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Indian Polity
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भारतीय संविधान के भाग-III के अंतर्गत प्रदत्त मूल अधिकारों (Fundamental Rights) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. अनुच्छेद 20(3) के अंतर्गत प्रदत्त 'स्वयं के विरुद्ध साක්ෂ्य देने से संरक्षण' (Protection against self-incrimination) का अधिकार केवल आपराधिक मामलों (Criminal Proceedings) में आरोपित व्यक्ति को ही उपलब्ध है, और यह किसी भी स्थिति में विभागीय जाँच या कर निर्धारण से संबंधित कार्यवाहियों पर लागू नहीं होता है।
  2. 2. अनुच्छेद 22 के तहत निवारक निरोध (Preventive Detention) के अंतर्गत किसी भी व्यक्ति को बिना किसी सलाहकार बोर्ड (Advisory Board) की रिपोर्ट के तीन महीने से अधिक समय तक निरुद्ध रखा जा सकता है, यदि संसद द्वारा बनाई गई विधि ऐसा उपबंध करती है।
  3. 3. अनुच्छेद 25 के अंतर्गत अंतःकरण की स्वतंत्रता और धर्म को अबाध रूप से मानने, आचरण करने और प्रचार करने का अधिकार न केवल भारतीय नागरिकों को बल्कि विदेशी नागरिकों को भी समान रूप से प्राप्त है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 सही है: अनुच्छेद 20(3) के तहत 'स्वयं के विरुद्ध साक्ष्य देने से संरक्षण' (Self-incrimination) का अधिकार केवल आपराधिक मामलों (Criminal proceedings) के अभियुक्तों को प्राप्त है। यह दीवानी मामलों, विभागीय जाँच, या कर व सीमा शुल्क अधिनियमों के तहत होने वाली कार्यवाहियों पर लागू नहीं होता है। कथन 2 गलत है: निवारक निरोध (Preventive Detention) के मामले में किसी व्यक्ति को 3 महीने से अधिक समय तक तब तक निरुद्ध नहीं रखा जा सकता जब तक कि एक उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों (या योग्य व्यक्तियों) से बनी सलाहकार बोर्ड (Advisory Board) इस अवधि को बढ़ाने के लिए पर्याप्त कारण न बता दे। संसद या कार्यपालिका अपनी इच्छा से 3 महीने से अधिक समय तक बिना बोर्ड की अनुमति के निरुद्ध नहीं रख सकती। कथन 3 गलत है: अनुच्छेद 25 के अंतर्गत प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार (धर्म को मानने, आचरण और प्रचार करने की स्वतंत्रता) नागरिकों के साथ-साथ भारत में रहने वाले विदेशियों को भी कुछ सीमाओं के अधीन प्राप्त हैं, किंतु 'अंतःकरण की स्वतंत्रता' और 'प्रचार करने के अधिकार' के संदर्भ में कुछ विशिष्ट न्यायिक निर्बन्धन हैं। हालांकि, मुख्य रूप से अनुच्छेद 25 के कई उपबंध केवल नागरिकों तक सीमित नहीं हैं, लेकिन कथन में दी गई निरपेक्षता और अन्य तकनीकी पहलुओं के कारण यह आंशिक रूप से भ्रामक है। अधिक विस्तृत जानकारी के लिए आप भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था के मूल अधिकार खंड को पढ़ सकते हैं।
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