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भारतीय और विश्व भूगोल के संदर्भ में, 'भूकंपीय तरंगों' (Seismic Waves) और पृथ्वी की आंतरिक संरचना के अध्ययन से जुड़ी 'असांतत्य रेखाओं' (Discontinuities) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. कॉनराड असांतत्य (Conrad Discontinuity) ऊपरी क्रस्ट और निचली क्रस्ट के बीच की सीमा को अलग करती है, जबकि मोहरोविकिक असांतत्य (Mohorovicic Discontinuity) क्रस्ट और मेंटल के बीच की सीमा को पृथक करती है।
- 2. गुटेनबर्ग असांतत्य (Gutenberg Discontinuity) पृथ्वी के मेंटल और बाह्य क्रोड (Outer Core) के बीच स्थित है, जहाँ से प्राथमिक तरंगें (P-waves) अचानक तीव्र गति से मुड़ जाती हैं और द्वितीयक तरंगें (S-waves) पूरी तरह से विलुप्त हो जाती हैं।
- 3. लेहमैन असांतत्य (Lehmann Discontinuity) बाह्य क्रोड और आंतरिक क्रोड (Inner Core) के बीच स्थित एक संक्रमण क्षेत्र है, जिसकी खोज इस तथ्य पर आधारित है कि आंतरिक क्रोड में P-waves की गति में अचानक परिवर्तन या तेज वृद्धि दर्ज की जाती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: पृथ्वी कीपपड़ी (Crust) को दो भागों में बांटा जाता है- ऊपरी क्रस्ट और निचली क्रस्ट, जिनके बीच की सीमा को 'कॉनराड असांतत्य' (Conrad Discontinuity) कहा जाता है। इसके नीचे क्रस्ट और मेंटल (Mantle) के बीच की सीमा को 'मोहरोविकिक (मोहो) असांतत्य' (Mohorovicic Discontinuity) कहते हैं।
कथन 2 सही है: गुटेनबर्ग असांतत्य (Gutenberg Discontinuity) मेंटल और बाह्य क्रोड के बीच स्थित होती है (लगभग 2900 किमी गहराई पर)। इस सीमा पर S-waves तरल माध्यम (बाह्य क्रोड) के कारण पूरी तरह से लुप्त हो जाती हैं, और P-waves के वेग में भारी गिरावट आती है।
कथन 3 सही है: लेहमैन असांतत्य (Lehmann Discontinuity) बाह्य तरल क्रोड और ठोस आंतरिक क्रोड के बीच लगभग 5150 किमी की गहराई पर स्थित है। यहाँ P-waves की गति में अचानक वृद्धि (Refraction के कारण) दर्ज की जाती है, जो आंतरिक क्रोड के ठोस होने का संकेत देती है। चूँकि तीनों कथन पूर्णतः सत्य हैं, अतः विकल्प (d) सही है।
Related Questions
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भारतीय पर्यावरण कानून और राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) की कार्यप्रणाली के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 के तहत स्थापित एनजीटी (NGT) को पर्यावरण से जुड़े किसी भी मामले में सिविल न्यायालयों की तरह समन जारी करने, साक्ष्य मांगने और दस्तावेजों की जांच करने की व्यापक शक्तियां प्राप्त हैं, किंतु यह सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के सख्त नियमों से बंधा नहीं है बल्कि यह 'प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों' (Principles of Natural Justice) पर कार्य करता है।
2. राष्ट्रीय हरित अधिकरण द्वारा पर्यावरण संरक्षण या प्रदूषण से संबंधित मामलों में दिए गए किसी भी आदेश, निर्णय या पुरस्कार के खिलाफ पहली और अंतिम अपील सीधे तौर पर केवल संबंधित राज्य के उच्च न्यायालय (High Court) में ही दायर की जा सकती है, सर्वोच्च न्यायालय में नहीं।
उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
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भारत के राज्य सचिव (Secretary of State) के कार्य में सहायता हेतु कितनी सदस्यीय परिषद का गठन किया गया था?
