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भारतीय इतिहास और स्वतंत्रता संग्राम के संदर्भ में, वर्ष 1931 के 'कराची अधिवेशन' (Karachi Session) और उससे संबंधित ऐतिहासिक घटनाक्रमों के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. कांग्रेस के कराची अधिवेशन की अध्यक्षता सरदार वल्लभभाई पटेल ने की थी, तथा इसी अधिवेशन में पहली बार कांग्रेस ने 'पूर्ण स्वराज' के प्रस्ताव को औपचारिक रूप से स्वीकार किया था।
- 2. इस अधिवेशन में 'मौलिक अधिकार और आर्थिक नीति' (Fundamental Rights and National Economic Programme) से संबंधित ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित किया गया था, जिसका मसौदा पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा तैयार किया गया था।
- 3. इसी अधिवेशन में कांग्रेस ने गांधी-इरविन समझौते (Delhi Pact) को अपनी स्वीकृति प्रदान की थी और महात्मा गांधी को द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में कांग्रेस के एकमात्र प्रतिनिधि के रूप में भाग लेने के लिए अधिकृत किया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 गलत है: कराची अधिवेशन (मार्च 1931) की अध्यक्षता सरदार वल्लभभाई पटेल ने की थी, यह सही है; किंतु कांग्रेस द्वारा 'पूर्ण स्वराज' (Complete Independence) का ऐतिहासिक प्रस्ताव इससे पहले दिसंबर 1930 के लाहौर अधिवेशन में पारित किया गया था, जिसकी अध्यक्षता पंडित जवाहरलाल नेहरू ने की थी। कराची अधिवेशन में मुख्य रूप से गांधी-इरविन समझौते का समर्थन किया गया था।
कथन 2 सही है: कराची अधिवेशन में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने पहली बार 'मौलिक अधिकारों' और 'राष्ट्रीय आर्थिक कार्यक्रम' पर एक प्रस्ताव अपनाया, जिसमें भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, संघ बनाने की स्वतंत्रता, और उद्योगों में श्रमिकों के हितों की रक्षा जैसे प्रावधान शामिल थे। इस प्रस्ताव का मसौदा पंडित जवाहरलाल नेहरू ने तैयार किया था।
कथन 3 सही है: इसी अधिवेशन में कांग्रेस ने मार्च 1931 में हुए 'गांधी-इरविन समझौते' को अपनी संपुष्टि (Ratification) प्रदान की और महात्मा गांधी को लंदन में होने वाले द्वितीय गोलमेज सम्मेलन (Second Round Table Conference) में भाग लेने के लिए एकमात्र प्रतिनिधि के रूप में नामित किया।
Related Questions
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भारतीय राजव्यवस्था और भारतीय संविधान के अनुच्छेद 142 के अंतर्गत 'पूर्ण न्याय' (Complete Justice) की शक्ति के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत सर्वोच्च न्यायालय को अपनी अधिकारिता का प्रयोग करते हुए कोई भी ऐसा डिक्री या आदेश पारित करने की अनन्य शक्ति प्राप्त है जो उसके समक्ष लंबित किसी भी वाद या विषय में 'पूर्ण न्याय' करने के लिए आवश्यक हो, और ऐसा प्रत्येक आदेश पूरे भारत में प्रवर्तनीय होता है।
2. अनुच्छेद 142 के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रदत्त शक्तियां पूर्णतः असीम और अनियंत्रित हैं, जिसका अर्थ है कि यह संसद द्वारा बनाए गए किसी भी सांविधिक कानून या मौलिक अधिकारों के प्रावधानों को भी निष्प्रभावी करते हुए सीधे आदेश जारी कर सकता है।
3. वर्ष 2015 में राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) अधिनियम को असंवैधानिक घोषित करते समय सर्वोच्च न्यायालय ने मुख्य रूप से इसी अनुच्छेद का हवाला देते हुए न्यायिक स्वतंत्रता को 'संविधान के बुनियादी ढांचा' (Basic Structure) का हिस्सा करार दिया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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स्वराज पार्टी की स्थापना किसने की थी?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 161' के अंतर्गत राज्यपाल की क्षमादान की शक्ति (Pardoning Power) तथा इसकी सीमाओं और न्यायिक समीक्षा के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 161 के तहत राज्यपाल को उस विषय संबंधी विधि के विरुद्ध किसी अपराध के लिए दोषी ठहराए गए व्यक्ति के दंड को क्षमा करने, उसका प्रविलंबन, विराम या परिहार करने अथवा दंडादेश के निलंबन, परिहार या लघुकरण की शक्ति प्राप्त है जिस विषय तक राज्य की कार्यकारी शक्ति का विस्तार होता है।
