अंतर्गत रखा जाता है।
- 2. वर्ष 1976 के 42वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा नीति निर्देशक तत्वों में कुछ नए तत्वों को जोड़ा गया, जिनमें बच्चों के स्वस्थ विकास के लिए अवसरों को सुरक्षित करना (अनुच्छेद 39), समान न्याय और निःशुल्क विधिक सहायता (अनुच्छेद 39क), तथा उद्योगों के प्रबंधन में श्रमिकों की भागीदारी (अनुच्छेद 43क) शामिल हैं।
- 3. संविधान के अनुच्छेद 44 में उल्लिखित 'समान नागरिक संहिता' (Uniform Civil Code) को उदारवादी-बौद्धिक सिद्धांतों के अंतर्गत शामिल किया गया है, और यह देश के पूरे राज्यक्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता को सुनिश्चित करने का केवल एक निर्देश है, जिसे किसी भी राज्य द्वारा नीतिगत रूप से लागू करना पूरी तरह अनिवार्य और न्यायोचित रूप से बाध्यकारी है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: भारतीय संविधान के मूल पाठ में नीति निर्देशक तत्वों (DPSP) को समाजवादी, गांधीवादी या उदारवादी श्रेणियों में औपचारिक रूप से वर्गीकृत नहीं किया गया है, लेकिन उनकी वैचारिक प्रकृति के आधार पर विद्वान उन्हें इन वर्गों में विभाजित करते हैं। अनुच्छेद 40 और 43 गांधीवादी सिद्धांतों के अंतर्गत आते हैं। कथन 2 सही है: 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा नीति निर्देशक तत्वों में अनुच्छेद 39(f), अनुच्छेद 39A, अनुच्छेद 43A और अनुच्छेद 48A जोड़े गए थे। कथन 3 गलत है: अनुच्छेद 44 के तहत समान नागरिक संहिता उदारवादी-बौद्धिक सिद्धांत के अंतर्गत आती है, किंतु अनुच्छेद 37 के अनुसार नीति निर्देशक तत्व न्यायोचित (Justiciable) नहीं हैं, अर्थात् इन्हें किसी न्यायालय द्वारा बाध्यकारी रूप से प्रवर्तित नहीं कराया जा सकता है। विस्तृत अध्ययन के लिए आप भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था के अनुभाग को देख सकते हैं।
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भारतीय संविधान के भाग IV-क के अंतर्गत वर्णित 'मूल कर्तव्यों' (Fundamental…
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भारतीय संविधान के अंतर्गत शामिल 'मूल कर्तव्यों'…
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भारतीय संविधान के भाग II (अनुच्छेद 5-11) के अंतर्गत प्रदत्त नागरिकता के प्रावधानों और नागरिकता संशोधन अधिनियमों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 9 के अनुसार यदि कोई भारतीय नागरिक स्वेच्छा से किसी विदेशी राज्य की नागरिकता प्राप्त कर लेता है, तो उसकी भारतीय नागरिकता स्वतः समाप्त (Termination) हो जाएगी, और यह नियम युद्ध काल या शांति काल दोनों ही परिस्थितियों में समान रूप से प्रभावी होता है।
2. नागरिकता अधिनियम, 1957 (मूल रूप से 1955) के अंतर्गत भारत में जन्म से (By Birth) नागरिकता प्राप्त करने के नियम में समय-समय पर संशोधन किए गए हैं, जिसके तहत 1 जुलाई 1987 के पश्चात भारत में जन्मे किसी भी व्यक्ति को अब स्वचालित रूप से भारत की नागरिकता प्राप्त हो जाती है, भले ही उसके माता-पिता में से कोई एक उस समय भारत का अवैध प्रवासी (Illegal Migrant) ही क्यों न हो।
