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Indian Polity
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भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 200' और 'अनुच्छेद 201' के अंतर्गत राज्य के राज्यपाल द्वारा विधेयकों पर अनुमति देने की शक्ति (Assent to Bills) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. राज्यपाल राज्य विधानमंडल द्वारा पारित किसी विधेयक को राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित (Reserve) कर सकता है, और यह राज्यपाल का एक स्वविवेककारी (Discretionary) कर्तव्य है जो उसकी संवैधानिक शक्तियों के अंतर्गत आता है।
  2. 2. यदि राज्यपाल किसी विधेयक को राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित कर लेता है, तो उस विधेयक पर राज्य विधानमंडल का दोबारा विचार करने का अधिकार समाप्त हो जाता है, भले ही राष्ट्रपति उस विधेयक को अस्वीकार कर दे।
  3. 3. अनुच्छेद 201 के अनुसार, जब कोई विधेयक राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित रखा जाता है, तो राष्ट्रपति के लिए यह अनिवार्य होता है कि वह उस पर अपनी स्वीकृति दे ही दे, और वह राज्य विधानमंडल को विधेयक पर पुनर्विचार करने का निर्देश नहीं दे सकता।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 सही है: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल के पास यह शक्ति है कि वह राज्य विधानमंडल द्वारा पारित किसी विधेयक को राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित रख सके। कुछ मामलों में (जैसे जब विधेयक उच्च न्यायालय की स्थिति को खतरे में डालता हो) इसे आरक्षित रखना अनिवार्य भी होता है, और सामान्य मामलों में यह उसका स्वविवेककारी निर्णय हो सकता है। कथन 2 गलत है: यदि राष्ट्रपति किसी आरक्षित विधेयक को राज्य विधानमंडल के पुनर्विचार के लिए वापस भेजता है, तो राज्य विधानमंडल को 6 महीने के भीतर उस पर पुनर्विचार करना होता है। यदि विधेयक फिर से पारित होकर राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है, तो भी राष्ट्रपति उस पर स्वीकृति देने के लिए बाध्य नहीं है (अर्थात राष्ट्रपति की कोई 'निश्चित वीटो' या 'अंतिम स्वीकृति' की बाध्यता नहीं होती)। कथन 3 गलत है: अनुच्छेद 201 के तहत जब कोई विधेयक राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित रखा जाता है, तो राष्ट्रपति या तो अपनी स्वीकृति दे सकता है या स्वीकृति रोक सकता है (Absolute Veto), या राज्यपाल को निर्देश दे सकता है कि वह विधेयक को राज्य विधानमंडल के सदन/सडनों को पुनर्विचार के लिए वापस भेज दे।
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