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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग III' के अंतर्गत 'मौलिक अधिकार' (Fundamental Rights - अनुच्छेद 12 से 35) तथा 'संसदीय संप्रभुता एवं न्यायिक सर्वोच्चता' के अंतर्संबंधों के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 13(2) के अनुसार राज्य कोई ऐसी विधि नहीं बनाएगा जो भाग III द्वारा प्रदत्त अधिकारों को छीनती है या न्यून करती है, और इस प्रकार बनाई गई प्रत्येक विधि उल्लंघन की मात्रा तक शून्य होगी, जहाँ 'विधि' (Law) शब्द के अंतर्गत केवल संसद या राज्य विधानसभाओं द्वारा पारित अधिनियम शामिल हैं, तथा इसमें अध्यादेश, उप-विधियाँ, नियम, और रूढ़ियाँ या प्रथाएँ शामिल नहीं हैं।
- 2. गोलकनाथ वाद (1967) में उच्चतम न्यायालय द्वारा यह निर्णय दिया गया था कि संसद को मौलिक अधिकारों में संशोधन करने की कोई शक्ति प्राप्त नहीं है, क्योंकि संविधान के अनुच्छेद 368 के तहत किया जाने वाला 'संवैधानिक संशोधन' भी अनुच्छेद 13 के अंतर्गत आने वाली 'विधि' (Law) के ही समान है।
- 3. केशवानंद भारती वाद (1973) के ऐतिहासिक निर्णय द्वारा गोलकनाथ वाद के निर्णय को पलट दिया गया और यह अभिनिर्धारित किया गया कि संसद को अनुच्छेद 368 के अधीन संविधान के किसी भी हिस्से (मौलिक अधिकारों सहित) में संशोधन करने की शक्ति प्राप्त है, बशर्ते ऐसा कोई भी संशोधन संविधान की 'मूल संरचना' (Basic Structure) का उल्लंघन न करे।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 असत्य है क्योंकि अनुच्छेद 13 के खंड (3) में 'विधि' (Law) की एक अत्यंत व्यापक परिभाषा दी गई है। इसके अंतर्गत केवल संसद या राज्य विधानमंडलों के अधिनियम ही नहीं, बल्कि अध्यादेश (Ordinances), आदेश (Orders), उप-विधियाँ (By-laws), नियम (Rules), विनियम (Regulations), अधिसूचनाएँ और यहाँ तक कि भारत में विधि का बल रखने वाली रूढ़ियाँ या प्रथाएँ (Customs or usages) भी शामिल हैं।
कथन 2 सत्य है। गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य वाद (1967) में उच्चतम न्यायालय की 11 न्यायाधीशों की पीठ ने 6:5 के बहुमत से यह निर्णय दिया था कि संसद को मौलिक अधिकारों को सीमित करने या छीनने की शक्ति नहीं है। न्यायालय ने माना था कि अनुच्छेद 368 के तहत किया जाने वाला संवैधानिक संशोधन भी अनुच्छेद 13(2) के अर्थानुसार 'विधि' (Law) है।
कथन 3 सत्य है। केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य वाद (1973) में उच्चतम न्यायालय ने अपने पूर्व के गोलकनाथ वाद के निर्णय को उलट दिया और यह प्रतिपादित किया कि संसद अनुच्छेद 368 के तहत मौलिक अधिकारों सहित संविधान के किसी भी भाग में संशोधन कर सकती है, किंतु संसद की यह संशोधन शक्ति असीम नहीं है और यह संविधान की 'मूल संरचना' (Basic Structure) के सिद्धांत के अधीन है।
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग IV-A' के…
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भारतीय अर्थव्यवस्था एवं सतत विकास के संदर्भ में, 'सार्वजनिक वित्त' (Public Finance) और 'राजकोषीय समेकन' (Fiscal Consolidation) के तहत 'राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन अधिनियम, 2003' (FRBM Act, 2003) के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. FRBM अधिनियम का मुख्य उद्देश्य देश में वित्तीय अनुशासन को सुनिश्चित करना, दीर्घकालिक समष्टि आर्थिक स्थिरता (Macroeconomic Stability) प्राप्त करना और राजस्व घाटे को समाप्त करके राजस्व अधिप्लव (Revenue Surplus) उत्पन्न करना था।
2. FRBM अधिनियम के मूल प्रावधानों के अनुसार केंद्र सरकार को यह लक्ष्य दिया गया था कि वह वर्ष 2008-09 तक राजकोषीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 3 प्रतिशत तक ले आएगी, जिसे बाद में वैश्विक वित्तीय संकट और विभिन्न संशोधनों के कारण कई बार स्थगित करना पड़ा।
3. एन. के. सिंह समिति (N.K. Singh Committee) की सिफारिशों के आधार पर FRBM अधिनियम में संशोधन करके यह तय किया गया कि केंद्र सरकार वर्ष 2020-21 तक राजकोषीय घाटे को GDP के 3 प्रतिशत तक और वर्ष 2024-25 तक इसे 2.5 प्रतिशत तक सीमित करने का प्रयास करेगी।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय इतिहास और मध्यकालीन प्रशासन के संदर्भ में, दिल्ली सल्तनत के प्रशासनिक सुधारों और 'दीवान-ए-कोही' (Diwan-i-Kohi) विभाग के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. 'दीवान-ए-कोही' की स्थापना तुगलक वंश के सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक द्वारा की गई थी, जिसका मुख्य उद्देश्य कृषि क्षेत्र में सुधार करना और बंजर भूमि को उपजाऊ बनाकर खेती के अंतर्गत लाना था।
2. इस विभाग के अंतर्गत सरकार द्वारा किसानों को प्रत्यक्ष वित्तीय सहायता (तकावी ऋण या सौंदड़) प्रदान की जाती थी ताकि वे बीज, बैल और कृषि उपकरण खरीद सकें।
