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Indian Polity
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भारत के राष्ट्रपति की क्षमादान की शक्ति (Pardoning Power) तथा उसकी संवैधानिक प्रकृति के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. संविधान के अनुच्छेद 72 के अंतर्गत राष्ट्रपति को किसी अपराध के लिए दोषी ठहराए गए किसी भी व्यक्ति के दंड को क्षमा करने, उसका प्रविलंबन, विराम, परिहार या लघुकरण करने की शक्ति प्राप्त है, और यह शक्ति न्यायपालिका की न्यायिक समीक्षा के दायरे से पूर्णतः बाहर है, क्योंकि यह राष्ट्रपति का एक अनन्य एवं पूर्ण स्वविवेककारी अधिकार है।
  2. 2. सुप्रीम कोर्ट के 'इEकेरुप्पा बनाम कर्नाटक राज्य' और 'शत्रुघ्न चौहान बनाम भारत संघ' जैसे ऐतिहासिक निर्णयों के अनुसार, राष्ट्रपति की दया याचिका (Mercy Petition) पर निर्णय लेने में अत्यधिक और अकारण विलंब करना, मृत्युदंड पाए कैदी के मूल अधिकारों (अनुच्छेद 21) का उल्लंघन है, जिसके आधार पर उसकी दया याचिका खारिज होने के बाद भी उसकी सजा को आजीवन कारावास में बदला जा सकता है।
  3. 3. राज्यपाल की क्षमादान शक्ति (अनुच्छेद 161) की तुलना में राष्ट्रपति की अनुच्छेद 72 के तहत प्राप्त क्षमादान शक्ति दो प्रमुख मामलों में अधिक व्यापक है—प्रथम, राष्ट्रपति सेना न्यायालय (Court Martial) द्वारा दिए गए दंड को क्षमा कर सकता है जबकि राज्यपाल नहीं; और द्वितीय, राष्ट्रपति मृत्युदंड के मामलों में भी क्षमादान दे सकता है जबकि राज्यपाल को मृत्युदंड को पूरी तरह माफ करने की शक्ति प्राप्त नहीं है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 असत्य है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने 'ईश्वर सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य' तथा 'एपिलेट बनाम भारत संघ' जैसे मामलों में स्पष्ट किया है कि राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति (अनुच्छेद 72) कोई पूर्ण स्वविवेककारी अधिकार नहीं है, बल्कि इसका प्रयोग वह केंद्रीय मंत्रिमंडल की सलाह पर करता है। साथ ही, इस शक्ति का प्रयोग यदि दुर्भावनापूर्ण, भेदभावपूर्ण या असंवैधानिक आधार पर किया जाता है, तो यह सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों की न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के दायरे में आता है। कथन 2 सत्य है, क्योंकि राष्ट्रपति द्वारा दया याचिका के निपटारे में अत्यधिक और अमानवीय विलंब को कैदी के अनुच्छेद 21 (प्राण और दैहिक स्वतंत्रता) का उल्लंघन माना गया है और न्यायपालिका ने ऐसे मामलों में मृत्युदंड को आजीवन कारावास में बदला है। कथन 3 सत्य है; अनुच्छेद 161 के तहत राज्य के राज्यपाल के पास न तो कोर्ट मार्शल (सैनिक न्यायालय) द्वारा दिए गए दंड को माफ करने की शक्ति है और न ही वह किसी मामले में मृत्युदंड को क्षमा कर सकता है (यद्यपि राज्यपाल परिहार या लघुकरण कर सकता है, किंतु पूर्ण क्षमादान या मृत्युदंड पर निर्णय की अंतिम शक्ति राष्ट्रपति के पास ही है)। अधिक जानकारी के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पोर्टल पर विजिट करें।