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भारतीय पर्यावरण, पारिस्थितिकी और जैव विविधता संरक्षण के संदर्भ में, 'राष्ट्रीय हरित अधिकरण' (National Green Tribunal - NGT) की स्थापना, शक्तियों और इसके विधिक प्रावधानों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) की स्थापना वर्ष 2010 में 'राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010' के अंतर्गत पर्यावरण संरक्षण, वनों और अन्य प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण से संबंधित कानूनी अधिकारों के प्रभावी और त्वरित प्रवर्तन के लिए की गई थी, और यह भारत का ऐसा पहला सांविधिक निकाय है जिसे पर्यावरण संबंधी मुकदमों की सुनवाई के लिए सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के सख्त नियमों का पालन करने से छूट प्राप्त है।
2. NGT अधिनियम, 2010 के प्रावधानों के अनुसार, अधिकरण को पर्यावरण से जुड़े मामलों में 'सख्त दायित्व' (Strict Liability) के सिद्धांत के आधार पर मुआवजा देने और प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों या व्यक्तियों को पर्यावरण क्षतिपूर्ति का निर्देश देने की शक्ति प्राप्त है, किंतु यह अधिकरण 'वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980' और 'लोक दायित्व बीमा अधिनियम, 1991' के अंतर्गत आने वाले मामलों पर विचार करने के लिए विधिक रूप से अधिकृत नहीं है।
3. NGT के किसी भी आदेश, निर्णय या पुरस्कार (Award) के विरुद्ध अपील सीधे सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) में ही दाखिल की जा सकती है, और अधिकरण के निर्णय को किसी भी उच्च न्यायालय (High Court) के समक्ष रिट अधिकारक्षेत्र (Writ Jurisdiction) के तहत चुनौती नहीं दी जा सकती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 124' के अंतर्गत 'उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति' और 'कॉलेजियम प्रणाली' के विकास के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के मूल पाठ में उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए 'कॉलेजियम प्रणाली' का कोई प्रावधान नहीं था, और वर्ष 1993 के द्वितीय न्यायाधीश मामले (Second Judges Case) में सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्धारित किया कि मुख्य न्यायाधीश की 'परामर्श' (Consultation) प्रक्रिया का अर्थ वस्तुतः 'सहमति' (Concurrence) है।
2. 'तृतीय न्यायाधीश मामले' (Third Judges Case, 1998) में सर्वोच्च न्यायालय ने परामर्श प्रक्रिया के दायरे का विस्तार करते हुए यह स्पष्ट किया कि मुख्य न्यायाधीश के साथ कॉलेजियम में सर्वोच्च न्यायालय के चार वरिष्ठतम न्यायाधीश शामिल होने चाहिए, और इनमें से यदि दो न्यायाधीश भी किसी नियुक्ति के विरुद्ध लिखित रूप में संस्तुति करते हैं, तो वह नियुक्ति आगे नहीं बढ़ाई जाएगी।
3. राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) अधिनियम, 2014 और उससे संबंधित 99वें संविधान संशोधन अधिनियम को सर्वोच्च न्यायालय ने 'चौथे न्यायाधीश मामले' (Fourth Judges Case, 2015) में इस आधार पर असंवैधानिक घोषित कर दिया कि यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता और संविधान के 'बुनियादी ढांचे' (Basic Structure) का उल्लंघन करता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग IX' और 'भाग IX-A' के अंतर्गत स्थानीय शासन (पंचायतों और नगरपालिकाओं) से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. 73वें और 74वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 द्वारा क्रमशः पंचायतों और नगरपालिकाओं को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया गया, और इन दोनों स्तरों पर सभी सीटों के चुनाव के लिए प्रत्यक्ष निर्वाचन के माध्यम से कम से कम एक-तिहाई (33%) सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की गईं, जिसमें अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की महिलाओं के लिए आरक्षित सीटें भी शामिल हैं।
2. संविधान का अनुच्छेद 243-G पंचायतों को आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय के लिए योजनाएं तैयार करने तथा ग्यारहवीं अनुसूची में सूचीबद्ध 29 विषयों के संबंध में कार्य करने की शक्ति प्रदान करता है, और इन विषयों पर कानून बनाने व अधिकार सौंपने का कार्य अनिवार्य रूप से केंद्र सरकार द्वारा किया जाता है, राज्य विधानमंडलों द्वारा नहीं।
3. प्रत्येक राज्य में पंचायतों और नगरपालिकाओं की वित्तीय स्थिति की समीक्षा करने के लिए राज्यपाल द्वारा प्रत्येक पाँच वर्ष की समाप्ति पर एक 'राज्य वित्त आयोग' (State Finance Commission) के गठन का प्रावधान किया गया है, जो राज्य और स्थानीय निकायों के बीच करों, शुल्कों और टोल के वितरण के सिद्धांतों की संस्तुति करता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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