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सामान्य विज्ञान और पर्यावरण के संदर्भ में, 'राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण' (National Biodiversity Authority - NBA) और 'जैव विविधता प्रबंधन समितियों' (Biodiversity Management Committees - BMCs) के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (NBA) की स्थापना 'जैव विविधता अधिनियम, 2002' के प्रावधानों के तहत एक सांविधिक, स्वायत्त निकाय के रूप में की गई है, जिसका मुख्यालय चेन्नई, तमिलनाडु में स्थित है।
- 2. जैव विविधता अधिनियम, 2002 के अनुसार देश के सभी स्थानीय निकायों (चाहे वे ग्रामीण हों या शहरी) को अपने स्तर पर अनिवार्य रूप से 'जैव विविधता प्रबंधन समितियों' (BMCs) का गठन करना होता है, जिनका मुख्य कार्य स्थानीय स्तर पर उपलब्ध जैव संसाधनों और पारंपरिक ज्ञान का प्रलेखन करके 'जन जैव विविधता रजिस्टर' (People's Biodiversity Register - PBR) तैयार करना है।
- 3. राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (NBA) को किसी भी विदेशी नागरिक, कंपनी या अनिवासी भारतीय (NRI) द्वारा देश के भीतर जैव संसाधनों या उससे जुड़े पारंपरिक ज्ञान के उपयोग के लिए किए जाने वाले आवेदन पर अनुमति या अनुमोदन प्रदान करने का अनन्य अधिकार प्राप्त है, और इस प्रक्रिया में राज्य जैव विविधता बोर्डों (SBBs) से परामर्श करना अनिवार्य नहीं है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (NBA) की स्थापना पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के तहत 'जैव विविधता अधिनियम, 2002' के अंतर्गत वर्ष 2003 में एक सांविधिक (Statutory) और स्वायत्त निकाय के रूप में की गई थी, और इसका मुख्यालय चेन्नई में स्थित है।
कथन 2 सही है: जैव विविधता अधिनियम, 2002 की धारा 41 के अनुसार, देश के सभी स्थानीय निकायों द्वारा अपने अधिकार क्षेत्र में 'जैव विविधता प्रबंधन समितियों' (BMCs) का गठन किया जाना अनिवार्य है। इन समितियों का मुख्य उत्तरदायित्व स्थानीय लोगों के परामर्श से 'जन जैव विविधता रजिस्टर' (PBR) तैयार करना है, जिसमें जैव संसाधनों और उनसे जुड़े पारंपरिक ज्ञान का पूरा विवरण होता है।
कथन 3 गलत है: जैव विविधता अधिनियम के अनुसार, विदेशी नागरिकों, संस्थाओं या अनिवासी भारतीयों (NRIs) द्वारा जैव संसाधनों के उपयोग के लिए NBA से अनुमति लेनी होती है, किंतु NBA के लिए ऐसा करते समय संबंधित राज्य जैव विविधता बोर्ड (SBB) और संबंधित स्थानीय 'जैव विविधता प्रबंधन समिति' (BMC) से परामर्श करना कानूनी रूप से अनिवार्य (Consultation is mandatory) होता है, न कि वैकल्पिक या बहिष्कृत।
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भारतीय पर्यावरण, पारिस्थितिकी एवं जैव विविधता के संदर्भ में, 'राष्ट्रीय उद्यान' (National Parks), 'वन्यजीव अभयारण्य' (Wildlife Sanctuaries) और 'संरक्षित आरक्षित क्षेत्र' (Conservation Reserves) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के अंतर्गत किसी क्षेत्र को 'राष्ट्रीय उद्यान' के रूप में घोषित करने की शक्ति केवल राज्य सरकार के पास होती है, और एक बार राष्ट्रीय उद्यान घोषित हो जाने के बाद उस क्षेत्र में पशुओं को चराने या निजी स्वामित्व के अधिकारों की अनुमति पूरी तरह से प्रतिबंधित होती है, जबकि वन्यजीव अभयारण्यों में मुख्य वन्यजीव वार्डन की अनुमति से कुछ सीमित मानवीय अधिकारों की अनुमति दी जा सकती है।
2. वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 में वर्ष 2003 के संशोधन के माध्यम से 'संरक्षित आरक्षित क्षेत्रों' (Conservation Reserves) और 'सामुदायिक आरक्षित क्षेत्रों' (Community Reserves) की नई श्रेणियों को जोड़ा गया, जिसके तहत केंद्र सरकार राज्य सरकारों के परामर्श से किसी भी निजी या सामुदायिक भूमि को, जो राष्ट्रीय उद्यानों या अभयारण्यों को जोड़ती हो, 'संरक्षित आरक्षित क्षेत्र' के रूप में घोषित कर सकती है।
