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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग IX' (पंचायतों से संबंधित - अनुच्छेद 243 से 243-O) के अंतर्गत 'जिला योजना समिति' (District Planning Committee - DPC) से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 243ZD के अनुसार, प्रत्येक राज्य में जिले स्तर पर एक जिला योजना समिति का गठन किया जाएगा ताकि उस जिले के लिए विकास योजनाएँ तैयार की जा सकें, और इस समिति के गठन का मुख्य संवैधानिक दायित्व राज्य विधानमंडल को सौंपा गया है जो इसके सदस्यों की संरचना और उनके निर्वाचन के संबंध में विधि का निर्माण करता है।
- 2. जिला योजना समिति के कुल सदस्यों में से कम से कम चार-चौथाई (75 प्रतिशत) सदस्य उस जिले की पंचायतों (जिला पंचायत और मध्यवर्ती/ब्लॉक पंचायतों) तथा नगरपालिकाओं (नगर निगमों, नगर परिषदों और नगर पंचायतों) के निर्वाचित सदस्यों द्वारा अपने में से ही चुने जाने चाहिए, और इन सदस्यों का अनुपात जिले में ग्रामीण और शहरी आबादी के अनुपात के आधार पर होना चाहिए।
- 3. जिला योजना समिति के अध्यक्ष को उस जिले का केंद्रीय मंत्री या संबंधित राज्य का राज्यपाल नामित करता है, तथा समिति द्वारा तैयार की गई जिला विकास योजना को अंतिम रूप देने के बाद उसे सीधे केंद्र सरकार की योजना आयोग की तर्ज पर केंद्रीय वित्त मंत्रालय को भेजा जाता है, जिसे राज्य सरकार द्वारा संशोधित या अस्वीकार नहीं किया जा सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 243ZD के अनुसार, प्रत्येक राज्य में जिला स्तर पर एक जिला योजना समिति (DPC) का गठन किया जाएगा ताकि जिले के लिए विकास योजनाएँ तैयार की जा सकें। इस अनुच्छेद के तहत राज्य के विधानमंडल को यह शक्ति दी गई है कि वह DPC के गठन, उसके सदस्यों की संरचना और उनके निर्वाचन/मनोनयन के संबंध में कानून बनाए।
कथन 2 गलत है: संविधान के अनुच्छेद 243ZD(3) के अनुसार, जिला योजना समिति के कुल सदस्यों में से कम से कम चार-चौथाई (75%) सदस्य जिले की पंचायतों (जिला पंचायत और मध्यवर्ती पंचायतों) तथा नगरपालिकाओं के **निर्वाचित सदस्यों** द्वारा अपने में से ही चुने जाने चाहिए। ये सदस्य जिले की ग्रामीण और शहरी जनसंख्या के अनुपात के आधार पर चुने जाते हैं, न कि केवल 'चार-चौथाई' शब्द यहाँ गलत है बल्कि अनुपात ग्रामीण-शहरी आबादी के अनुसार होता है (तथ्य में आंशिक त्रुटि या भ्रम उत्पन्न करने के लिए विधान की भाषा को समझना आवश्यक है; यहाँ मूल प्रावधान यह है कि निर्वाचित सदस्यों का अनुपात ग्रामीण एवं शहरी जनसंख्या के अनुपात के अनुरूप होता है, लेकिन DPC के कुल सदस्यों का 4/5 यानी 80% या अन्य अनुपात राज्य कानून तय कर सकता है? नहीं, संविधान के अनुसार 4/5 भाग यानी 80% सदस्य पंचायतों और नगरपालिकाओं के निर्वाचित सदस्यों द्वारा चुने जाने चाहिए, न कि 75%। इसलिए कथन 2 में दिए गए 'चार-चौथाई' (75%) आँकड़े के कारण यह कथन गलत हो जाता है, क्योंकि संवैधानिक प्रावधान 4/5 (अस्सी प्रतिशत) का है)।
कथन 3 गलत है: जिला योजना समिति का अध्यक्ष राज्य के राज्यपाल या केंद्रीय मंत्री द्वारा नामित नहीं किया जाता है, बल्कि राज्य के कानूनों और नियमों के अनुसार आमतौर पर जिला पंचायत का अध्यक्ष या कोई अन्य नामित व्यक्ति इसका नेतृत्व करता है। इसके अलावा, समिति द्वारा तैयार की जाने वाली विकास योजना को राज्य सरकार को प्रस्तुत किया जाता है, न कि सीधे केंद्र सरकार को। राज्य सरकार इन योजनाओं की समीक्षा करती है।
अतः केवल कथन 1 सही है।
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग IX-B' के अंतर्गत 'सहकारी समितियाँ' (Co-operative Societies - अनुच्छेद 243-ZH से 243-ZT) तथा '97वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2011' के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. 97वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2011 के माध्यम से संविधान में तीन महत्वपूर्ण परिवर्तन किए गए: मौलिक अधिकारों में अनुच्छेद 19(1)(c) के तहत सहकारी समितियाँ बनाने का अधिकार एक स्पष्ट मौलिक अधिकार के रूप में जोड़ा गया, नीति निर्देशक तत्वों में अनुच्छेद 43-B को शामिल किया गया, और संविधान में एक नया भाग IX-B जोड़ा गया।
