Indian Polity
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भारतीय संविधान के अंतर्गत केंद्र-राज्य विधायी एवं प्रशासनिक संबंधों तथा अंतर-राज्यीय परिषद् (Inter-State Council) के प्रावधानों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 263 के अंतर्गत राष्ट्रपति को अंतर-राज्यीय परिषद् की स्थापना करने की शक्ति प्राप्त है, और इस परिषद् का मुख्य कार्य राज्यों के बीच उत्पन्न होने वाले विवादों की जाँच करना, उन पर सलाह देना तथा ऐसे विषयों पर चर्चा करना है जिनमें राज्यों या संघ और एक या अधिक राज्यों के सामान्य हित निहित हों।
- 2. अंतर-राज्यीय परिषद् के गठन की संस्तुति सर्वप्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग (Administrative Reforms Commission - 1966) द्वारा की गई थी, जिसके पश्चात सरकारी आयोग (Sarkaria Commission - 1983-88) की प्रबल अनुशंसा पर राष्ट्रपति ने वर्ष 1990 में एक आदेश द्वारा इस स्थायी निकाय की स्थापना की थी।
- 3. अनुच्छेद 263 के तहत गठित अंतर-राज्यीय परिषद् की बैठकों की अध्यक्षता प्रधानमंत्री द्वारा की जाती है, और इस परिषद् के निर्णयों या संस्तुतियों की प्रकृति पूरी तरह से बाध्यकारी (Binding) होती है, जिन्हें केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा अनिवार्य रूप से लागू किया जाना विधिवत आवश्यक है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 263 के अनुसार यदि राष्ट्रपति को यह प्रतीत हो कि अंतर-राज्यीय परिषद् की स्थापना से लोकहित की प्राप्ति होगी, तो वह ऐसी परिषद् की स्थापना कर सकता है। इसके कार्य राज्यों के बीच विवादों की जाँच करना, उनके सामान्य हितों पर चर्चा करना और समन्वय स्थापित करना है। कथन 2 सही है: अंतर-राज्यीय परिषद् के गठन की सिफारिश सबसे पहले प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग (1966) ने की थी। इसके बाद सरकारी आयोग (1983-88) ने भी इसे एक स्थायी निकाय के रूप में स्थापित करने की जोरदार वकालत की, जिसके परिणामस्वरूप जनता दल सरकार द्वारा मई 1990 में राष्ट्रपति के आदेश से इसका गठन किया गया। कथन 3 गलत है: अंतर-राज्यीय परिषद् की बैठकों की अध्यक्षता प्रधानमंत्री (या उनके द्वारा नामित कोई कैबिनेट मंत्री) करते हैं, किंतु इस परिषद् द्वारा दी जाने वाली संस्तुतियाँ या निर्णय प्रकृति में केवल विचार-विमर्श और सलाहकारी (Advisory) होते हैं, वे केंद्र या राज्य सरकारों पर किसी भी प्रकार से बाध्यकारी (Binding) नहीं होते हैं। भारतीय संविधान के विभिन्न पहलुओं को गहराई से समझने के लिए आप भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था के विस्तृत पाठ्यक्रम का अध्ययन कर सकते हैं।
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भारतीय संविधान के अंतर्गत शामिल 'मूल कर्तव्यों' (Fundamental Duties) की…
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भारतीय संविधान के अंतर्गत राज्य के नीति निर्देशक तत्वों (DPSP - अनुच्छेद 36-51) में शामिल विभिन्न सिद्धांतों तथा उनके वर्गीकरण के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान में नीति निर्देशक तत्वों को स्पष्ट रूप से समाजवादी, गांधीवादी और उदारवादी-बौद्धिक श्रेणियों में वर्गीकृत नहीं किया गया है, किंतु इनकी वैचारिक अंतर्वस्तु (Ideological Content) के आधार पर अनुच्छेद 40 (ग्राम पंचायतों का संगठन) और अनुच्छेद 43 (कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहन) को गांधीवादी आदर्शों के अंतर्गत रखा जाता है।
2. वर्ष 1976 के 42वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा नीति निर्देशक तत्वों में कुछ नए तत्वों को जोड़ा गया, जिनमें बच्चों के स्वस्थ विकास के लिए अवसरों को सुरक्षित करना (अनुच्छेद 39), समान न्याय और निःशुल्क विधिक सहायता (अनुच्छेद 39क), तथा उद्योगों के प्रबंधन में श्रमिकों की भागीदारी (अनुच्छेद 43क) शामिल हैं।
