19वीं शताब्दी में भारत में हुए सामाजिक एवं धार्मिक सुधार आंदोलनों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. राजा राममोहन राय द्वारा स्थापित 'ब्रह्म समाज' ने मूर्तिपूजा, बहुदेववाद और पुरोहितवाद का कड़ा विरोध किया तथा वेदों की अचूकता और सर्वोच्चता को बिना किसी शर्त के स्वीकार किया था।
- 2. स्वामी दयानंद सरस्वती ने 'आर्य समाज' की स्थापना 1875 में की थी, जिनका मुख्य नारा 'वेदों की ओर लौटो' था, और उन्होंने पाखंड खंडिनी पताका फहराकर पौराणिक मान्यताओं और जाति-प्रथा की कठोरता का खंडन किया था।
- 3. ज्योतिराव फुले ने वर्ष 1873 में 'सत्यशोधक समाज' की स्थापना की, जिसका मुख्य उद्देश्य शूद्रों और अति-शूद्रों (बहुजन समाज) को ब्राह्मणवादी वर्चस्व और धार्मिक पाखंडों से मुक्त कराना तथा शिक्षा के माध्यम से उन्हें आत्म-सम्मान दिलाना था।
- 4. ईश्वर चंद्र विद्यासागर के अथक प्रयासों के परिणामस्वरूप ब्रिटिश सरकार द्वारा वर्ष 1856 में 'हिन्दू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम' (Act XV of 1856) पारित किया गया, जिसे लॉर्ड डलहौजी के शासनकाल में कानूनी रूप से मान्यता मिली थी।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन पूर्णतः सत्य है/हैं?
Detailed Explanation
कथन 1 असत्य है क्योंकि राजा राममोहन राय और ब्रह्म समाज ने वेदों की अचूकता या infallibility को स्वीकार नहीं किया था, बल्कि उनका मानना था कि कोई भी धार्मिक ग्रंथ या वेद अज्ञानता से परे नहीं है। इसके विपरीत, स्वामी दयानंद सरस्वती ने वेदों को अपौरुषेय और अचूक माना था। कथन 2 सत्य है; स्वामी दयानंद सरस्वती ने 1875 में बॉम्बे में आर्य समाज की स्थापना की और 'वेदों की ओर लौटो' का नारा दिया। कथन 3 सत्य है; ज्योतिराव फुले ने 1873 में सत्यशोधक समाज की स्थापना करके दलितों और पिछड़ों के अधिकारों के लिए संघर्ष किया। कथन 4 तकनीकी रूप से आंशिक गलत है क्योंकि 1856 का विधवा पुनर्विवाह अधिनियम लॉर्ड डलहौजी के समय में प्रारूपित हुआ था किंतु लॉर्ड कैनिंग के कार्यकाल में औपचारिक रूप से अधिनियमित और पारित हुआ था। इसी प्रकार की परीक्षा-उपयोगी और विश्लेषणात्मक सामग्री के लिए हमारी वेबसाइट बिहार शिक्षक भर्ती परीक्षा पर विजिट करें।