2. 'हरगोविन्द पंत बनाम रघुनाथ सिंह (1979)' और अन्य मामलों में उच्चतम न्यायालय ने यह स्पष्ट किया है कि राष्ट्रपति की तरह राज्यपाल को भी किसी भी मामले में 'मृत्युदंड' (Death Sentence) को पूरी तरह से क्षमा करने या माफ करने की संवैधानिक शक्ति प्राप्त है।
3. 'राज्य बनाम सतीश (2023)' या अन्य हालिया निर्णयों में सर्वोच्च न्यायालय ने यह व्यवस्था दी है कि यदि कोई राज्य विधानमंडल किसी ऐसे विषय पर कानून बनाता है जिसके तहत मृत्युदंड या कारावास का प्रावधान है, तो राज्यपाल की अनुच्छेद 161 के अधीन क्षमादान शक्ति मंत्रिपरिषद की सलाह के बिना पूरी तरह से उनके व्यक्तिगत स्वविवेक पर निर्भर होती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय पर्यावरण, पारिस्थितिकी और जैव विविधता के संदर्भ में, 'राष्ट्रीय हरित अधिकरण' (National Green Tribunal - NGT) की संरचना, अधिकारिता और उसकी कार्यप्रणाली के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राष्ट्रीय हरित अधिकरण की स्थापना राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 के अंतर्गत की गई थी, और यह भारत को जापान और न्यूजीलैंड के बाद पर्यावरण से संबंधित विशेष न्यायालय स्थापित करने वाला विश्व का तीसरा तथा पहला विकासशील देश बनाता है।
2. NGT को सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के तहत निहित सिविल न्यायालय की प्रक्रिया का सख्ती से पालन करना अनिवार्य होता है, और यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों (Principles of Natural Justice) से बंधा हुआ नहीं है।
3. NGT के आदेशों या निर्णयों से व्यथित कोई भी व्यक्ति इस अधिकरण के आदेश के साठ दिनों के भीतर सीधे उच्चतम न्यायालय में अपील दायर कर सकता है, क्योंकि इस अधिनियम के तहत उच्च न्यायालयों (High Courts) की रिट अधिकारिता को पूरी तरह से अपवर्जित कर दिया गया है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय पर्यावरण, पारिस्थितिकी एवं जैव विविधता के संदर्भ में, 'राष्ट्रीय हरित अधिकरण' (National Green Tribunal - NGT) और इसके क्षेत्राधिकार के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) की स्थापना वर्ष 2010 में 'राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010' के अंतर्गत पर्यावरण संरक्षण, वनों और अन्य प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण से संबंधित कानूनी अधिकारों के प्रभावी और तीव्र प्रवर्तन के लिए की गई थी, और यह भारत का ऐसा पहला विशेष न्यायिक निकाय है जो पर्यावरण संबंधी मामलों के लिए सामान्य न्यायालयों की प्रक्रियात्मक संहिताओं (जैसे सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908) से पूरी तरह बाध्य नहीं है।
2. इस अधिकरण के क्षेत्राधिकार के अंतर्गत 'वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980' और 'पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986' जैसे प्रमुख कानून शामिल हैं, किंतु 'वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972' और 'अनुसूचित जातियों और अन्य पारंपरिक वन जातियों (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006' (Forest Rights Act) को इसके विधायी क्षेत्राधिकार से बाहर रखा गया है।
3. NGT के लिए यह अनिवार्य किया गया है कि वह किसी भी पर्यावरण संबंधी आवेदन या अपील की प्राप्ति की तारीख से अधिकतम 6 महीने की अवधि के भीतर अपने अंतिम निर्णय या आदेश का निपटारा करे, तथा इसके निर्णयों के विरुद्ध अपील सीधे सर्वोच्च न्यायालय में ही की जा सकती है, जिसके लिए उच्च न्यायालयों का क्षेत्राधिकार वर्जित किया गया है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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