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Indian Polity
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भारतीय संविधान के भाग II (अनुच्छेद 5-11) के अंतर्गत 'भारतीय नागरिकता' और नागरिकता अधिनियम, 1955 के संशोधनों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 9 के स्पष्ट प्रावधान के अनुसार, यदि भारत का कोई नागरिक स्वेच्छा से किसी विदेशी राज्य की नागरिकता प्राप्त कर लेता है, तो उसकी भारतीय नागरिकता स्वतः समाप्त हो जाएगी, और इस संबंध में संसद या किसी अन्य प्राधिकरण द्वारा किसी औपचारिक घोषणा की आवश्यकता नहीं होती है।
- 2. नागरिकता अधिनियम, 1955 (समय-समय पर संशोधित) के तहत 'प्राकृतिक रूप से नागरिकता' (Citizenship by Naturalization) प्राप्त करने के लिए यह आवश्यक है कि आवेदक व्यक्ति कम से कम पिछले 12 वर्षों से भारत में निवास कर रहा हो या केंद्र सरकार की सेवा में हो, तथा संविधान की आठवीं अनुसूची में विनिर्दिष्ट भाषाओं का उसे पर्याप्त ज्ञान हो।
- 3. संविधान के अनुच्छेद 10 के अंतर्गत यह उपबंध किया गया है कि प्रत्येक व्यक्ति, जो भाग II के पूर्वगामी उपबंधों में से किसी के अधीन भारत का नागरिक है या समझा जाता है, संसद द्वारा बनाई गई किसी विधि के उपबंधों के अधीन रहते हुए भी अपनी नागरिकता से कभी भी वंचित नहीं किया जा सकता है, भले ही संसद कोई नया कानून क्यों न पारित कर दे।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 9 के अनुसार, यदि कोई नागरिक स्वेच्छा से किसी विदेशी देश की नागरिकता ग्रहण कर लेता है, तो उसकी भारतीय नागरिकता स्वतः ही समाप्त (Termination) हो जाती है। कथन 2 गलत है: नागरिकता अधिनियम, 1955 के तहत 'प्राकृतिक रूप से नागरिकता' प्राप्त करने के लिए सामान्यतः आवेदन से ठीक पहले के 12 महीनों के दौरान लगातार भारत में निवास करना और पिछले 14 वर्षों में से कुल 11 वर्षों (न कि 12 वर्ष) का निवास या केंद्र सरकार की सेवा में होना अनिवार्य होता है। कथन 3 गलत है: अनुच्छेद 10 के अनुसार भारत का नागरिक बना रहने का अधिकार संसद द्वारा बनाई जाने वाली विधियों के 'अधीन' (Subject to the provisions of any law made by Parliament) है, जिसका अर्थ है कि संसद नागरिकता के विनियमन और समाप्ति के लिए कानून बना सकती है। अधिक जानकारी के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पोर्टल पर विजिट करें।
Related Questions
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भारतीय संविधान के भाग-III के अंतर्गत प्रदत्त मूल अधिकारों (Fundamental Rights) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. अनुच्छेद 20(3) के अंतर्गत प्रदत्त 'स्वयं के विरुद्ध साක්ෂ्य देने से संरक्षण' (Protection against self-incrimination) का अधिकार केवल आपराधिक मामलों (Criminal Proceedings) में आरोपित व्यक्ति को ही उपलब्ध है, और यह किसी भी स्थिति में विभागीय जाँच या कर निर्धारण से संबंधित कार्यवाहियों पर लागू नहीं होता है।
2. अनुच्छेद 22 के तहत निवारक निरोध (Preventive Detention) के अंतर्गत किसी भी व्यक्ति को बिना किसी सलाहकार बोर्ड (Advisory Board) की रिपोर्ट के तीन महीने से अधिक समय तक निरुद्ध रखा जा सकता है, यदि संसद द्वारा बनाई गई विधि ऐसा उपबंध करती है।
3. अनुच्छेद 25 के अंतर्गत अंतःकरण की स्वतंत्रता और धर्म को अबाध रूप से मानने, आचरण करने और प्रचार करने का अधिकार न केवल भारतीय नागरिकों को बल्कि विदेशी नागरिकों को भी समान रूप से प्राप्त है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के भाग III (मूल अधिकार) के अंतर्गत प्रदत्त निवारक नजरबंदी (Preventive Detention) और अनुच्छेद 22 के उपबंधों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 22 के उपबंध केवल दंडात्मक नजरबंदी (Punitive Detention) के मामलों में गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को संरक्षण प्रदान करते हैं, जबकि निवारक नजरबंदी के अधीन गिरफ्तार या हिरासत में लिए गए व्यक्ति को किसी भी प्रकार के संवैधानिक और विधिक सुरक्षा उपाय या अधिकार प्राप्त नहीं होते हैं।
