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Indian Polity
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भारतीय संविधान के भाग-IV में समाहित राज्य के नीति निर्देशक तत्वों (Directive Principles of State Policy - DPSP) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 39(b) और 39(c) के अंतर्गत भौतिक संसाधनों के स्वामित्व और नियंत्रण को इस प्रकार वितरित करने का निर्देश दिया गया है जिससे सामुदायिक हित का सर्वोत्तम साधन हो, और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अपने ऐतिहासिक निर्णयों में यह स्पष्ट किया गया है कि अनुच्छेद 39(b) और 39(c) में वर्णित नीति निर्देशक तत्वों को लागू करने के लिए यदि अनुच्छेद 19 द्वारा प्रदत्त कुछ मौलिक अधिकारों का अतिक्रमण भी होता है, तो अनुच्छेद 31C के तहत उन्हें संरक्षण प्राप्त होगा।
- 2. संविधान के अनुच्छेद 44 के तहत राज्य पूरे भारत के राज्यक्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code) को सुरक्षित करने का प्रयास करेगा, और यह प्रावधान अपने मूल रूप से ही देश के सभी राज्यों के लिए पूर्णतः बाधिकारी व प्रवर्तनीय (Enforceable) है, जिसके क्रियान्वयन के लिए राज्यों की सहमति की कोई आवश्यकता नहीं होती है।
- 3. वर्ष 2002 में लाए गए 86वें संविधान संशोधन अधिनियम के माध्यम से अनुच्छेद 45 की विषय वस्तु में परिवर्तन किया गया और इसके तहत छह वर्ष से कम आयु के बालकों के लिए प्रारंभिक बाल्यावस्था देखरेख और शिक्षा (Early Childhood Care and Education) का उपबंध जोड़ा गया, जिसे मूल रूप से पहले अनुच्छेद 45 के अंतर्गत 14 वर्ष तक की आयु के बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के रूप में रखा गया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है क्योंकि संविधान के अनुच्छेद 39(b) और 39(c) समाजवादी सिद्धांतों पर आधारित हैं। केशवानंद भारती मामले और मिनर्वा मिल्स मामले में उच्चतम न्यायालय ने यह प्रतिपादित किया कि अनुच्छेद 39(b) और (c) के क्रियान्वयन के लिए बनाए गए कानूनों को अनुच्छेद 31C के तहत संरक्षण प्राप्त है, भले ही वे अनुच्छेद 14 या 19 का उल्लंघन करते हों।
कथन 2 गलत है क्योंकि अनुच्छेद 44 (समान नागरिक संहिता) संविधान के भाग-IV (DPSP) के अंतर्गत आता है जो कि देश की प्रकृति के अनुसार 'अन्यायिक' (Non-justiciable) है, यानी इसे न्यायालय द्वारा प्रवर्तित नहीं कराया जा सकता। इसके अतिरिक्त, नीति निर्देशक तत्वों को लागू करना राज्यों के अपने संसाधनों और नीतियों पर निर्भर करता है, यह स्वतः पूर्णतः बाध्यकारी प्रवर्तनीय कानून नहीं है।
कथन 3 सही है, क्योंकि 86वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2002 से पहले अनुच्छेद 45 के अंतर्गत 14 वर्ष तक की आयु के बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान था, जिसे संशोधन के बाद अनुच्छेद 21A के तहत मूल अधिकार बना दिया गया और अनुच्छेद 45 को संशोधित करके 6 वर्ष से कम आयु के बच्चों की देखभाल व शिक्षा का नया प्रावधान जोड़ा गया।
अधिक जानकारी और विस्तृत अध्ययन के लिए आप भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पोर्टल पर विजिट कर सकते हैं।
कथन 2 गलत है क्योंकि अनुच्छेद 44 (समान नागरिक संहिता) संविधान के भाग-IV (DPSP) के अंतर्गत आता है जो कि देश की प्रकृति के अनुसार 'अन्यायिक' (Non-justiciable) है, यानी इसे न्यायालय द्वारा प्रवर्तित नहीं कराया जा सकता। इसके अतिरिक्त, नीति निर्देशक तत्वों को लागू करना राज्यों के अपने संसाधनों और नीतियों पर निर्भर करता है, यह स्वतः पूर्णतः बाध्यकारी प्रवर्तनीय कानून नहीं है।
कथन 3 सही है, क्योंकि 86वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2002 से पहले अनुच्छेद 45 के अंतर्गत 14 वर्ष तक की आयु के बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान था, जिसे संशोधन के बाद अनुच्छेद 21A के तहत मूल अधिकार बना दिया गया और अनुच्छेद 45 को संशोधित करके 6 वर्ष से कम आयु के बच्चों की देखभाल व शिक्षा का नया प्रावधान जोड़ा गया।
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Related Questions
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अस्पृश्यता (Untouchability) का उन्मूलन किस अनुच्छेद द्वारा किया गया है?
