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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 124' के अंतर्गत 'उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति' और 'कॉलेजियम प्रणाली' के विकास के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. संविधान के मूल पाठ में उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए 'कॉलेजियम प्रणाली' का कोई प्रावधान नहीं था, और वर्ष 1993 के द्वितीय न्यायाधीश मामले (Second Judges Case) में सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्धारित किया कि मुख्य न्यायाधीश की 'परामर्श' (Consultation) प्रक्रिया का अर्थ वस्तुतः 'सहमति' (Concurrence) है।
  2. 2. 'तृतीय न्यायाधीश मामले' (Third Judges Case, 1998) में सर्वोच्च न्यायालय ने परामर्श प्रक्रिया के दायरे का विस्तार करते हुए यह स्पष्ट किया कि मुख्य न्यायाधीश के साथ कॉलेजियम में सर्वोच्च न्यायालय के चार वरिष्ठतम न्यायाधीश शामिल होने चाहिए, और इनमें से यदि दो न्यायाधीश भी किसी नियुक्ति के विरुद्ध लिखित रूप में संस्तुति करते हैं, तो वह नियुक्ति आगे नहीं बढ़ाई जाएगी।
  3. 3. राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) अधिनियम, 2014 और उससे संबंधित 99वें संविधान संशोधन अधिनियम को सर्वोच्च न्यायालय ने 'चौथे न्यायाधीश मामले' (Fourth Judges Case, 2015) में इस आधार पर असंवैधानिक घोषित कर दिया कि यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता और संविधान के 'बुनियादी ढांचे' (Basic Structure) का उल्लंघन करता है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 सही है: मूल संविधान के अनुच्छेद 124(2) के अनुसार राष्ट्रपति उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति करता था, जिसमें वह भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) और अन्य न्यायाधीशों से परामर्श कर सकता था। वर्ष 1993 के 'द्वितीय न्यायाधीश मामले' में सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला दिया कि परामर्श का मतलब मुख्य न्यायाधीश की 'सहमति' से है, जिससे कॉलेजियम प्रणाली की नींव पड़ी। कथन 2 सही है: 1998 के 'तृतीय न्यायाधीश मामले' (राष्‍ट्रपति के विशेष संदर्भ पर) में सर्वोच्च न्यायालय ने व्यवस्था दी कि कॉलेजियम में CJI और चार वरिष्ठतम न्यायाधीश शामिल होंगे। बहुमत की राय के बिना नियुक्ति वैध नहीं होगी, और यदि दो न्यायाधीश भी असहमत हैं तो नाम आगे नहीं बढ़ाया जाएगा। कथन 3 सही है: संसद द्वारा पारित 99वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2014 और NJAC अधिनियम को 'चौथे न्यायाधीश मामले' (2015) में सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने 4:1 के बहुमत से असंवैधानिक और शून्य घोषित कर दिया, क्योंकि यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता को प्रभावित करता था जो संविधान के बुनियादी ढांचे का हिस्सा है।
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