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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) द्वारा निर्धारित 'मूल संरचना सिद्धांत' (Basic Structure Doctrine) तथा न्यायिक समीक्षा की शक्ति के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. 'मूल संरचना सिद्धांत' की अवधारणा का प्रथम स्पष्ट प्रतिपादन गोलकनाथ वाद (1967) में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा किया गया था, जिसमें यह कहा गया था कि संसद अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संविधान के किसी भी भाग में संशोधन कर सकती है, बशर्ते वह मौलिक अधिकारों को कम न करे।
  2. 2. मिनर्वा मिल्स वाद (1980) में सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि 'संविधान की सीमित संशोधन शक्ति' और 'न्यायिक समीक्षा' दोनों ही संविधान की मूल संरचना के अभिन्न अंग हैं, और संसद संविधान के माध्यम से अपनी शक्ति को अनियंत्रित नहीं बना सकती है।
  3. 3. संविधान के अनुच्छेद 137 के तहत सर्वोच्च न्यायालय को स्वयं अपने द्वारा दिए गए निर्णय या आदेश की पुनरावलोकन (Review) करने की शक्ति प्राप्त है, किंतु संविधान संशोधन अधिनियमों (Constitutional Amendment Acts) को न्यायिक समीक्षा के दायरे से पूरी तरह बाहर रखा गया है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 असत्य है: 'मूल संरचना सिद्धांत' (Basic Structure Doctrine) की अवधारणा का प्रथम स्पष्ट प्रतिपादन गोलकनाथ वाद (1967) में नहीं, बल्कि 'केशवानंद भारती वाद (1973)' के ऐतिहासिक निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा किया गया था। गोलकनाथ वाद में सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्णय दिया था कि संसद मूल अधिकारों में संशोधन नहीं कर सकती है। कथन 2 सत्य है: मिनर्वा मिल्स वाद (1980) में सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि 'संविधान की सीमित संशोधन शक्ति' और 'न्यायिक समीक्षा' दोनों ही संविधान की मूल संरचना (Basic Structure) के अनिवार्य हिस्से हैं। संसद अपनी संशोधन शक्ति का उपयोग करके संविधान को नष्ट नहीं कर सकती है। कथन 3 असत्य है: संविधान संशोधन अधिनियमों को न्यायिक समीक्षा के दायरे से पूरी तरह बाहर नहीं रखा गया है। केशवानंद भारती वाद (1973) के बाद से सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यदि कोई भी संविधान संशोधन अधिनियम (यहां तक कि 9वीं अनुसूची में शामिल कानून भी, 'केशवानंद भारती वाद' के बाद के निर्णयों के अनुसार) संविधान की मूल संरचना का उल्लंघन करता है, तो सर्वोच्च न्यायालय द्वारा उसकी न्यायिक समीक्षा की जा सकती है और उसे असंवैधानिक घोषित किया जा सकता है।
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