3. संविधान के अनुच्छेद 44 में उल्लिखित 'समान नागरिक संहिता' (Uniform Civil Code) को उदारवादी-बौद्धिक सिद्धांतों के अंतर्गत शामिल किया गया है, और यह देश के पूरे राज्यक्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता को सुनिश्चित करने का केवल एक निर्देश है, जिसे किसी भी राज्य द्वारा नीतिगत रूप से लागू करना पूरी तरह अनिवार्य और न्यायोचित रूप से बाध्यकारी है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के भाग IV-क के अंतर्गत वर्णित 'मूल कर्तव्यों' (Fundamental Duties) के प्रावधानों, उनके विधिक आयामों तथा स्वर्ण सिंह समिति की सिफारिशों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. मूल कर्तव्यों का विचार तत्कालीन सोवियत संघ (USSR) के संविधान से प्रेरित होकर भारतीय संविधान में जोड़ा गया था, तथा मूल रूप से स्वर्ण सिंह समिति ने कर अदायगी (Payment of Taxes) को भी नागरिकों का एक कर्तव्य बनाने की संस्तुति की थी, जिसे संविधान संशोधन अधिनियम में शामिल नहीं किया गया था।
2. संविधान के अनुच्छेद 51-क के अंतर्गत प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य है कि वह भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा करे और उसे अक्षुण्ण रखे, तथा यह विशिष्ट कर्तव्य मूल कर्तव्यों की सूची में सबसे पहला (क्रम संख्या 'क') स्थान रखता है।
3. यद्यपि मूल कर्तव्यों की प्रकृति न्यायोचित (Non-justiciable) है, तथापि संसद को यह संवैधानिक शक्ति प्राप्त है कि वह विधि बनाकर इनके उल्लंघन या अवहेलना के लिए यथारूप दंड या शास्ति (Penalty) आरोपित कर सकती है, जैसा कि वन्यजीव संरक्षण अधिनियम और पर्यावरण संरक्षण अधिनियम जैसे कानूनों के माध्यम से किया गया है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के अंतर्गत राज्य के नीति निर्देशक तत्वों (DPSP - अनुच्छेद 36-51) की प्रकृति, उनके कार्यान्वयन तथा न्यायसंगतता के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 37 में यह स्पष्ट रूप से उपबंधित किया गया है कि नीति निर्देशक तत्व देश के शासन में मौलिक हैं और विधि बनाने में इन तत्वों को लागू करना राज्य का कर्तव्य होगा, किंतु इन्हें किसी भी न्यायालय द्वारा न्यायोचित (Justiciable) नहीं ठहराया जा सकता है, अर्थात् इनके उल्लंघन पर न्यायालय द्वारा इन्हें प्रवर्तित नहीं कराया जा सकता।
2. सर्वोच्च न्यायालय ने विभिन्न बादों (जैसे मिनर्वा मिल्स वाद, 1980) में यह प्रतिपादित किया है कि संविधान की मूल संरचना (Basic Structure) के अंतर्गत मूल अधिकार और नीति निर्देशक तत्व एक-दूसरे के पूरक हैं, तथा किसी सामाजिक कल्याणकारी कानून को लागू करने के लिए अनुच्छेद 39(b) और 39(c) के नीति निर्देशक तत्वों को अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 19 द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारों पर प्राथमिकता दी जा सकती है।
3. राज्य के नीति निर्देशक तत्वों में केवल समाजवादी और उदारवादी-बौद्धिक सिद्धांत ही शामिल हैं, तथा इसमें प्राचीन भारतीय ग्राम पंचायतों के गठन या कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देने जैसे गांधीवादी आदर्शों के लिए कोई पृथक् संवैधानिक निर्देश प्रदान नहीं किया गया है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के अंतर्गत राज्यों के उच्च न्यायालयों (High Courts) और अधीनस्थ न्यायालयों (Subordinate Courts) की शक्तियों, अधिकारक्षेत्र और उनके नियंत्रण के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 226 के अंतर्गत उच्च न्यायालयों को मूल अधिकारों के प्रवर्तन के अलावा किसी अन्य विधिक प्रयोजन के लिए भी रिट (Writs) जारी करने की शक्ति प्राप्त है, और इस संदर्भ में उच्च न्यायालयों का रिट अधिकारक्षेत्र (Writ Jurisdiction) उच्चतम न्यायालय के अनुच्छेद 32 के अंतर्गत प्रदत्त रिट अधिकारक्षेत्र की तुलना में अधिक व्यापक है, क्योंकि उच्चतम न्यायालय केवल मूल अधिकारों के उल्लंघन पर ही रिट जारी कर सकता है।