3. संविधान का अनुच्छेद 11 संसद को नागरिकता के अर्जन और समाप्ति तथा नागरिकता से संबंधित अन्य सभी विषयों के संबंध में विधि बनाने की संपूर्ण शक्ति प्रदान करता है, और संसद द्वारा इसी शक्ति का प्रयोग करते हुए नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 2019 (CAA) पारित किया गया था, जो पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए छह विशिष्ट अल्पसंख्यकों को लक्षित करता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के अंतर्गत राष्ट्रपति के निर्वाचन, उनकी पदावधि, महाभियोग प्रक्रिया और कार्यकारी शक्तियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राष्ट्रपति के निर्वाचन के लिए निर्वाचक कॉलेज (Electoral College) में संसद के दोनों सदनों के सभी निर्वाचित और मनोनीत सदस्य शामिल होते हैं, तथा इसके साथ ही राज्यों की विधानसभाओं और संघ राज्य क्षेत्रों (दिल्ली, पुडुचेरी और जम्मू-कश्मीर) के निर्वाचित सदस्य भी भाग लेते हैं।
2. संविधान के अनुच्छेद 61 के अनुसार राष्ट्रपति पर महाभियोग (Impeachment) केवल 'संविधान के अतिक्रमण' के आधार पर चलाया जा सकता है, और इस महाभियोग प्रस्ताव को संसद के किसी भी सदन में तब तक पुनः स्थापित नहीं किया जा सकता जब तक कि उस सदन के कुल सदस्यों के कम से कम एक-चौथाई सदस्यों द्वारा हस्ताक्षरित लिखित सूचना न दी गई हो।
3. संघ की सभी कार्यकारी शक्तियां राष्ट्रपति में निहित होती हैं, जिनका प्रयोग वह संविधान के अनुसार स्वयं या अपने अधीनस्थ अधिकारियों के माध्यम से करता है, और अनुच्छेद 78 के अंतर्गत प्रधानमंत्री का यह संवैधानिक कर्तव्य है कि वह संघ के प्रशासन और विधान विषयक प्रस्तावों से संबंधित मंत्रिपरिषद की सभी सूचनाएँ राष्ट्रपति को संसूचित करे।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के अंतर्गत केंद्र-राज्य विधायी एवं प्रशासनिक संबंधों तथा अंतर-राज्यीय परिषद् (Inter-State Council) के प्रावधानों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 263 के अंतर्गत राष्ट्रपति को अंतर-राज्यीय परिषद् की स्थापना करने की शक्ति प्राप्त है, और इस परिषद् का मुख्य कार्य राज्यों के बीच उत्पन्न होने वाले विवादों की जाँच करना, उन पर सलाह देना तथा ऐसे विषयों पर चर्चा करना है जिनमें राज्यों या संघ और एक या अधिक राज्यों के सामान्य हित निहित हों।
2. अंतर-राज्यीय परिषद् के गठन की संस्तुति सर्वप्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग (Administrative Reforms Commission - 1966) द्वारा की गई थी, जिसके पश्चात सरकारी आयोग (Sarkaria Commission - 1983-88) की प्रबल अनुशंसा पर राष्ट्रपति ने वर्ष 1990 में एक आदेश द्वारा इस स्थायी निकाय की स्थापना की थी।
3. अनुच्छेद 263 के तहत गठित अंतर-राज्यीय परिषद् की बैठकों की अध्यक्षता प्रधानमंत्री द्वारा की जाती है, और इस परिषद् के निर्णयों या संस्तुतियों की प्रकृति पूरी तरह से बाध्यकारी (Binding) होती है, जिन्हें केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा अनिवार्य रूप से लागू किया जाना विधिवत आवश्यक है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के 74वें संशोधन अधिनियम, 1992 और शहरी स्थानीय शासन के प्रावधानों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 243-S के अनुसार प्रत्येक नगरपालिका क्षेत्र के भीतर वार्डों या अन्य क्षेत्रीय क्षेत्रों के गठन के लिए 'वार्ड समितियों' (Ward Committees) का गठन किया जाना अनिवार्य है, और यह प्रावधान केवल उन्हीं नगरपालिकाओं पर लागू होता है जिनकी जनसंख्या तीन लाख या उससे अधिक है।
2. अनुच्छेद 243-ZF के अंतर्गत यह प्रावधान किया गया है कि इस संशोधन के लागू होने के समय (जून 1993) राज्यों में पहले से विद्यमान सभी नगरपालिका विधियाँ तब तक प्रवृत्त बनी रहेंगी जब तक कि वे इस संशोधन के उपबंधों के असंगत होने के कारण किसी सक्षम विधानमंडल या अन्य प्राधिकारी द्वारा निरस्त या संशोधित नहीं कर दी जातीं, अथवा इस अधिनियम के प्रारंभ से एक वर्ष की अवधि समाप्त नहीं हो जाती।
