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भारतीय इतिहास और राष्ट्रीय आंदोलन के संदर्भ में, वर्ष 1928 में प्रस्तुत 'नेहरू रिपोर्ट' (Nehru Report) और उससे संबंधित राजनीतिक विकास के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में गठित सर्वदलीय समिति द्वारा प्रस्तुत 'नेहरू रिपोर्ट' में भारत के लिए एक नए डोमिनियन स्टेटस (Dominion Status) के संविधान की वकालत की गई थी, और इसमें भारत के लिए एक उत्तरदायी सरकार की रूपरेखा तैयार की गई थी।
- 2. इस रिपोर्ट में पहली बार भाषाई आधार पर प्रांतों के गठन, मौलिक अधिकारों (Fundamental Rights) और व्यस्क मताधिकार (Universal Adult Suffrage) की स्पष्ट रूप से सिफारिश की गई थी।
- 3. जिन्ना द्वारा प्रस्तुत 'चौदह सूत्रीय मांगें' (Fourteen Points) को नेहरू रिपोर्ट में पूर्ण रूप से स्वीकार कर लिया गया था, जिसके परिणाम स्वरूप मुस्लिम लीग ने इस रिपोर्ट का पूर्ण समर्थन किया और कांग्रेस के साथ मिलकर सविनय अवज्ञा आंदोलन की रूपरेखा तैयार की।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: दिसंबर 1927 के मद्रास कांग्रेस अधिवेशन में सर्वदलीय सम्मेलन बुलाकर देश के लिए एक संविधान का मसौदा तैयार करने का निर्णय लिया गया था, जिसके तहत मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया। इस रिपोर्ट ने ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर भारत के लिए 'डोमिनियन स्टेटस' (औपनिवेशिक स्वराज्य) की मांग की थी।
कथन 2 सही है: नेहरू रिपोर्ट में भारत के भावी संविधान के लिए कई दूरदर्शी प्रावधान शामिल किए गए थे, जिसमें मौलिक अधिकारों की सूची, व्यस्क मताधिकार, और भाषाई आधार पर प्रांतों के पुनर्गठन की मांग प्रमुख थी।
कथन 3 गलत है: मुहम्मद अली जिन्ना ने नेहरू रिपोर्ट में मुसलमानों के लिए अलग निर्वाचन मंडलों (Separate Electorates) और अवशिष्ट शक्तियों (Residuary Powers) को प्रांतों में निहित करने जैसी कुछ मांगें रखी थीं, जिन्हें नेहरू रिपोर्ट ने अस्वीकार कर दिया था। इसके प्रतिक्रियास्वरूप जिन्ना ने बाद में अपनी 'चौदह सूत्रीय मांगें' (14 Points) प्रस्तुत कीं, और मुस्लिम लीग ने नेहरू रिपोर्ट का बहिष्कार किया था।
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग V' के अंतर्गत 'भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक' (Comptroller and Auditor General of India - CAG) से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 148 के अनुसार भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा अपने हस्ताक्षर और मुद्रा सहित वारंट द्वारा की जाती है, और उसे उसके पद से उसी रीति से और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है जिस रीति से और जिन आधारों पर उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है।
2. नियंत्रक-महालेखापरीक्षक भारत की संचित निधि तथा प्रत्येक राज्य और संघ राज्य क्षेत्र, जहाँ विधानसभा है, की संचित निधि से होने वाले सभी खर्चों की लेखापरीक्षा करता है, किंतु वह केंद्र सरकार या राज्य सरकारों के सार्वजनिक उपक्रमों (Public Sector Undertakings) और सरकारी कंपनियों की लेखापरीक्षा करने का कोई सांविधिक अधिकार नहीं रखता है, क्योंकि यह अधिकार पूरी तरह से निजी लेखा परीक्षकों (Chartered Accountants) के पास होता है।
3. CAG अपनी लेखापरीक्षा रिपोर्टों को राष्ट्रपति को प्रस्तुत करता है, जिन्हें राष्ट्रपति द्वारा संसद के दोनों सदनों के पटल पर रखवाया जाता है, तथा लोक लेखा समिति (Public Accounts Committee) इन रिपोर्टों की विस्तार से जाँच करती है और CAG संसद के एक मित्र, दार्शनिक और मार्गदर्शक के रूप में इस समिति की बैठकों में सहायता करता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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रेगुलेटिंग एक्ट 1773 के तहत कलकत्ता में सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना किस वर्ष हुई थी?