3. यह कृषि योजना अपने शुरुआती दौर में पूरी तरह सफल रही और इससे राज्य के राजस्व में भारी वृद्धि हुई, जिससे मुहम्मद बिन तुगलक ने अपनी राजधानी दिल्ली से दौलतगढ़ स्थानांतरित करने का निर्णय वापस ले लिया।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग XV' के अंतर्गत 'निर्वाचन' (Elections - अनुच्छेद 324 से 329A) तथा 'परिसीमन आयोग' (Delimitation Commission) के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 82 के अनुसार प्रत्येक जनगणना के पश्चात संसद द्वारा एक विधि के माध्यम से परिसीमन अधिनियम लागू किया जाता है, जिसके तहत लोकसभा और विधानसभाओं के निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण करने के लिए राष्ट्रपति के आदेश द्वारा एक स्वतंत्र 'परिसीमन आयोग' का गठन किया जाता है।
2. परिसीमन आयोग एक शक्तिशाली वैधानिक निकाय है, जिसके आदेशों को भारत के किसी भी न्यायालय में प्रश्नगत (Challenge) किया जा सकता है, और इस आयोग के निर्णयों के विरुद्ध उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय में अपील दायर करने का पूर्ण संवैधानिक अधिकार प्राप्त है।
3. 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा वर्ष 1971 की जनगणना के आधार पर लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की सीटों की कुल संख्या को वर्ष 2001 तक के लिए स्थिर (Freeze) कर दिया गया था, जिसे बाद में 84वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2001 द्वारा वर्ष 2026 के पश्चात होने वाली पहली जनगणना तक के लिए और बढ़ा दिया गया।
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग IV' के अंतर्गत 'राज्य के नीति निर्देशक तत्व' (Directive Principles of State Policy - DPSP - अनुच्छेद 36 से 51) तथा उनसे संबंधित संवैधानिक संशोधनों के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 38 के अनुसार राज्य, लोक कल्याण की अभिवृद्धि के लिए ऐसी सामाजिक व्यवस्था बनाएगा जिसमें सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय राष्ट्रीय जीवन की सभी संस्थाओं को अनुप्राणित करे, जिसे 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा जोड़ा गया था ताकि आय, प्रतिष्ठा और अवसरों की असमानताओं को कम किया जा सके।
2. 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा नीति निर्देशक तत्वों में कई नए निर्देश जोड़े गए थे, जिनमें बच्चों के स्वस्थ विकास के लिए अवसरों को सुरक्षित करना (अनुच्छेद 39), समान न्याय और निःशुल्क विधिक सहायता (अनुच्छेद 39A), उद्योगों के प्रबंधन में श्रमिकों की भागीदारी (अनुच्छेद 43A) तथा पर्यावरण का संरक्षण और संवहन तथा वन एवं वन्य जीवों की रक्षा (अनुच्छेद 48A) शामिल हैं।
3. 44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 द्वारा राज्य के नीति निर्देशक तत्वों में एक नया निर्देश (अनुच्छेद 38 का खंड 2) जोड़ा गया, जिसके तहत यह अनिवार्य किया गया कि राज्य विशेष रूप से आय की असमानताओं को कम करने का प्रयास करेगा और साथ ही प्रतिष्ठा, सुविधाओं और अवसरों की असमानता को केवल व्यक्तियों के बीच ही नहीं बल्कि विभिन्न क्षेत्रों में रहने वाले और विभिन्न व्यवसायों में लगे समूहों के बीच भी समाप्त करने का प्रयास करेगा।
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हुरुन ग्लोबल यूनिकॉर्न इंडेक्स 2026 में भारत की रैंक क्या है?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग IVक' (मूल कर्तव्य - अनुच्छेद 51क) तथा सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए विभिन्न निर्णयों के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. मूल कर्तव्यों को मूल संविधान में शामिल नहीं किया गया था, बल्कि इन्हें स्वर्ण सिंह समिति की संस्तुति पर 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा संविधान के भाग IVक में जोड़ा गया, और वर्तमान में संविधान में कुल 11 मूल कर्तव्य हैं जिन्हें वर्ष 2002 के 86वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा अंतिम बार संशोधित किया गया था।
2. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51क के अंतर्गत उल्लिखित सभी 11 मूल कर्तव्य प्रकृति से वाद योग्य (Justiciable) हैं, जिसका अर्थ है कि यदि कोई नागरिक अपने किसी मूल कर्तव्य का पालन नहीं करता है, तो उसके विरुद्ध उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अनुच्छेद 226 और अनुच्छेद 32 के तहत सीधे रिट याचिका जारी की जा सकती है।
3. 'रंगनाथ मिश्रा बनाम भारत संघ' (2003) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया था कि मूल कर्तव्यों को केवल कानूनी रूप से लागू करने या दण्डित करने का विषय नहीं बनाया जाना चाहिए, बल्कि देश में नागरिकों के बीच इनके प्रति जन-जागरूकता पैदा की जानी चाहिए और इन्हें कानून के अन्य प्रावधानों के साथ समेकित करके लागू किया जाना चाहिए।
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