2. इस संशोधन के तहत संविधान के अनुच्छेद 243-ZK में यह प्रावधान किया गया कि किसी भी सहकारी समिति के बोर्ड के सदस्यों की अधिकतम संख्या इक्कीस (21) से अधिक नहीं होगी, और इसमें महिलाओं तथा अनुसूचित जातियों/अनुसूचित जनजातियों के प्रतिनिधियों के लिए क्रमशः कम से कम एक-तिहाई और दो सीटें आरक्षित करना अनिवार्य है।
3. सुप्रीम कोर्ट द्वारा 'एस. संघन पाटिल बनाम भारत संघ (2021)' मामले में 97वें संविधान संशोधन अधिनियम की संवैधानिक वैधता की समीक्षा करते हुए यह निर्णय दिया गया कि चूँकि इस संशोधन ने राज्यों के विधाई क्षेत्रों (राज्य सूची की प्रविष्टि 32) को सीधे तौर पर प्रभावित किया था, इसलिए संविधान के अनुच्छेद 368(2) के परंतुक (Proviso) के अनुसार कम से कम आधे राज्यों के विधानमंडलों द्वारा इसका अनुसमर्थन प्राप्त करना अनिवार्य था, और राज्यों के अनुसमर्थन के अभाव में भाग IX-B को पूरी तरह से असंवैधानिक और शून्य घोषित कर दिया गया।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय पर्यावरण, पारिस्थितिकी और जैव विविधता के संदर्भ में, भारतीय वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 (Wildlife Protection Act, 1972) के अंतर्गत 'समुद्री संरक्षित क्षेत्रों' (Marine Protected Areas) और 'राष्ट्रीय जलीय जीव' (National Aquatic Animal) के प्रावधानों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 (संशोधित रूप में) के तहत किसी भी क्षेत्र को 'समुद्री अभ्यारण्य' (Marine Sanctuary) या राष्ट्रीय उद्यान घोषित करने की शक्ति केवल केंद्र सरकार के पास होती है, और राज्य सरकारों का इसमें कोई विधिक अधिकार नहीं होता है।
2. भारत की प्रसिद्ध 'गंगा नदी डॉल्फ़िन' (Gangetic River Dolphin) को वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची-I के अंतर्गत सर्वोच्च विधिक संरक्षण प्रदान किया गया है, और इसे वर्ष 2009 में भारत का 'राष्ट्रीय जलीय जीव' घोषित किया गया था।
3. वन्यजीव संरक्षण (संशोधन) अधिनियम, 2022 के पश्चात, इस अधिनियम की मूल अनुसूचियों की संख्या को कम करके अब केवल दो अनुसूचियाँ (एक वन्यजीवों के लिए और एक पादप प्रजातियों के लिए) कर दिया गया है, जो संकटग्रस्त प्रजातियों के प्रबंधन को सुव्यवस्थित करती हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय अर्थव्यवस्था एवं सतत विकास के संदर्भ में, 'सार्वजनिक वित्त' (Public Finance) और 'राजकोषीय समेकन' (Fiscal Consolidation) के तहत 'राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन अधिनियम, 2003' (FRBM Act, 2003) के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. FRBM अधिनियम का मुख्य उद्देश्य देश में वित्तीय अनुशासन को सुनिश्चित करना, दीर्घकालिक समष्टि आर्थिक स्थिरता (Macroeconomic Stability) प्राप्त करना और राजस्व घाटे को समाप्त करके राजस्व अधिप्लव (Revenue Surplus) उत्पन्न करना था।
2. FRBM अधिनियम के मूल प्रावधानों के अनुसार केंद्र सरकार को यह लक्ष्य दिया गया था कि वह वर्ष 2008-09 तक राजकोषीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 3 प्रतिशत तक ले आएगी, जिसे बाद में वैश्विक वित्तीय संकट और विभिन्न संशोधनों के कारण कई बार स्थगित करना पड़ा।
3. एन. के. सिंह समिति (N.K. Singh Committee) की सिफारिशों के आधार पर FRBM अधिनियम में संशोधन करके यह तय किया गया कि केंद्र सरकार वर्ष 2020-21 तक राजकोषीय घाटे को GDP के 3 प्रतिशत तक और वर्ष 2024-25 तक इसे 2.5 प्रतिशत तक सीमित करने का प्रयास करेगी।
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