3. राष्ट्रीय उद्यानों की सीमाओं में परिवर्तन या उनका विघटन केवल संबंधित राज्य के विधानमंडल द्वारा साधारण बहुमत से एक प्रस्ताव पारित करके किया जा सकता है, जिसके लिए राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड (NBWL) की पूर्व अनुमति प्राप्त करना आवश्यक नहीं होता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय राजव्यवस्था और भारतीय संविधान के अंतर्गत 'राष्ट्रपति की क्षमादान शक्तियाँ' (Pardoning Powers - Article 72) तथा राज्यपाल की शक्तियों (Article 161) के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 72 के तहत राष्ट्रपति को किसी ऐसे अपराध के लिए दोषी ठहराए गए व्यक्ति के दंड को क्षमा करने, उसका प्रविलंबन, विराम या परिहार करने अथवा दंडादेश का निलंबन, परिहार या लघुकरण करने की शक्ति प्राप्त है, जहाँ दंड या दंडादेश किसी ऐसे विषय से संबंधित है जिस पर संघ की कार्यकारी शक्ति का विस्तार होता है, या सैन्य न्यायालय (Court Martial) द्वारा दिया गया है, या मृत्युदंड (Death Sentence) का मामला है।
2. राज्यपाल की क्षमादान शक्ति (अनुच्छेद 161) और राष्ट्रपति की शक्ति (अनुच्छेद 72) के बीच एक मुख्य अंतर यह है कि राज्यपाल को सैन्य न्यायालयों (Court Martial) द्वारा दिए गए दंड के संबंध में कोई क्षमादान शक्ति प्राप्त नहीं है, और साथ ही राज्यपाल मृत्युदंड को पूरी तरह से क्षमा (Pardon) या निरस्त नहीं कर सकता है, यद्यपि वह अन्य मामलों में दंडादेश का लघुकरण या परिहार कर सकता है।
3. 'एकीकरण और न्यायिक समीक्षा' के सिद्धांतों के तहत, राष्ट्रपति या राज्यपाल द्वारा क्षमादान याचिकाओं पर लिए गए निर्णयों को देश के किसी भी न्यायालय में किसी भी परिस्थिति में चुनौती नहीं दी जा सकती है, क्योंकि यह पूरी तरह से कार्यपालिका की एक अनन्य (Exclusive) और पूर्ण विवेकाधीन शक्ति है जिस पर न्यायिक पुनरावलोकन लागू नहीं होता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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निम्नलिखित में से किस शासक ने 'नागानंद' नाटक की रचना की थी?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग XII' के अंतर्गत 'वित्त, संपत्ति, संविदाएं और वाद' (अनुच्छेद 264 से 300क) तथा कर-आरोपण की विधायी शक्ति के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 265 के अनुसार किसी भी कर (Tax) को विधि के प्राधिकार (Authority of law) के बिना न तो अधिरोपित किया जा सकता है और न ही एकत्र किया जा सकता है, जिसका अर्थ है कि यह संरक्षण केवल कार्यपालिका के विरुद्ध उपलब्ध है और राज्य का विधानमंडल भी पूर्वव्यापी (Retrospective) प्रभाव से कर आरोपित नहीं कर सकता है।
2. संविधान की सातवीं अनुसूची की संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची में विभिन्न करों को आरोपित करने की स्पष्ट शक्तियाँ दी गई हैं, किंतु 'वस्तु एवं सेवा कर' (GST) से संबंधित विशेष प्रावधानों के तहत संसद और किसी भी राज्य के विधानमंडल को समवर्ती सूची के अंतर्गत GST से जुड़े विषयों पर कानून बनाने की अनन्य शक्ति 101वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2016 द्वारा प्रदान की गई है।
3. संविधान के अनुच्छेद 300क के अनुसार किसी भी व्यक्ति को उसकी संपत्ति से विधि के प्राधिकार के बिना वंचित नहीं किया जाएगा, और संपत्ति का अधिकार अब एक संवैधानिक अधिकार होने के साथ-साथ अनुच्छेद 300क के तहत एक विधिक अधिकार भी है, जिसके उल्लंघन पर सीधे अनुच्छेद 32 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया जा सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय और विश्व भूगोल के संदर्भ में, 'भूकंपीय तरंगों' (Seismic Waves) और उनके संचरण के माध्यम से पृथ्वी के आंतरिक भाग की संरचना के अध्ययन के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भूकंप के दौरान उत्पन्न होने वाली प्राथमिक तरंगें (P-waves) अनुदैर्ध्य (Longitudinal) तरंगें होती हैं, जो ध्वनि तरंगों की भाँति कार्य करती हैं और ये केवल ठोस तथा तरल माध्यमों से गुजर सकती हैं, जबकि गैस माध्यम में इनका संचरण पूरी तरह से रुक जाता है।
2. द्वितीयक तरंगें (S-waves) अनुप्रस्थ (Transverse) तरंगें होती हैं जो प्रकाश तरंगों के समान व्यवहार करती हैं, और इनकी एक प्रमुख विशेषता यह है कि ये केवल ठोस माध्यमों से ही गुजर सकती हैं तथा तरल या अर्ध-तरल (Molten) माध्यमों में प्रवेश करते ही विलुप्त हो जाती हैं।
3. धरातलीय तरंगें (Surface Waves या L-waves) भूकंपीय अधिकेंद्र (Epicenter) पर उद्गम के बाद पृथ्वी की सतह के सहारे यात्रा करती हैं और ये तीनों तरंगों में सबसे अधिक विनाशकारी होती हैं, क्योंकि इनकी आवृत्ति और आयाम बहुत अधिक होते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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