BaalVikas
Menu
Civil services
Asked 2 months ago · Viewed 13 times

सामान्य विज्ञान, पर्यावरण और पारिस्थितिकी के संदर्भ में, 'जैविक ऑक्सीजन मांग' (Biological Oxygen Demand - BOD) और 'रासायनिक ऑक्सीजन मांग' (Chemical Oxygen Demand - COD) के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. BOD किसी जल निकाय में उपस्थित सूक्ष्मजीवों (जैसे बैक्टीरिया) द्वारा कार्बनिक पदार्थों के जैव-रासायनिक ऑक्सीकरण के लिए उपभोग की जाने वाली घुली हुई ऑक्सीजन की मात्रा है, और यह आमतौर पर 20°C तापमान पर 5 दिनों की अवधि में मापी जाती है।
  2. 2. COD जल निकाय में उपस्थित केवल जैव-निम्नीकरणीय (Biodegradable) कार्बनिक प्रदूषकों के रासायनिक ऑक्सीकरण के लिए आवश्यक ऑक्सीजन की कुल मात्रा को मापता है, जबकि अजैव-निम्नीकरणीय प्रदूषक इसके दायरे से बाहर होते हैं।
  3. 3. किसी जल निकाय का BOD और COD स्तर जितना उच्च होगा, उस जल में घुली हुई ऑक्सीजन (Dissolved Oxygen - DO) की उपलब्धता उतनी ही अधिक होगी, जो जलीय जीवों के पनपने के लिए अत्यंत अनुकूल पर्यावरण को दर्शाता है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 सही है: जैविक ऑक्सीजन मांग (BOD) जल में उपस्थित सूक्ष्मजीवों द्वारा कार्बनिक पदार्थों के अपघटन के लिए आवश्यक ऑक्सीजन की मात्रा को दर्शाता है, और मानक परीक्षण इसे 20°C तापमान पर 5 दिनों (BOD5) के लिए करते हैं। कथन 2 गलत है: COD जल निकाय में उपस्थित जैव-निम्नीकरणीय (Biodegradable) और अजैव-निम्नीकरणीय (Non-biodegradable) दोनों प्रकार के कार्बनिक प्रदूषकों के रासायनिक ऑक्सीकरण के लिए आवश्यक ऑक्सीजन की मात्रा को मापता है। कथन 3 गलत है: जल निकाय में BOD और COD का उच्च स्तर अधिक प्रदूषण को इंगित करता है, जिसके कारण जल में घुली हुई ऑक्सीजन (Dissolved Oxygen - DO) की मात्रा में भारी गिरावट आती है, जो जलीय जीवों के लिए हानिकारक होता है। अतः केवल कथन 1 सही है।
Share:
अगला प्रश्न → भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग XVII'… ← पिछला प्रश्न भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय…