2. संसद को देश की रक्षा, राज्य की सुरक्षा, लोक व्यवस्था और आवश्यक सेवाओं के रखरखाव से संबंधित मामलों के लिए निवारक नजरबंदी से संबंधित कानून बनाने की अनन्य शक्ति प्राप्त है, और इस विषय पर राज्य विधानमंडलों को कानून बनाने की कोई शक्ति नहीं दी गई है।
3. निवारक नजरबंदी के अंतर्गत किसी भी व्यक्ति को तीन महीने से अधिक की अवधि के लिए तब तक हिरासत में नहीं रखा जा सकता है, जब तक कि किसी उच्च न्यायालय के न्यायाधीश या उस स्तर की योग्यता रखने वाले व्यक्तियों से मिलकर बने सलाहकार बोर्ड (Advisory Board) ने इस अवधि से आगे हिरासत बढ़ाने के लिए पर्याप्त कारण न प्रतिवेदित कर दिया हो।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) और राज्य लोक सेवा आयोगों (SPSC) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 316 के अनुसार संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और अन्य सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है, जबकि किसी राज्य के लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति उस राज्य के राज्यपाल द्वारा की जाती है, तथा इनमें से किसी भी आयोग के आधे से अधिक सदस्यों के लिए यह आवश्यक है कि वे केंद्र सरकार या किसी राज्य सरकार के अधीन कम से कम दस वर्ष तक भारत में पद धारण कर चुके हों।
2. संविधान के अनुच्छेद 317 के अंतर्गत संघ लोक सेवा आयोग या किसी राज्य लोक सेवा आयोग के किसी सदस्य को केवल 'कदाचार' (Misbehavior) के आधार पर उसके पद से हटाया जा सकता है, किंतु इसके लिए राष्ट्रपति द्वारा सुप्रीम कोर्ट को मामला संदर्भित किया जाना अनिवार्य होता है, और सुप्रीम कोर्ट द्वारा जांच के पश्चात दी गई सलाह को मानने के लिए राष्ट्रपति संवैधानिक रूप से बाध्य होता है।
3. अनुच्छेद 320 के तहत लोक सेवा आयोगों के कार्यों का उल्लेख किया गया है, जिसके अनुसार अखिल भारतीय सेवाओं, केंद्रीय सेवाओं और राज्य सेवाओं की नियुक्तियों के लिए परीक्षाओं का संचालन करना इनका प्राथमिक कार्य है, किंतु राज्यपाल या राष्ट्रपति के अनुरोध पर लोक सेवा आयोगों को किसी भी विषय पर परामर्श देने की संवैधानिक बाध्यता होती है, भले ही वह विषय उनकी अधिकारिता से बाहर का हो।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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न्यायिक पुनरावलोकन (Judicial Review) का अर्थ क्या है?
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संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) और राज्य लोक सेवा आयोग (SPSC) के सदस्यों की स्वतंत्रता, कार्यकाल और निष्कासन प्रक्रिया के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 317 के अंतर्गत संघ लोक सेवा आयोग या किसी राज्य लोक सेवा आयोग के किसी भी सदस्य को केवल 'साबित कदाचार' या 'असमर्थता' के आधार पर राष्ट्रपति द्वारा हटाया जा सकता है, किंतु इसके लिए राष्ट्रपति को उच्चतम न्यायालय की उस जाँच प्रतिवेदन की आवश्यकता अनिवार्य रूप से होती है जो अनुच्छेद 143 के तहत राष्ट्रपति द्वारा मांगी गई हो और जिसका प्रतिवेदन राष्ट्रपति के लिए सर्वथा बाध्यकारी होता है।
2. संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष या सदस्य अपनी पदावधि समाप्त होने पर भारत सरकार या किसी राज्य की सरकार के अधीन किसी भी प्रकार के अन्य रोजगार (Employment) के पात्र नहीं होते हैं, जबकि राज्य लोक सेवा आयोग का अध्यक्ष अपने कार्यकाल की समाप्ति पर संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष या सदस्य के रूप में अथवा किसी अन्य राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त होने की पात्रता रखता है।
3. संविधान के अनुच्छेद 318 के अनुसार संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों की संख्या तथा उनकी सेवा की शतं को विनियमित करने की शक्ति राष्ट्रपति में निहित होती है, जबकि राज्य लोक सेवा आयोग के मामले में यह शक्ति संबंधित राज्य के राज्यपाल के पास होती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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