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भारतीय अर्थव्यवस्था एवं सतत विकास के संदर्भ में, 'बहुआयामी गरीबी सूचकांक' (Multidimensional Poverty Index - MPI) और भारत में गरीबी आकलन के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. वैश्विक बहुआयामी गरीबी सूचकांक (Global MPI) संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) और ऑक्सफोर्ड गरीबी एवं मानव विकास पहल (OPHI) द्वारा संयुक्त रूप से जारी किया जाता है, जो केवल प्रति व्यक्ति आय को आधार बनाकर गरीबी का आकलन करता है।
- 2. नीति आयोग द्वारा हाल ही में जारी राष्ट्रीय बहुआयामी गरीबी सूचकांक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में MPI का आकलन स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन स्तर जैसे तीन समान रूप से भारित आयामों के अंतर्गत दस संकेतकों के आधार पर किया जाता है।
- 3. भारत में गरीबी रेखा के निर्धारण के संबंध में पूर्व में गठित 'सुरेश तेंदुलकर समिति' और 'सी. रंगराजन समिति' दोनों ने ही मासिक प्रति व्यक्ति उपभोग व्यय (MPCE) को गरीबी आकलन का प्रमुख आधार बनाया था, किंतु रंगराजन समिति ने तेंदुलकर समिति की तुलना में ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के लिए उपभोग व्यय की सीमा (Threshold) को अधिक निर्धारित किया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 गलत है क्योंकि वैश्विक बहुआयामी गरीबी सूचकांक (Global MPI) केवल प्रति व्यक्ति आय (Monetary income) को आधार नहीं बनाता है, बल्कि यह स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन स्तर जैसे गैर-मौद्रिक और बहुआयामी संकेतकों (Indicators) का उपयोग करके गरीबी का आकलन करता है। कथन 2 सही है; नीति आयोग द्वारा जारी राष्ट्रीय MPI रिपोर्ट में स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन स्तर के 3 मुख्य आयामों और 10 संकेतकों का उपयोग किया जाता है। कथन 3 सही है; सुरेश तेंदुलकर समिति (2009) और सी. रंगराजन समिति (2012) दोनों ने ही मासिक प्रति व्यक्ति उपभोग व्यय (MPCE) को गरीबी रेखा मापने का आधार बनाया था, और रंगराजन समिति ने तेंदुलकर समिति की तुलना में गरीबी रेखा के लिए अधिक उपभोग व्यय सीमा (प्रति व्यक्ति प्रतिदिन ग्रामीण क्षेत्र में ₹32 और शहरी क्षेत्र में ₹47) निर्धारित की थी, जिससे देश में गरीबों का प्रतिशत अधिक आंका गया था।
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 32' (संवैधानिक उपचारों का अधिकार) और उच्च न्यायालयों की 'अनुच्छेद 226' के तहत प्राप्त रिट अधिकारक्षेत्र (Writ Jurisdiction) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. अनुच्छेद 32 के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय केवल मूल अधिकारों के प्रवर्तन के लिए ही रिट जारी कर सकता है, जबकि उच्च न्यायालयों को अनुच्छेद 226 के तहत न केवल मूल अधिकारों के प्रवर्तन के लिए, बल्कि 'किसी अन्य प्रयोजन' (जैसे कि साधारण विधिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए) के लिए भी रिट जारी करने की व्यापक शक्ति प्राप्त है।
2. सर्वोच्च न्यायालय का अनुच्छेद 32 के अंतर्गत रिट अधिकारक्षेत्र 'मूल अधिकार' (Fundamental Right) का हिस्सा है और इसे किसी भी परिस्थिति में, राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान भी, निलंबित नहीं किया जा सकता है।