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भारतीय संविधान के महत्वपूर्ण संशोधनों और आपातकालीन उपबंधों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. 44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 द्वारा राष्ट्रीय आपातकाल की उद्घोषणा के आधार से 'आंतरिक अशांति' (Internal Disturbance) शब्द को हटाकर उसके स्थान पर 'सशस्त्र विद्रोह' (Armed Rebellion) शब्द को जोड़ा गया, तथा यह भी प्रावधान किया गया कि राष्ट्रपति द्वारा राष्ट्रीय आपातकाल की उद्घोषणा केवल तभी की जा सकती है जब मंत्रिमंडल (Cabinet) का लिखित निर्णय उन्हें संसूचित किया जाए।
2. 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा यह उपबंध किया गया कि राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान अनुच्छेद 19 द्वारा प्रदत्त मूल अधिकार स्वतः निलंबित हो जाएंगे, और आपातकाल की समाप्ति के बाद उन्हें पुनर्जीवित करने के लिए संसद की पृथक् विधि की आवश्यकता होगी।
3. अनुच्छेद 359 के तहत राष्ट्रपति को यह शक्ति प्राप्त है कि वह राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान भाग-III द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारों के प्रवर्तन के लिए किसी भी न्यायालय में जाने के अधिकार को निलंबित कर सकता है, किंतु 44वें संशोधन अधिनियम के पश्चात अनुच्छेद 20 और अनुच्छेद 21 द्वारा प्रदत्त अधिकारों के प्रवर्तन को निलंबित करने का आदेश किसी भी परिस्थिति में जारी नहीं किया जा सकता।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के भाग III के अंतर्गत प्रदत्त मूल अधिकारों और उनके प्रवर्तन के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 32 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय को और अनुच्छेद 226 के अंतर्गत उच्च न्यायालयों को मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए रिट जारी करने की शक्ति प्राप्त है, किंतु उच्च न्यायालय का रिट क्षेत्राधिकार भौगोलिक सीमाओं और 'किसी अन्य प्रयोजन' के मामले में उच्चतम न्यायालय के रिट क्षेत्राधिकार की तुलना में अधिक व्यापक है।
2. अनुच्छेद 33 संसद को यह शक्ति प्रदान करता है कि वह सशस्त्र बलों, पुलिस बलों, गुप्तचर संगठनों और दूरसंचार प्रणालियों से जुड़े कार्मिकों के मूल अधिकारों पर प्रतिबंध लगा सके या उन्हें समाप्त कर सके, ताकि उनके द्वारा कर्तव्यों का उचित पालन और अनुशासन बना रहे, तथा यह शक्ति केवल संसद को प्राप्त है, राज्य विधानमंडलों को नहीं।
3. राष्ट्रीय आपातकाल (अनुच्छेद 352) के दौरान अनुच्छेद 358 के तहत अनुच्छेद 19 द्वारा प्रदत्त छह मूल अधिकार स्वतः निलंबित हो जाते हैं, किंतु 44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 के पश्चात यह स्पष्ट कर दिया गया है कि 'युद्ध' या 'बाह्य आक्रमण' के आधार पर घोषित आपातकाल में ही अनुच्छेद 19 स्वतः निलंबित होगा, 'सशस्त्र विद्रोह' के आधार पर घोषित आपातकाल में नहीं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान सभा के गठन और उसकी निर्माण प्रक्रिया के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान