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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग X' (अनुसूचित और जनजाति क्षेत्र - अनुच्छेद 244 और 244A) तथा 'अनुसूचियों 5 और 6' से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान की पाँचवीं अनुसूची असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम को छोड़कर किसी भी राज्य में अनुसूचित क्षेत्रों (Scheduled Areas) के प्रशासन और नियंत्रण से संबंधित है, और इन क्षेत्रों में 'जनजाति सलाहकार परिषद' (Tribal Advisory Council) का गठन अनिवार्य किया गया है जिसमें सदस्यों की कुल संख्या में से तीन-चौथाई (75 प्रतिशत) स्थान संबंधित राज्य की विधानसभा में उस राज्य के अनुसूचित जनजातियों के प्रतिनिधियों के लिए आरक्षित होते हैं।
- 2. संविधान की छठी अनुसूची असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम राज्यों के जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन के लिए विशेष उपबंध करती है, जिसके तहत इन राज्यों में स्वायत्त जिला परिषदों (Autonomous District Councils - ADCs) का गठन किया जाता है, जिन्हें भूमि, वनों, कृषि, और सामाजिक रीति-रिवाजों जैसे मामलों पर कानून बनाने की विधायी शक्तियाँ प्राप्त होती हैं, किंतु इनके द्वारा बनाए गए सभी कानूनों को प्रभावी होने से पहले संबंधित राज्य के राज्यपाल की स्वीकृति प्राप्त करना अनिवार्य होता है।
- 3. किसी क्षेत्र को 'अनुसूचित क्षेत्र' (Scheduled Area) के रूप में घोषित करने, उसकी सीमाओं में परिवर्तन करने या उसे बढ़ाने-घटाने की अनन्य संवैधानिक शक्ति भारत के राष्ट्रपति में निहित होती है, और इस प्रकार की घोषणा करने के लिए संबंधित राज्य के राज्यपाल की रिपोर्ट के आधार पर केंद्रीय मंत्रिमंडल की सलाह पर राष्ट्रपति द्वारा एक आदेश जारी किया जाता है, जिसके लिए संसद द्वारा किसी नए संवैधानिक संशोधन की आवश्यकता नहीं होती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 गलत है क्योंकि पाँचवीं अनुसूची के अंतर्गत राज्यों में गठित 'जनजाति सलाहकार परिषद' (TAC) के संबंध में यह प्रावधान है कि इसके सदस्यों की कुल संख्या में से तीन-चौथाई (75%) स्थान संबंधित राज्य की विधानसभा में अनुसूचित जनजातियों के प्रतिनिधियों के लिए आरक्षित होंगे (यदि विधानसभा में उतने आदिवासी सदस्य हैं), न कि राज्य की विधानसभा के कुल सदस्यों के लिए। इसके अलावा, पाँचवीं अनुसूची असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम पर लागू नहीं होती, बल्कि इन चार राज्यों के लिए छठी अनुसूची का प्रावधान है। कथन 2 सही है: छठी अनुसूची के तहत असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम के जनजातीय क्षेत्रों के लिए स्वायत्त जिला परिषदों (ADCs) का गठन किया जाता है, जिन्हें भूमि, वन, विवाह, सामाजिक रीति-रिवाजों आदि पर कानून बनाने की शक्ति होती है और इनके द्वारा बनाए गए कानून राज्यपाल की स्वीकृति के बाद ही लागू होते हैं। कथन 3 सही है: संविधान के अनुच्छेद 244 के प्रावधानों के तहत किसी क्षेत्र को 'अनुसूचित क्षेत्र' घोषित करने या उसकी सीमा बदलने की शक्ति भारत के राष्ट्रपति के पास होती है, और यह राष्ट्रपति के एक कार्यकारी आदेश (राज्यपाल की सिफारिश पर) के माध्यम से किया जाता है, जिसके लिए अनुच्छेद 368 के तहत संविधान संशोधन की आवश्यकता नहीं होती है। अतः केवल कथन 2 और 3 सही हैं।
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग IV' (राज्य के नीति निर्देशक तत्व - अनुच्छेद 36 से 51) के अंतर्गत उल्लिखित 'समान नागरिक संहिता' (Uniform Civil Code - UCC) से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 44 के अनुसार, राज्य भारत के पूरे क्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता को सुरक्षित करने का प्रयास करेगा, और यह प्रावधान एक न्यायोचित (Justiciable) अधिकार है जिसे किसी भी उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय द्वारा रिट (Writ) जारी करके लागू कराया जा सकता है।
2. भारत में 'समान नागरिक संहिता' की अवधारणा का तात्पर्य एक ऐसे एकल कानून से है जो देश के सभी नागरिकों पर उनके धर्म, पंथ, लिंग या जाति के भेदभाव के बिना व्यक्तिगत मामलों (जैसे विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और गोद लेना) में समान रूप से लागू हो, बशर्ते कि यह संविधान के अन्य मौलिक अधिकारों के अनुकूल हो।
3. हालांकि संविधान सभा में चर्चा के दौरान डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ने UCC के पक्ष में प्रबल तर्क दिए थे, किंतु संविधान सभा के भारी विरोध और समाज के विभिन्न वर्गों की धार्मिक स्वायत्तता को सुरक्षित रखने की अनिवार्यता के कारण इसे नीति निर्देशक तत्वों (DPSP) के रूप में शामिल किया गया, न कि एक प्रवर्तनीय (Enforceable) मौलिक अधिकार के रूप में।
