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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग XV' (निर्वाचन - अनुच्छेद 324 से 329-क) तथा निर्वाचन आयोग से संबंधित प्रावधानों के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 324 के अनुसार निर्वाचन आयोग एक बहु-सदस्यीय निकाय के रूप में मूल रूप से वर्ष 1950 में ही स्थापित किया गया था, जिसमें एक मुख्य निर्वाचन आयुक्त और दो अन्य निर्वाचन आयुक्त शामिल थे।
- 2. मुख्य निर्वाचन आयुक्त को उसके पद से उसी रीति से और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है जिस रीति से और जिन आधारों पर सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है, जबकि अन्य निर्वाचन आयुक्तों को मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सिफारिश के बिना राष्ट्रपति द्वारा नहीं हटाया जा सकता है।
- 3. निर्वाचन आयोग को संसद और राज्य विधानमंडलों के चुनावों के संचालन के लिए राष्ट्रपति या राज्यपाल द्वारा आवश्यक प्रशासनिक कर्मचारियों की उपलब्धता सुनिश्चित करने का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 असत्य है: मूल संविधान में वर्ष 1950 में निर्वाचन आयोग केवल एक एकल-सदस्यीय निकाय (Chief Election Commissioner) था। इसे पहली बार 16 अक्टूबर 1989 को बहु-सदस्यीय बनाया गया था। कथन 2 सत्य है: मुख्य निर्वाचन आयुक्त को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने की प्रक्रिया (संसद के दोनों सदनों द्वारा विशेष बहुमत से पारित महाभियोग जैसे प्रस्ताव) के अनुसार ही हटाया जा सकता है। अन्य निर्वाचन आयुक्तों को मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सिफारिश पर ही राष्ट्रपति द्वारा हटाया जा सकता है। कथन 3 सत्य है: अनुच्छेद 324(6) के अनुसार, राष्ट्रपति या किसी राज्य का राज्यपाल, निर्वाचन आयोग को उसके कृत्यों के निर्वहन के लिए आवश्यक कर्मचारी उपलब्ध कराने के लिए बाध्य हैं।
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भारतीय इतिहास और कला एवं संस्कृति के संदर्भ में, मुगल कालीन प्रशासनिक व्यवस्था, भू-राजस्व प्रणालियों तथा मनसबदारी व्यवस्था के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. मुगल प्रशासनिक व्यवस्था में 'जात' और 'सवार' पद मनसबदारी व्यवस्था के अभिन्न अंग थे, जहाँ 'जात' मनसबदार के व्यक्तिगत वेतन और उसकी पदानुक्रमित स्थिति (Rank) को निर्धारित करता था, जबकि 'सवार' पद उसे अपने अधीन रखने वाले घोड़ों और घुड़सवार सैनिकों की संख्या को दर्शाता था।
2. राजा टोडरमल द्वारा प्रारंभ की गई 'दहसाला व्यवस्था' (Zabt System) के अंतर्गत पिछले दस वर्षों के दौरान विभिन्न फसलों के औसत उत्पादन और उनके औसत प्रचलित बाजार मूल्यों का विश्लेषण करके राजस्व का निर्धारण किया जाता था, और यह प्रणाली मुख्य रूप से बंगाल और उड़ीसा के संपूर्ण क्षेत्रों में कड़ाई से लागू की गई थी।
3. मुगलकालीन राजस्व व्यवस्था में 'पलाज' वह भूमि होती थी जिस पर वर्ष में लगातार दो बार फसलें उगाई जाती थीं और उसे कभी भी खाली (परती) नहीं छोड़ा जाता था, जबकि 'बंजर' वह उपजाऊ भूमि थी जिस पर पाँच या उससे अधिक वर्षों तक खेती नहीं की जाती थी।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग V' (संघ - अनुच्छेद 52 से 151) के अंतर्गत 'भारत के महान्यायवादी' (Attorney General for India - AG) से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 76 के अनुसार, भारत के महान्यायवादी की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है, और वह व्यक्ति इस पद पर नियुक्त होने के लिए अर्ह होगा जो उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त होने के लिए योग्य हो, अथवा राष्ट्रपति की दृष्टि में एक प्रख्यात विधिवेत्ता हो।