सभा के सदस्यों का निर्वाचन प्रांतीय विधानसभाओं के सदस्यों द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के अनुसार एकल संक्रमणीय मत द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से किया गया था, जिसमें ब्रिटिश भारत के प्रांतों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में सीटें आवंटित की गई थीं, किंतु रियासतों के प्रतिनिधियों का चयन रियासतों के शासकों द्वारा परामर्श के माध्यम से किया जाना तय हुआ था, न कि निर्वाचन द्वारा।
2. संविधान सभा की कुल 389 प्रस्तावित सीटों में से 292 सीटें ब्रिटिश प्रांतों के गवर्नरों के प्रांतों से, 4 सीटें मुख्य आयुक्त के प्रांतों (Chief Commissioners' Provinces) से और 93 सीटें भारतीय रियासतों (Princely States) से भरी जानी थीं, तथा प्रत्येक प्रांत की सीटों को तीन प्रमुख समुदायों - मुस्लिम, सिख और सामान्य (मुस्लिम व सिख को छोड़कर) में उनकी जनसंख्या के अनुपात में विभाजित किया गया था।
3. यद्यपि संविधान सभा के चुनाव जुलाई-अगस्त 1946 में हुए थे, तथापि इसमें महात्मा गांधी और मोहम्मद अली जिन्ना दोनों ने संविधान सभा की बैठकों में सक्रिय रूप से भाग लिया था और देश के विभाजन को रोकने के लिए सभा के शुरुआती अधिवेशनों में अपनी सहमति दर्ज कराई थी।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारत के महान्यायवादी (Attorney General) और नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) के संवैधानिक पदों, अधिकारों और कृत्यों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 76 के तहत नियुक्त भारत का महान्यायवादी देश का सर्वोच्च विधि अधिकारी होता है, जिसे भारत के राज्य क्षेत्र के सभी न्यायालयों में सुनवाई का अधिकार है, और उसे संसद के दोनों सदनों की बैठकों में या उसकी संयुक्त बैठक में बोलने का अधिकार प्राप्त है, किंतु उसे संसद की किसी भी समिति का सदस्य नहीं बनाया जा सकता है।
2. नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) भारत की संचित निधि के साथ-साथ प्रत्येक राज्य और संघ राज्य क्षेत्र की संचित निधि से होने वाले सभी खर्चों की लेखापरीक्षा (Audit) करता है, तथा अपनी वार्षिक लेखापरीक्षा रिपोर्ट राष्ट्रपति को सौंपता है, जिसे राष्ट्रपति संसद के दोनों सदनों के समक्ष रखवाते हैं।
3. महान्यायवादी को हटाने के लिए संविधान में किसी महाभियोग या विशेष प्रक्रिया का उल्लेख नहीं किया गया है और वह राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करता है, जबकि CAG को संसद द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के समान केवल 'सिद्ध कदाचार' या 'असमर्थता' के आधार पर ही हटाया जा सकता है।
4. महान्यायवादी को भारत सरकार के खिलाफ कोई भी निजी वकालत करने या सलाह देने से संविधान द्वारा पूर्णतः प्रतिबंधित किया गया है, जबकि CAG अपने पद से सेवामुक्त होने के बाद भारत सरकार या किसी भी राज्य सरकार के अधीन किसी भी प्रकार के अन्य कार्यालय या रोजगार के पात्र नहीं होते हैं।
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