3. अनुच्छेद 243-ZE के प्रावधानों के तहत प्रत्येक राज्य में एक महानगर योजना समिति (Metropolitan Planning Committee) का गठन किया जाएगा, जिसका मुख्य कार्य महानगर क्षेत्र के लिए विकास योजना तैयार करना है, और इस समिति के कुल सदस्यों में से कम से कम दो-तिहाई (66.66%) सदस्य उस महानगर क्षेत्र की नगरपालिकाओं के निर्वाचित सदस्यों और पंचायतों के अध्यक्षों द्वारा अपने में से ही चुने जाएंगे।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के भाग-IV के अंतर्गत वर्णित 'राज्य के नीति निर्देशक तत्वों' (DPSP - अनुच्छेद 36-51) की प्रकृति, संशोधनों और न्यायिक व्याख्या के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 39(b) और 39(c) के अंतर्गत निहित नीति निर्देशक सिद्धांतों को प्रभावी बनाने के लिए संसद या राज्य विधानमंडलों द्वारा बनाई गई किसी विधि को इस आधार पर असंवैधानिक घोषित नहीं किया जा सकता कि वह अनुच्छेद 14 या अनुच्छेद 19 द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारों को छीनती या न्यून करती है, और यह संरक्षण मूल संविधान में ही निहित था जिसे बाद में 42वें संविधान संशोधन द्वारा विस्तारित किया गया था।
2. निर्देशक तत्वों को न्यायपालिका द्वारा अपरिवर्तनीय (Non-justiciable) घोषित किया गया है, किंतु सर्वोच्च न्यायालय ने अपने कई ऐतिहासिक निर्णयों (जैसे मिनर्वा मिल्स वाद, 1980) में यह स्पष्ट किया है कि मूल अधिकार और नीति निर्देशक तत्व एक-दूसरे के पूरक हैं और इनके बीच का संतुलन संविधान के 'मूल ढाँचे' (Basic Structure) का एक अनिवार्य हिस्सा है।
3. अनुच्छेद 48 के तहत राज्य कृषि और पशुपालन को आधुनिक और वैज्ञानिक प्रणालियों से संगठित करने के प्रयास करेगा, और विशेष रूप से गायों और बछड़ों तथा अन्य दुधारू और वाहक पशुओं की नस्लों के परीक्षण और सुधार के लिए तथा उनके वध का प्रतिषेध करने के लिए कदम उठाएगा, और यह एक समाजवादी विचारधारा पर आधारित नीति निर्देशक तत्व है।
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भारतीय संविधान के भाग I के अंतर्गत 'संघ एवं उसके राज्य क्षेत्र' (अनुच्छेद 1-4) और नए राज्यों के निर्माण या सीमा परिवर्तन की विधायी प्रक्रिया के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 2 के अंतर्गत संसद को यह शक्ति प्राप्त है कि वह संघ में नए राज्यों का प्रवेश या उनकी स्थापना ऐसे निबंधनों और शर्तों पर कर सके जो वह ठीक समझे, जबकि अनुच्छेद 3 के तहत संसद को मौजूदा राज्यों के क्षेत्रों, सीमाओं या नामों में परिवर्तन करने की शक्ति प्रदान की गई है।
2. अनुच्छेद 3 के तहत नए राज्यों के निर्माण या किसी राज्य के क्षेत्र, सीमा या नाम में परिवर्तन करने वाला कोई भी विधेयक संसद के किसी भी सदन में केवल तभी प्रस्तुत किया जा सकता है जब राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश प्राप्त हो, और राष्ट्रपति द्वारा ऐसा विधेयक संबंधित राज्य के विधानमंडल के पास उसकी राय जानने के लिए भेजा जाना संवैधानिक रूप से अनिवार्य है, भले ही राज्य विधानमंडल द्वारा दी गई राय को मानना संसद के लिए बाध्यकारी न हो।
3. अनुच्छेद 4 के स्पष्ट प्रावधान के अनुसार, अनुच्छेद 2 या अनुच्छेद 3 के तहत नए राज्यों के प्रवेश, स्थापना, या राज्यों के पुनर्गठन से संबंधित किए गए कानून संविधान के अनुच्छेद 368 के प्रयोजन के लिए 'संविधान संशोधन' माने जाएंगे, जिसके लिए संसद के विशेष बहुमत तथा आधे राज्यों के विधानमंडलों के अनुसमर्थन की अनिवार्य आवश्यकता होती है।
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