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भारतीय और विश्व भूगोल के संदर्भ में, 'एल नीनो सदर्न ऑसिलेशन' (ENSO) के 'ला नीना' (La Niña) चरण और इसके भारतीय मानसून पर पड़ने वाले प्रभावों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. ला नीना की स्थिति के दौरान, भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के केंद्रीय और पूर्वी भागों में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से अधिक हो जाता है, जिससे पूर्वी हवाएं (Trade Winds) अत्यधिक कमजोर हो जाती हैं।
2. ला नीना के प्रभावस्वरूप भारतीय उपमहाद्वीप पर मानसूनी हवाओं का संचरण मजबूत होता है, जिससे सामान्यतः देश के अधिकांश हिस्सों में औसत से अधिक वर्षा (Above-normal rainfall) दर्ज की जाती है।
3. यद्यपि ला नीना भारतीय कृषि और जल संसाधन के लिए आमतौर पर अनुकूल माना जाता है, तथापि यह उत्तर-पश्चिम भारत और प्रायद्वीपीय क्षेत्रों के कुछ हिस्सों में अत्यधिक बाढ़ और भूस्खलन जैसी आपदाओं के जोखिम को भी बढ़ा सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग IX-B' के अंतर्गत 'सहकारी समितियाँ' (Co-operative Societies - अनुच्छेद 243-ZH से 243-ZT) तथा '97वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2011' के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. 97वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2011 द्वारा संविधान के भाग III में मूल अधिकारों के अंतर्गत अनुच्छेद 19(1)(c) में संशोधन करके 'सहकारी समितियाँ बनाने का अधिकार' (Right to form co-operative societies) को एक मौलिक अधिकार के रूप में जोड़ा गया।
2. संविधान के भाग IV में राज्य के नीति निर्देशक तत्वों के अंतर्गत एक नया अनुच्छेद 43B जोड़ा गया, जिसके अनुसार राज्य सहकारी समितियों के स्वैच्छिक गठन, स्वायत्त कामकाज, लोकतांत्रिक नियंत्रण और पेशेवर प्रबंधन को बढ़ावा देने का प्रयास करेगा।
3. संविधान के भाग IX-B के प्रावधानों के अनुसार, किसी सहकारी समिति के निदेशक बोर्ड में अधिकतम सदस्यों की संख्या 25 से अधिक नहीं हो सकती है, तथा इस बोर्ड में अनुसूचित जातियों या अनुसूचित जनजातियों के लिए एक सीट और महिलाओं के लिए दो सीटें आरक्षित होना अनिवार्य किया गया है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 32' के अंतर्गत प्रदत्त 'संवैधानिक उपचारों के अधिकार' (Right to Constitutional Remedies) और रिट अधिकारक्षेत्र (Writ Jurisdiction) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत केवल मूल अधिकारों के प्रवर्तन के लिए ही उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया जा सकता है, और डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने इसी अनुच्छेद को 'संविधान का हृदय और आत्मा' (Heart and Soul of the Constitution) कहा था।
2. 'बंदी प्रत्यक्षीकरण' (Habeas Corpus) रिट का शाब्दिक अर्थ 'कोशिश करना या प्रस्तुत करना' है, जिसे केवल सार्वजनिक प्राधिकरण (Public Authority) के विरुद्ध जारी किया जा सकता है, और यह निजी व्यक्तियों (Private Individuals) के अवैध निरोध के खिलाफ कभी भी जारी नहीं की जा सकती है।
3. 'उत्प्रेषण' (Certiorari) और 'प्रतिषेध' (Prohibition) दोनों ही रिटें न्याययिक और अर्द्ध-न्यायिक प्राधिकरणों के विरुद्ध जारी की जाती हैं, जहाँ प्रतिषेध मुख्य रूप से एक निवारक (Preventive) उपाय है जो निचली अदालत को अपनी अधिकारिता से बाहर जाने से रोकता है, जबकि उत्प्रेषण निवारक के साथ-साथ उपचारात्मक (Curative) दोनों प्रकृति की होती है जो लंबित मामले के निर्णय को रद्द करने के लिए जारी की जाती है।
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