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राज्य की कार्यपालिका के संदर्भ में राज्यपाल की शक्तियों, अध्यादेश निर्माण और मुख्यमंत्री की नियुक्ति से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 213 के अंतर्गत राज्यपाल द्वारा प्रख्यापित अध्यादेश की शक्ति वही होती है जो राज्य विधानमंडल द्वारा पारित अधिनियम की होती है, किंतु राज्यपाल किसी भी परिस्थिति में राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति के बिना अध्यादेश प्रख्यापित नहीं कर सकता यदि उस विषय पर राज्य विधानसभा में विधेयक प्रस्तुत करने के लिए राष्ट्रपति की संस्तुति आवश्यक हो। 2. अनुच्छेद 164 के अनुसार राज्य के मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है और अन्य मंत्रियों की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा मुख्यमंत्री की सलाह पर की जाती है, तथा छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश और ओडिशा राज्यों में जनजातियों के कल्याण के लिए भारसाधक एक पृथक् मंत्री का होना अनिवार्य किया गया है। 3. राज्यपाल की क्षमादान की शक्ति (अनुच्छेद 161) के अंतर्गत उसे राज्य सूची के विषयों से संबंधित विधियों के विरुद्ध अपराध के लिए दोषी ठहराए गए व्यक्ति के दंड को क्षमा करने, उसका प्रविलंबन, विराम या परिहार करने की शक्ति प्राप्त है, किंतु राज्यपाल को मृत्युदंड (Death Sentence) के मामले में क्षमादान देने तथा सेना के न्यायालय (Court Martial) द्वारा दिए गए दंड के विरुद्ध शक्ति का प्रयोग करने का अधिकार प्राप्त नहीं है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 200' और 'अनुच्छेद 201' के अंतर्गत राज्य के राज्यपाल द्वारा विधेयकों पर अनुमति देने की शक्ति (Assent to Bills) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. राज्यपाल राज्य विधानमंडल द्वारा पारित किसी विधेयक को राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित (Reserve) कर सकता है, और यह राज्यपाल का एक स्वविवेककारी (Discretionary) कर्तव्य है जो उसकी संवैधानिक शक्तियों के अंतर्गत आता है। 2. यदि राज्यपाल किसी विधेयक को राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित कर लेता है, तो उस विधेयक पर राज्य विधानमंडल का दोबारा विचार करने का अधिकार समाप्त हो जाता है, भले ही राष्ट्रपति उस विधेयक को अस्वीकार कर दे। 3. अनुच्छेद 201 के अनुसार, जब कोई विधेयक राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित रखा जाता है, तो राष्ट्रपति के लिए यह अनिवार्य होता है कि वह उस पर अपनी स्वीकृति दे ही दे, और वह राज्य विधानमंडल को विधेयक पर पुनर्विचार करने का निर्देश नहीं दे सकता। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? राज्यों का पुनर्गठन किस आधार पर किया गया था? संविधान सभा की पहली बैठक कब हुई? भारतीय संविधान के भाग IV-A के अंतर्गत वर्णित मूल कर्तव्यों (Fundamental Duties) के प्रवर्तन, प्रकृति और उनके कानूनी दायरा से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. मूल कर्तव्यों को स्वर्ण सिंह समिति की संस्तुति पर 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा संविधान में शामिल किया गया था, लेकिन इस समिति ने नागरिकों के लिए कर अदायगी (payment of taxes) को भी एक मूल कर्तव्य बनाए जाने की संस्तुति की थी, जिसे संवैधानिक संशोधन में स्वीकार नहीं किया गया था। 2. प्रकृति से ये मूल कर्तव्य न्यायोचित (Justiciable) नहीं हैं, अर्थात इनके उल्लंघन या अनुपालन न करने पर सीधे उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालय द्वारा कोई कानूनी दंड या रिट जारी नहीं की जा सकती है, जब तक कि संसद ने इनके कार्यान्वयन के लिए कोई विशिष्ट दंडात्मक कानून या अधिनियम न बनाया हो। 3. अनुच्छेद 51A के तहत उल्लिखित 11 मूल कर्तव्यों में से कुछ कर्तव्य केवल भारतीय नागरिकों पर ही लागू होते हैं, जबकि पर्यावरण संरक्षण और वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने से संबंधित कुछ कर्तव्य विदेशी नागरिकों पर भी समान रूप से लागू होते हैं। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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