2. महान्यायवादी को भारत के सभी न्यायालयों में सुनवाई का अधिकार प्राप्त है, तथा संसद के दोनों सदनों या उनकी संयुक्त बैठकों में बोलने और भाग लेने का अधिकार भी है, किंतु उसे संसद में किसी भी प्रश्न पर मतदान करने का अधिकार प्राप्त नहीं होता है।
3. महान्यायवादी भारत सरकार का मुख्य कानूनी सलाहकार होता है, और वह एक पूर्णकालिक (Full-time) सरकारी कर्मचारी होता है, जिसके लिए यह सांविधिक रूप से अनिवार्य किया गया है कि वह अपने कार्यकाल के दौरान किसी भी निजी मुकदमे या प्रैक्टिस में वकालत नहीं कर सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 143' के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय के 'सलाहकार क्षेत्राधिकार' (Advisory Jurisdiction) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राष्ट्रपति विधि या तथ्य के किसी ऐसे व्यापक सार्वजनिक महत्व के प्रश्न पर, जिस पर सर्वोच्च न्यायालय की राय प्राप्त करना expedient (समीचीन) प्रतीत हो, सर्वोच्च न्यायालय से परामर्श मांग सकता है, और इस प्रकार के परामर्श को देने के लिए सर्वोच्च न्यायालय बाध्य है।
2. यदि राष्ट्रपति द्वारा संविधान-पूर्व किसी संधि, समझौते, प्रसंविदा, सनद या अन्य ऐसी ही प्रवृत्तियों से उत्पन्न किसी विवाद पर परामर्श मांगा जाता है, तो सर्वोच्च न्यायालय के लिए अपनी राय देना संवैधानिक रूप से अनिवार्य (Mandatory) है।
3. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सलाहकार क्षेत्राधिकार के अंतर्गत दी गई राय या सलाह राष्ट्रपति के लिए किसी भी परिस्थिति में बाध्यकारी (Binding) नहीं होती है, और न ही यह निर्णय न्यायिक दृष्टांत (Judicial Precedent) के रूप में अन्य न्यायालयों पर लागू होती है।
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भारतीय इतिहास और स्वतंत्रता आंदोलन के संदर्भ में, वर्ष 1930 के 'सविनय अवज्ञा आंदोलन' (Civil Disobedience Movement) और उससे जुड़े घटनाक्रमों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत महात्मा गांधी द्वारा प्रसिद्ध 'दांडी मार्च' (Salt March) के साथ की गई थी, जिसके तहत साबरमती आश्रम से दांडी तक की 240 मील की यात्रा कर 6 अप्रैल 1930 को सांकेतिक रूप से नमक कानून तोड़ा गया, तथा इस दौरान चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने तमिलनाडु में वेदारण्यम नमक सत्याग्रह का नेतृत्व किया था।
2. इस आंदोलन के दौरान देश के विभिन्न हिस्सों में अलग-अलग रूपों में प्रतिरोध देखा गया, जिसके तहत उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत में खान अब्दुल गफ्फार खान के नेतृत्व में 'खुदाई खिदमतगार' (Khudai Khidmatgar) नामक संगठन ने सक्रिय भूमिका निभाई, जिन्हें 'लाल कुर्ती' (Red Shirts) आंदोलन के नाम से भी जाना जाता है।
3. सविनय अवज्ञा आंदोलन के प्रथम चरण के दौरान ही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने लार्ड इरविन के साथ हुए 'गांधी-इरविन समझौते' (Gandhi-Irwin Pact) के तहत वर्ष 1931 में लंदन में आयोजित होने वाले तीनों (प्रथम, द्वितीय और तृतीय) गोलमेज सम्मेलनों में भाग लेने की सैद्धांतिक सहमति दी थी और कांग्रेस के प्रतिनिधि के रूप में महात्मा गांधी ने सभी सम्मेलनों में व्यक्तिगत रूप से भाग लिया था।
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