त्वरित लिंक्स
Civil services
6 views
भारतीय पर्यावरण कानून और राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) की कार्यप्रणाली के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 के तहत स्थापित एनजीटी (NGT) को पर्यावरण से जुड़े किसी भी मामले में सिविल न्यायालयों की तरह समन जारी करने, साक्ष्य मांगने और दस्तावेजों की जांच करने की व्यापक शक्तियां प्राप्त हैं, किंतु यह सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के सख्त नियमों से बंधा नहीं है बल्कि यह 'प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों' (Principles of Natural Justice) पर कार्य करता है।
- 2. राष्ट्रीय हरित अधिकरण द्वारा पर्यावरण संरक्षण या प्रदूषण से संबंधित मामलों में दिए गए किसी भी आदेश, निर्णय या पुरस्कार के खिलाफ पहली और अंतिम अपील सीधे तौर पर केवल संबंधित राज्य के उच्च न्यायालय (High Court) में ही दायर की जा सकती है, सर्वोच्च न्यायालय में नहीं।
उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) की स्थापना राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 के अंतर्गत की गई थी। एनजीटी को सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) की सख्त और तकनीकी प्रक्रियाओं का पालन करने की बाध्यता से छूट दी गई है; इसके बजाय, यह अधिकरण 'प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों' (Principles of Natural Justice) के आधार पर अपने मामलों का निपटारा करता है। हालांकि, साक्ष्य प्रस्तुत करने, गवाहों को बुलाने और दस्तावेजों की मांग करने के मामलों में इसे सिविल न्यायालय जैसी ही शक्तियां प्राप्त हैं।
कथन 2 गलत है: राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के किसी भी आदेश, निर्णय या पुरस्कार से व्यथित व्यक्ति एनजीटी के आदेश के 90 दिनों के भीतर अपनी अपील **सीधे उच्चतम न्यायालय (Supreme Court)** में दायर कर सकता है, न कि उच्च न्यायालय में। उच्च न्यायालयों के पास एनजीटी के आदेशों के विरुद्ध अपील सुनने का अधिकार क्षेत्र नहीं होता है।
Related Questions
→
भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 32' के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय की रिट अधिकारिता (Writ Jurisdiction) और 'सार्वजनिक हित याचिका' (PIL) के विकास के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत केवल मूल अधिकारों के प्रवर्तन के लिए ही रिट जारी की जा सकती है, और इस अनुच्छेद को संविधान का 'हृदय और आत्मा' कहा गया है, जिसे राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान भी किसी भी स्थिति में निलंबित नहीं किया जा सकता है।
2. 'लोकू एंड इंटरेस्ट लिटिगेशन' या सार्वजनिक हित याचिका (PIL) की अवधारणा को भारतीय न्यायशास्त्र में न्यायमूर्ति पी. एन. भगवती और न्यायमूर्ति वी. आर. कृष्णा अय्यर द्वारा 1980 के दशक की शुरुआत में स्थापित किया गया था, जिसके तहत 'लोकस स्टैंडी' (Locus Standi) के पारंपरिक नियम को शिथिल किया गया, जिससे किसी भी पीड़ित व्यक्ति के अलावा अन्य सार्वजनिक हितैषी व्यक्ति या संस्था द्वारा न्यायालय का दरवाजा खटखटाया जा सकता है।
3. अधिकार पृच्छा (Quo-Warranto) वह रिट है जो किसी सार्वजनिक पद पर अवैध रूप से कब्जा करने वाले व्यक्ति के खिलाफ जारी की जाती है, और इस रिट को प्राप्त करने के लिए याचिकाकर्ता के लिए यह साबित करना अनिवार्य होता है कि उस अवैध नियुक्ति से उसके स्वयं के किसी व्यक्तिगत विधिक या मौलिक अधिकार का हनन हुआ है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
→
भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग V' (संघ - अनुच्छेद 79 से 122) के अंतर्गत 'संसद की विधायी प्रक्रिया' (Legislative Procedure in Parliament) तथा धन विधेयकों (Money Bills) के प्रावधानों के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 110 के अनुसार कोई विधेयक 'धन विधेयक' तभी माना जाता है जब उसमें केवल कर लगाने, उगाहنے, परिहार करने, परिवर्तन करने या विनियमन करने से संबंधित उपबंध हों, और ऐसे विधेयक को संसद में प्रस्तुत करने के लिए राष्ट्रपति की पूर्व सिफ़ारिश (Prior Recommendation) अनिवार्य होती है, तथा इसे राज्यसभा में पुरःस्थापित नहीं किया जा सकता।