Related Questions

→ भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग V' (संघ - अनुच्छेद 52 से 151) तथा 'भारत के महान्यायवादी' (Attorney General for India - अनुच्छेद 76) के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. महान्यायवादी की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा ऐसे व्यक्ति को की जाती है जो उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त होने के लिए अर्हित (Qualified) है, तथा संविधान में महान्यायवादी के लिए कोई निश्चित कार्यकाल निर्धारित नहीं किया गया है और वह राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत (During the pleasure of the President) पद धारण करता है। 2. भारत के महान्यायवादी को देश के सभी न्यायालयों में सुनवाई का अधिकार प्राप्त है, तथा उसे संसद के दोनों सदनों या उनकी संयुक्त बैठकों और संसद की किसी भी समिति (जिसका वह सदस्य नामित किया गया हो) में बोलने और भाग लेने का अधिकार तो है, किंतु उसे मतदान करने का कोई संवैधानिक अधिकार प्राप्त नहीं है। 3. महान्यायवादी भारत सरकार का पूर्णकालिक विधि अधिकारी (Full-time legal officer) होता है, और संविधान के नियमों के अनुसार वह किसी भी निजी कानूनी प्रैक्टिस या मुक़दमे में सरकार के विरुद्ध पैरवी नहीं कर सकता है, क्योंकि यह उसके पेशेवर आचरण के विरुद्ध एक सांविधिक प्रतिबंध है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? → भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग V' के अंतर्गत 'संसद' (अनुच्छेद 79 से 122) तथा 'संसदीय विशेषाधिकारों' (Parliamentary Privileges - अनुच्छेद 105) के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 105 के अनुसार संसद के प्रत्येक सदन को अपने सदस्यों के भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अतिरिक्त संसद में या उसकी किसी समिति में कही गई किसी बात या दिए गए किसी मत के संबंध में किसी भी न्यायालय में कोई कार्यवाही न चलाए जाने का उन्मुक्ति अधिकार प्राप्त है। 2. जब संसद का सत्र चल रहा हो, तब संसद के किसी भी सदस्य को दीवानी मामलों (Civil Cases) में भी सदन के आरंभ होने से 40 दिन पूर्व और सदन की समाप्ति के 40 दिन पश्चात् तक गिरफ्तार नहीं किया जा सकता है, और यह उन्मुक्ति आपराधिक मामलों (Criminal Cases) तथा निवारक नजरबंदी (Preventive Detention) के मामलों में भी समान रूप से पूर्णतः लागू होती है। 3. ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमन्स की परंपरा के अनुसार भारतीय संसद और उसके सदस्यों के पास अनिश्चितकालीन और असीमित संसदीय विशेषाधिकार प्राप्त हैं, जिन्हें न्यायालयों द्वारा किसी भी स्थिति में न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के दायरे में नहीं लाया जा सकता है, भले ही वे मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हों। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? → भारतीय अर्थव्यवस्था एवं सतत विकास के संदर्भ में, 'राष्ट्रीय हरित अधिकरण' (National Green Tribunal - NGT) और पर्यावरण संरक्षण से संबंधित सांविधिक प्रावधानों के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) की स्थापना राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 के अंतर्गत की गई थी, और यह देश का ऐसा पहला न्यायिक निकाय है जिसने अपने कामकाज के लिए भारत के संविधान की सातवीं अनुसूची की समवर्ती सूची के अंतर्गत पर्यावरण से जुड़े मामलों को हल करने के लिए अनिवार्य रूप से 'सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908' के कड़े प्रावधानों और सिद्धांतों का पालन करना वैधानिक रूप से अनिवार्य बनाया है। 2. NGT पर्यावरण से जुड़े किसी भी मामले में सिविल न्यायालयों की अधिकारिता को पूर्णतः बहिष्कृत करता है, तथा इस अधिकरण द्वारा दिए गए आदेश या निर्णय के विरुद्ध सीधे सर्वोच्च न्यायालय में न जाकर केवल संबंधित राज्य के उच्च न्यायालय में अपील दायर की जा सकती है, जिसके लिए अधिनियम के तहत 90 दिनों की समयावधि निर्धारित की गई है। 3. NGT को पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 की धारा 5 के तहत पर्यावरण प्रदूषण के निवारण और नियंत्रण से जुड़े आदेश पारित करने की शक्ति प्राप्त है, किंतु यह अधिकरण किसी भी उद्योग या इकाई के विरुद्ध स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लेते हुए पर्यावरण क्षतिपूर्ति (Environmental Compensation) या हर्जाने का आदेश जारी करने की शक्ति नहीं रखता है, जब तक कि कोई औपचारिक याचिका दायर न की जाए। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? → भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग XV' (निर्वाचन - अनुच्छेद 324 से 329क) तथा 'भारत निर्वाचन आयोग' (Election Commission of India) के अतिरिक्त अन्य संवैधानिक निकायों एवं निर्वाचन सुधारों के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 326 के अनुसार लोकसभा और राज्य की विधानसभाओं के लिए निर्वाचन वयस्क मताधिकार के आधार पर होंगे, जिसका तात्पर्य यह है कि प्रत्येक भारतीय नागरिक जो 18 वर्ष की आयु पूरी कर चुका है, उसे मतदान का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है और किसी भी व्यक्ति को केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर निर्वाचक नामावली में सम्मिलित किए जाने के लिए अपात्र घोषित नहीं किया जा सकता है। 2. संविधान के अनुच्छेद 327 के तहत संसद को यह अनन्य शक्ति प्राप्त है कि वह समय-समय पर विधि द्वारा संसदों और राज्य के विधानमंडलों के निर्वाचनों से संबंधित सभी मामलों (जिनमें मतदाता सूचियों की तैयारी, निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन और निर्वाचन के संचालन से जुड़े सभी अन्य विषय शामिल हैं) के संबंध में उपबंध कर सकती है। 3. 'परिसीमन आयोग अधिनियम' के अंतर्गत गठित परिसीमन आयोग (Delimitation Commission) के आदेशों को देश के किसी भी न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है, यदि वह आदेश संसद द्वारा निर्धारित नियमों या संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन करता हो, क्योंकि भारत में कोई भी वैधानिक निकाय न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर नहीं है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? → हुरुन ग्लोबल यूनिकॉर्न इंडेक्स 2026 में भारत की रैंक क्या है? → भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग IVक' (मूल कर्तव्य - अनुच्छेद 51क) तथा सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए विभिन्न निर्णयों के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. मूल कर्तव्यों को मूल संविधान में शामिल नहीं किया गया था, बल्कि इन्हें स्वर्ण सिंह समिति की संस्तुति पर 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा संविधान के भाग IVक में जोड़ा गया, और वर्तमान में संविधान में कुल 11 मूल कर्तव्य हैं जिन्हें वर्ष 2002 के 86वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा अंतिम बार संशोधित किया गया था। 2. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51क के अंतर्गत उल्लिखित सभी 11 मूल कर्तव्य प्रकृति से वाद योग्य (Justiciable) हैं, जिसका अर्थ है कि यदि कोई नागरिक अपने किसी मूल कर्तव्य का पालन नहीं करता है, तो उसके विरुद्ध उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अनुच्छेद 226 और अनुच्छेद 32 के तहत सीधे रिट याचिका जारी की जा सकती है। 3. 'रंगनाथ मिश्रा बनाम भारत संघ' (2003) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया था कि मूल कर्तव्यों को केवल कानूनी रूप से लागू करने या दण्डित करने का विषय नहीं बनाया जाना चाहिए, बल्कि देश में नागरिकों के बीच इनके प्रति जन-जागरूकता पैदा की जानी चाहिए और इन्हें कानून के अन्य प्रावधानों के साथ समेकित करके लागू किया जाना चाहिए। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Log in to add to quiz, bookmark, or report issues.