3. क्षेत्रीय अधिकारक्षेत्र (Territorial Jurisdiction) के मामले में, अनुच्छेद 226 के तहत किसी उच्च न्यायालय की रिट अधिकारिता उस राज्य के प्रादेशिक क्षेत्र तक ही सीमित होती है, सिवाय उस स्थिति के जब वह प्राधिकारी या सरकार उस उच्च न्यायालय के क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र के भीतर स्थित हो।
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग XVIII' (आपात उपबंध - अनुच्छेद 352 से 360) के अंतर्गत 'राष्ट्रीय आपातकाल' (National Emergency) से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 352 के अनुसार, राष्ट्रपति संपूर्ण भारत या उसके किसी भाग में राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा कर सकता है, जब युद्ध, बाह्य आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह (Armed Rebellion) के कारण भारत की सुरक्षा को गंभीर खतरा उत्पन्न हो, तथा मूल संविधान में 'सशस्त्र विद्रोह' शब्द के स्थान पर 'आंतरिक अशांति' (Internal Disturbance) शब्द का प्रयोग किया गया था जिसे 44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 द्वारा बदला गया था।
2. राष्ट्रीय आपातकाल की उद्घोषणा या उसके जारी रखने के प्रत्येक प्रस्ताव को संसद के दोनों सदनों द्वारा उद्घोषणा की तिथि से एक महीने के भीतर विशेष बहुमत (अर्थात सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत तथा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का कम से कम दो-तिहाई बहुमत) द्वारा अनुमोदित किया जाना अनिवार्य है।
3. राष्ट्रीय आपातकाल की उद्घोषणा के दौरान, संविधान के अनुच्छेद 19 द्वारा प्रदत्त मूल अधिकार स्वतः निलंबित हो जाते हैं, और इसके लिए किसी पृथक राष्ट्रपति के आदेश की आवश्यकता नहीं होती है, बशर्ते आपातकाल युद्ध या बाह्य आक्रमण के आधार पर लगाया गया हो, न कि सशस्त्र विद्रोह के आधार पर।
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग XI' (केंद्र-राज्य विधायी संबंध - अनुच्छेद 245 से 255) के अंतर्गत विधायी शक्तियों के वितरण से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 245 के अनुसार संसद को भारत के संपूर्ण राज्यक्षेत्र या उसके किसी भाग के लिए कानून बनाने की शक्ति प्राप्त है, और किसी राज्य के विधानमंडल को पूरे राज्य या उसके किसी भाग के लिए कानून बनाने की शक्ति है, किंतु संसद द्वारा बनाया गया कोई भी कानून इस आधार पर अमान्य नहीं ठहराया जा सकता है कि उसका बहिर्क्षेत्रीय प्रवर्तन (Extraterritorial operation) होता है।
2. संविधान की सातवीं अनुसूची की 'समवर्ती सूची' (Concurrent List) के अंतर्गत संसद और राज्य विधानमंडल दोनों को कानून बनाने की शक्ति प्राप्त है, और यदि किसी समवर्ती विषय पर राज्य विधानमंडल द्वारा बनाया गया कानून संसद द्वारा बनाए गए पहले से विद्यमान कानून के प्रतिकूल या असंगत होता है, तो संसद का कानून मान्य होगा और राज्य का कानून उस हद तक शून्य हो जाएगा, भले ही राज्य का कानून राष्ट्रपति की अनुमति के लिए आरक्षित रखा गया हो और उसे राष्ट्रपति की सहमति प्राप्त हो चुकी हो।
3. संविधान के अनुच्छेद 249 के अंतर्गत यदि राज्यसभा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई (2/3) बहुमत से यह संकल्प पारित कर दे कि राष्ट्रीय हित में यह आवश्यक या expedient है कि संसद राज्य सूची में शामिल किसी विषय पर कानून बनाए, तो संसद को उस विषय पर पूरे देश या उसके किसी भाग के लिए कानून बनाने की शक्ति मिल जाती है, और ऐसा संकल्प अधिकतम एक वर्ष की अवधि के लिए प्रवृत्त रहता है, हालांकि इसे हर बार एक वर्ष के लिए और आगे बढ़ाया जा सकता है।
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