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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग V' के अंतर्गत 'संसद' (अनुच्छेद 79 से 122) तथा 'संसदीय विशेषाधिकारों' (Parliamentary Privileges - अनुच्छेद 105) के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. संविधान के अनुच्छेद 105 के अनुसार संसद के प्रत्येक सदन को अपने सदस्यों के भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अतिरिक्त संसद में या उसकी किसी समिति में कही गई किसी बात या दिए गए किसी मत के संबंध में किसी भी न्यायालय में कोई कार्यवाही न चलाए जाने का उन्मुक्ति अधिकार प्राप्त है।
  2. 2. जब संसद का सत्र चल रहा हो, तब संसद के किसी भी सदस्य को दीवानी मामलों (Civil Cases) में भी सदन के आरंभ होने से 40 दिन पूर्व और सदन की समाप्ति के 40 दिन पश्चात् तक गिरफ्तार नहीं किया जा सकता है, और यह उन्मुक्ति आपराधिक मामलों (Criminal Cases) तथा निवारक नजरबंदी (Preventive Detention) के मामलों में भी समान रूप से पूर्णतः लागू होती है।
  3. 3. ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमन्स की परंपरा के अनुसार भारतीय संसद और उसके सदस्यों के पास अनिश्चितकालीन और असीमित संसदीय विशेषाधिकार प्राप्त हैं, जिन्हें न्यायालयों द्वारा किसी भी स्थिति में न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के दायरे में नहीं लाया जा सकता है, भले ही वे मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हों।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 सही है: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 105 के अंतर्गत संसद के प्रत्येक सदन, उसके सदस्यों और समितियों को कुछ विशेष अधिकार और उन्मुक्तियाँ प्राप्त हैं। अनुच्छेद 105(1) के अनुसार संसद में वाक् स्वतंत्रता होगी, और अनुच्छेद 105(2) के अनुसार संसद में या उसकी किसी समिति में संसद के किसी सदस्य द्वारा कही गई किसी बात या दिए गए किसी मत के संबंध में किसी भी न्यायालय में कोई वाद या कार्यवाही नहीं चलाई जाएगी। कथन 2 गलत है: संसदीय विशेषाधिकारों के तहत सांसदों को केवल 'दीवानी मामलों' (Civil Cases) में ही सदन के सत्र के दौरान और सत्र आरंभ होने से 40 दिन पूर्व तथा सत्र समाप्त होने के 40 दिन पश्चात् तक गिरफ्तारी से मुक्ति प्राप्त होती है। यह उन्मुक्ति 'आपराधिक मामलों' (Criminal Cases), देशद्रोह या निवारक नजरबंदी (Preventive Detention) के मामलों में लागू नहीं होती है, अर्थात आपराधिक मामलों में एक सांसद को सामान्य नागरिक की तरह गिरफ्तार किया जा सकता है। कथन 3 गलत है: भारत में ब्रिटिश संसद की तरह विशेषाधिकार अनियंत्रित नहीं हैं। भारतीय संविधान के तहत संसद ने अपने विशेषाधिकारों को संहिताबद्ध (Codify) नहीं किया है, किंतु वे संविधान के अन्य उपबंधों (जैसे भाग III के मौलिक अधिकारों) के अधीन हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने कई निर्णयों (जैसे केसवानंद भारती वाद और एम.एस.एम. शर्मा वाद) में यह स्पष्ट किया है कि संसदीय विशेषाधिकार भी न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के दायरे में आते हैं यदि वे नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन करते हैं।
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'रंगनाथ मिश्रा बनाम भारत संघ' (2003) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया था कि मूल कर्तव्यों को केवल कानूनी रूप से लागू करने या दण्डित करने का विषय नहीं बनाया जाना चाहिए, बल्कि देश में नागरिकों के बीच इनके प्रति जन-जागरूकता पैदा की जानी चाहिए और इन्हें कानून के अन्य प्रावधानों के साथ समेकित करके लागू किया जाना चाहिए। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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