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग III' (मूल अधिकार) के अंतर्गत 'अनुच्छेद 32' (संवैधानिक उपचारों का अधिकार) तथा इसके अंतर्गत जारी की जाने वाली 'रिट' (Writs) की शक्तियों के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 32 के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय को मूल अधिकारों के प्रवर्तन के लिए निर्देश, आदेश या रिट (जिनमें बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, अधिकार पृच्छा, उत्प्रेषण और प्रतिषेध शामिल हैं) जारी करने का अधिकार है, और डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ने इसे 'संविधान का हृदय और आत्मा' कहा था।
2. 'उत्प्रेषण' (Certiorari) और 'प्रतिषेध' (Prohibition) दोनों ही रिटें मुख्य रूप से न्यायिक और अर्द्ध-न्यायिक प्राधिकरणों के विरुद्ध जारी की जाती हैं, जहाँ 'प्रतिषेध' का उद्देश्य निचली अदालतों को उनकी अधिकारिता से बाहर जाने से रोकना है (निवारक), जबकि 'उत्प्रेषण' का उद्देश्य लंबित मामले के आदेश को रद्द करना या उसके निर्णय को पस्त करना होता है (उपचारात्मक और निवारक दोनों)।
3. अनुच्छेद 32 स्वयं में एक मूल अधिकार है, इसलिए यदि किसी व्यक्ति के मूल अधिकारों का उल्लंघन होता है, तो वह सीधे सर्वोच्च न्यायालय जा सकता है, तथा संसद को यह शक्ति प्राप्त है कि वह राष्ट्रीय सुरक्षा या सार्वजनिक व्यवस्था के हित में अनुच्छेद 32 के अंतर्गत प्राप्त अधिकारों को किसी भी स्थिति में स्थायी रूप से समाप्त या निरस्त कर सकती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय पर्यावरण, पारिस्थितिकी और जैव विविधता संरक्षण के संदर्भ में, 'राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010' (National Green Tribunal Act, 2010) के अंतर्गत स्थापित 'राष्ट्रीय हरित अधिकरण' (NGT) की शक्तियों, अधिकार क्षेत्र और सीमाओं के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) को भारत के संविधान के 'अनुच्छेद 21' के अंतर्गत प्रदत्त जीवन के अधिकार के तहत स्वस्थ पर्यावरण के अधिकार को लागू करने का वैधानिक जनादेश प्राप्त है, और यह अधिकरण सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) के कड़े प्रक्रियात्मक नियमों से बंधा नहीं है, बल्कि यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों (Principles of Natural Justice) द्वारा निर्देशित होता है।
2. NGT अधिनियम की धारा 14 के तहत यह प्रावधान किया गया है कि अधिकरण के समक्ष पर्यावरण से जुड़े किसी भी विवाद या आवेदन को उस कारण के उत्पन्न होने की तारीख से 'छह महीने' की अवधि के भीतर दायर किया जाना अनिवार्य है, किंतु अधिकरण के पास यह विवेकाधीन शक्ति (Discretionary Power) है कि वह पर्याप्त कारणों से संतुष्ट होने पर इस अवधि को अधिकतम 'अतिरिक्त साठ दिन' (60 days) तक बढ़ा सकता है।
3. 'वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980' और 'जैविक विविधता अधिनियम, 2002' को NGT के वैधानिक क्षेत्राधिकार की पहली अनुसूची (Schedule I) में शामिल किया गया है, किंतु 'वन अधिकार अधिनियम, 2006' (Scheduled Tribes and Other Traditional Forest Dwellers Act, 2006) को इसके क्षेत्राधिकार से पूर्णतः बाहर रखा गया है, जिसके कारण वनवासियों के अधिकारों से जुड़े मामलों की सुनवाई NGT द्वारा नहीं की जा सकती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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सामान्य विज्ञान और पर्यावरण के संदर्भ में, 'ओजोन परत का क्षरण' (Ozone Layer Depletion) और 'ध्रुवीय समतापमंडलीय बादल' (Polar Stratospheric Clouds - PSCs) के बीच की अंतःक्रिया तथा इसके प्रभावों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. ध्रुवीय समतापमंडलीय बादल (PSCs) सर्दियों के मौसम में ध्रुवीय क्षेत्रों (विशेषकर अंटार्कटिका के ऊपर) के समतापमंडल में बनते हैं, और ये बादल सतह प्रदान करते हैं जिस पर निष्क्रिय क्लोरीन यौगिक सक्रिय क्लोरीन (जैसे Cl2) में परिवर्तित हो जाते हैं।
2. वसंत ऋतु के आगमन पर जब सूर्य की किरणें ध्रुवीय क्षेत्रों में पहुंचती हैं, तो पराबैंगनी विकिरण इन सक्रिय क्लोरीन अणुओं को क्लोरीन मूलकों (Chlorine radicals) में विघटित कर देते हैं, जो ओजोन अणुओं के विनाश की उत्प्रेरक श्रृंखला (Catalytic chain reaction) को शुरू करते हैं।
3. यद्यपि क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs) ओजोन क्षरण के लिए मुख्य रूप से उत्तरदायी हैं, किंतु समतापमंडल में ओजोन परत के पूर्ण संरक्षण के लिए 'मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल' (Montreal Protocol) मुख्य रूप से ग्रीनहाउस गैसों जैसे कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन के वैश्विक उत्सर्जन को नियंत्रित करने के लिए बाध्यकारी समझौता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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