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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 32' (Article 32) के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय की रिट अधिकारिता (Writ Jurisdiction) और 'सार्वजनिक हित याचिका' (PIL) के विकास के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सर्वोच्च न्यायालय को केवल मूल अधिकारों के प्रवर्तन के लिए ही रिट जारी करने की शक्ति प्राप्त है, जबकि उच्च न्यायालयों को अनुच्छेद 226 के तहत मूल अधिकारों के साथ-साथ अन्य कानूनी अधिकारों (Legal Rights) के प्रवर्तन के लिए भी रिट जारी करने की व्यापक शक्ति प्राप्त है।
  2. 2. 'लोकू हित वाद' या 'सार्वजनिक हित याचिका' (PIL) की अवधारणा को भारतीय न्यायशास्त्र में न्यायमूर्ति पी.एन. भगवती और न्यायमूर्ति वी.आर. कृष्ण अय्यर द्वारा 1980 के दशक के शुरुआती वर्षों में विकसित किया गया था, जिसके तहत 'लोकस स्टैंडी' (Locus Standi - वाद लाने का अधिकार) के पारंपरिक नियम को शिथिल किया गया ताकि समाज के वंचित और पीड़ित वर्गों की ओर से कोई भी सार्वजनिक हितैषी व्यक्ति या संस्था अदालत का दरवाजा खटखटा सके।
  3. 3. सर्वोच्च न्यायालय ने 'कुचला कलिया पेरुमल बनाम महाराष्ट्र राज्य' और अन्य ऐतिहासिक निर्णयों में यह व्यवस्था दी है कि अनुच्छेद 32 स्वयं भारतीय संविधान के मूल ढांचा (Basic Structure) का एक अभिन्न अंग है, और इसलिए संसद द्वारा भी अनुच्छेद 32 के अंतर्गत प्राप्त संवैधानिक उपचारों के अधिकार को संविधान संशोधन के माध्यम से भी छीना या समाप्त नहीं किया जा सकता है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 सही है: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 32 के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय केवल मूल अधिकारों (Fundamental Rights) के प्रवर्तन के लिए ही रिट जारी कर सकता है, क्योंकि मूल अधिकारों का हनन होना अनुच्छेद 32 के तहत सर्वोच्च न्यायालय जाने की शर्त है। इसके विपरीत, अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालयों (High Courts) की रिट अधिकारिता अधिक व्यापक है, क्योंकि वे मूल अधिकारों के साथ-साथ किसी अन्य कानूनी या सामान्य अधिकारों के प्रवर्तन के लिए भी रिट जारी कर सकते हैं। कथन 2 सही है: 1980 के दशक के शुरुआती वर्षों में न्यायमूर्ति पी.एन. भगवती और न्यायमूर्ति वी.आर. कृष्ण अय्यर के प्रयासों से भारत में 'सार्वजनिक हित याचिका' (PIL) की शुरुआत हुई। इसके तहत 'लोकस स्टैंडी' (Locus Standi) के पारंपरिक नियम में ढील दी गई, जिसका अर्थ है कि अब पीड़ित व्यक्ति स्वयं के अलावा समाज का कोई भी अन्य जागरूक नागरिक या सामाजिक संस्था उस पीड़ित वर्ग की ओर से अदालत में याचिका दायर कर सकती है। कथन 3 गलत है: 'कुचला कलिया पेरुमल' जैसा कोई प्रामाणिक ऐतिहासिक निर्णय इस संदर्भ में नहीं है। हालांकि यह सत्य है कि सर्वोच्च न्यायालय ने (जैसे 'L. Chandra Kumar case' या 'Kesavananda Bharati case' आदि में) यह माना है कि न्यायिक समीक्षा और अनुच्छेद 32 संविधान का मूल ढांचा (Basic Structure) हैं, किंतु दिए गए कथन में उल्लिखित वाद का नाम तथ्यात्मक रूप से भ्रामक और गलत है। अतः केवल कथन 1 और 2 सही हैं।
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