2. अनुच्छेद 233 के अनुसार किसी राज्य में जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति, पोस्टिंग और पदोन्नति उस राज्य के राज्यपाल द्वारा राज्य के उच्च न्यायालय से परामर्श करके की जाती है, तथा जिला न्यायाधीश के रूप में नियुक्त होने के लिए व्यक्ति के पास कम से कम सात वर्ष का अधिवक्ता या प्लीडर के रूप में अनुभव होना आवश्यक है और वह केंद्र या राज्य सरकार की सेवा में पहले से सेवारत नहीं होना चाहिए।
3. संविधान के अनुच्छेद 235 के तहत राज्य के अधीनस्थ न्यायालयों पर नियंत्रण, जिसमें जिला न्यायालयों और उनके नीचे के न्यायालयों के अधिकारियों की पोस्टिंग, प्रमोशन और छुट्टी देना शामिल है, पूरी तरह से संबंधित राज्य के राज्यपाल में निहित होता है, और इसमें उच्च न्यायालय की कोई परामर्शदात्री या निर्णायक भूमिका नहीं होती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के भाग-IV के अंतर्गत वर्णित 'राज्य के नीति निर्देशक तत्वों' (DPSP - अनुच्छेद 36-51) की प्रकृति, संशोधनों और न्यायिक व्याख्या के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 39(b) और 39(c) के अंतर्गत निहित नीति निर्देशक सिद्धांतों को प्रभावी बनाने के लिए संसद या राज्य विधानमंडलों द्वारा बनाई गई किसी विधि को इस आधार पर असंवैधानिक घोषित नहीं किया जा सकता कि वह अनुच्छेद 14 या अनुच्छेद 19 द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारों को छीनती या न्यून करती है, और यह संरक्षण मूल संविधान में ही निहित था जिसे बाद में 42वें संविधान संशोधन द्वारा विस्तारित किया गया था।
2. निर्देशक तत्वों को न्यायपालिका द्वारा अपरिवर्तनीय (Non-justiciable) घोषित किया गया है, किंतु सर्वोच्च न्यायालय ने अपने कई ऐतिहासिक निर्णयों (जैसे मिनर्वा मिल्स वाद, 1980) में यह स्पष्ट किया है कि मूल अधिकार और नीति निर्देशक तत्व एक-दूसरे के पूरक हैं और इनके बीच का संतुलन संविधान के 'मूल ढाँचे' (Basic Structure) का एक अनिवार्य हिस्सा है।
3. अनुच्छेद 48 के तहत राज्य कृषि और पशुपालन को आधुनिक और वैज्ञानिक प्रणालियों से संगठित करने के प्रयास करेगा, और विशेष रूप से गायों और बछड़ों तथा अन्य दुधारू और वाहक पशुओं की नस्लों के परीक्षण और सुधार के लिए तथा उनके वध का प्रतिषेध करने के लिए कदम उठाएगा, और यह एक समाजवादी विचारधारा पर आधारित नीति निर्देशक तत्व है।
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भारतीय संविधान के भाग I के अंतर्गत 'संघ एवं उसके राज्य क्षेत्र' (अनुच्छेद 1-4) और नए राज्यों के निर्माण या सीमा परिवर्तन की विधायी प्रक्रिया के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 2 के अंतर्गत संसद को यह शक्ति प्राप्त है कि वह संघ में नए राज्यों का प्रवेश या उनकी स्थापना ऐसे निबंधनों और शर्तों पर कर सके जो वह ठीक समझे, जबकि अनुच्छेद 3 के तहत संसद को मौजूदा राज्यों के क्षेत्रों, सीमाओं या नामों में परिवर्तन करने की शक्ति प्रदान की गई है।
2. अनुच्छेद 3 के तहत नए राज्यों के निर्माण या किसी राज्य के क्षेत्र, सीमा या नाम में परिवर्तन करने वाला कोई भी विधेयक संसद के किसी भी सदन में केवल तभी प्रस्तुत किया जा सकता है जब राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश प्राप्त हो, और राष्ट्रपति द्वारा ऐसा विधेयक संबंधित राज्य के विधानमंडल के पास उसकी राय जानने के लिए भेजा जाना संवैधानिक रूप से अनिवार्य है, भले ही राज्य विधानमंडल द्वारा दी गई राय को मानना संसद के लिए बाध्यकारी न हो।
3. अनुच्छेद 4 के स्पष्ट प्रावधान के अनुसार, अनुच्छेद 2 या अनुच्छेद 3 के तहत नए राज्यों के प्रवेश, स्थापना, या राज्यों के पुनर्गठन से संबंधित किए गए कानून संविधान के अनुच्छेद 368 के प्रयोजन के लिए 'संविधान संशोधन' माने जाएंगे, जिसके लिए संसद के विशेष बहुमत तथा आधे राज्यों के विधानमंडलों के अनुसमर्थन की अनिवार्य आवश्यकता होती है।
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