2. लोकसभा द्वारा पारित और राज्यसभा को भेजे गए किसी धन विधेयक के संबंध में राज्यसभा के पास यह शक्ति होती है कि वह उसमें संशोधन कर सकती है या उसे अधिकतम चौदह दिनों की अवधि के लिए रोक सकती है, और यदि राज्यसभा चौदह दिनों के भीतर विधेयक को वापस नहीं करती है, तो उसे दोनों सदनों द्वारा उसी रूप में पारित मान लिया जाता है जिस रूप में उसे लोकसभा ने पारित किया था।
3. यदि किसी विधेयक के धन विधेयक होने या न होने को लेकर कोई संवैधानिक प्रश्न या विवाद उत्पन्न होता है, तो इस पर अंतिम निर्णय लेने की संप्रभु शक्ति भारत के राष्ट्रपति के पास निहित होती है, और राष्ट्रपति का यह निर्णय किसी भी न्यायालय में चुनौती देने योग्य नहीं होता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
→
भारतीय अर्थव्यवस्था और लोक वित्त के संदर्भ में, 'भारतीय रिजर्व बैंक' (RBI) की मौद्रिक नीति समिति (MPC) और उसके विधिक प्रावधानों तथा कार्यप्रणाली के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. मौद्रिक नीति समिति (MPC) का गठन भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 के प्रावधानों के तहत किया गया है, और यह देश में नीतिगत ब्याज दर (Repo Rate) निर्धारित करने के लिए एक वैधानिक तथा संस्थागत ढांचा प्रदान करती है।
2. इस समिति में कुल छह सदस्य होते हैं, जिनमें से तीन सदस्य RBI के अधिकारी (Governor सहित) होते हैं और शेष तीन सदस्यों की नियुक्ति केंद्र सरकार द्वारा की जाती है, तथा गतिरोध की स्थिति में RBI गवर्नर के पास निर्णायक मत (Casting Vote) का अधिकार होता है।
3. MPC द्वारा निर्धारित मुद्रास्फीति लक्ष्य (Inflation Target) को केंद्र सरकार के परामर्श से प्रत्येक पाँच वर्ष में एक बार तय किया जाता है, और वर्तमान में यह लक्ष्य केंद्रीय बैंक के लिए +/- 2% की सहिष्णुता बैंड (Tolerance Band) के साथ 4 प्रतिशत निर्धारित किया गया है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
→
भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 324' के अंतर्गत 'भारत के निर्वाचन आयोग' (Election Commission of India) की संवैधानिक स्थिति, शक्तियों और इसके सदस्यों की नियुक्ति तथा निष्कासन के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 324 के अनुसार, निर्वाचन आयोग एक अखिल भारतीय निकाय है जो संसद, राज्य विधानमंडलों, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के पदों के लिए चुनावों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण का संचालन करता है, तथा मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) को उसके पद से हटाने की प्रक्रिया और आधार ठीक उसी प्रकार निर्धारित हैं जैसे कि सर्वोच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीश के लिए महाभियोग (Impeachment) की प्रक्रिया होती है।
2. 'टी. एन. शेषन बनाम भारत संघ' और अन्य ऐतिहासिक मामलों में सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया है कि यदि संविधान या संसद द्वारा बनाए गए किसी कानून में किसी विषय पर स्पष्ट प्रावधान उपलब्ध नहीं है, तो अनुच्छेद 324 के अंतर्गत निर्वाचन आयोग को स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए अपनी 'अशेष या अवशिष्ट शक्तियों' (Plenary/Residual Powers) का प्रयोग करने का पूर्ण संवैधानिक अधिकार प्राप्त है।
3. 'अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ (2023)' मामले में सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने यह ऐतिहासिक निर्णय दिया कि जब तक संसद इस विषय पर कोई नया विधायी कानून नहीं बनाती, तब तक मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता (या सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता) और भारत के मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice of India) की एक उच्च-स्तरीय चयन समिति की सलाह पर ही की जाएगी।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
→
भारत के महान्यायवादी (Attorney General) का पद संविधान के किस अनुच्छेद में है?
Log in
to add to quiz, bookmark, or report issues.