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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 359' के अंतर्गत आपातकाल के दौरान भाग III द्वारा प्रदत्त अधिकारों के निलंबन और इसके न्यायिक आयामों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा के दौरान, राष्ट्रपति को यह अधिकार प्राप्त है कि वह आदेश द्वारा अनुच्छेद 359 के तहत भाग III (मौलिक अधिकार) द्वारा प्रदत्त किसी भी अधिकार के प्रवर्तन के लिए किसी भी न्यायालय में जाने के अधिकार को निलंबित कर सकता है, किंतु इसमें अनुच्छेद 20 और 21 द्वारा प्रदत्त अधिकारों को निलंबित नहीं किया जा सकता है।
  2. 2. अनुच्छेद 359 के अधीन राष्ट्रपति द्वारा जारी किया गया कोई भी निलंबन आदेश पूरे भारत में या उसके किसी भाग में प्रवर्तनीय हो सकता है, और ऐसे आदेश को संसद के दोनों सदनों के समक्ष उसकी स्वीकृति के लिए रखना अनिवार्य होता है।
  3. 3. ऐतिहासिक 'ए.डी.एम. जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ला (1976)' (हेबियस कॉर्पस मामला) में सर्वोच्च न्यायालय के बहुमत के निर्णय को बाद में 'पुट्टास्वामी वाद (2017)' और अन्य विधายनों द्वारा खारिज कर दिया गया, जिसमें यह स्थापित किया गया कि आपातकाल के दौरान भी अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार अत्यंत महत्वपूर्ण है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 सही है: 44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 के बाद से अनुच्छेद 359 के तहत राष्ट्रपति को यह शक्ति है कि वह राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान अनुच्छेद 20 (अपराधों के लिए दोषसिद्धि के संबंध में संरक्षण) और अनुच्छेद 21 (प्राण और दैहिक स्वतंत्रता) को छोड़कर अन्य मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन को निलंबित कर सकता है। कथन 2 गलत है: अनुच्छेद 359 के अधीन राष्ट्रपति द्वारा जारी किए गए आदेश को संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष रखना आवश्यक होता है, लेकिन इसके लिए संविधान में ऐसी कोई अनिवार्य पूर्व-स्वीकृति (prior approval) या समयासीमा का कड़ा प्रावधान नहीं है जैसा कि आपातकाल की घोषणा (अनुच्छेद 352) के अनुमोदन के लिए आवश्यक होता है। इसके अलावा, यह आदेश पूरे भारत या उसके किसी भाग तक सीमित हो सकता है। कथन 3 सही है: ऐतिहासिक 'ए.डी.एम. जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ला (1976)' मामले में सर्वोच्च न्यायालय के उस कुख्यात निर्णय को जिसमें आपातकाल के दौरान अनुच्छेद 21 के निलंबन को सही ठहराया गया था, बाद में न्यायमूर्ति के.एस. पुट्टास्वामी (सेवानिवृत्त) बनाम भारत संघ (2017) के निर्णय तथा अन्य विधायी संशोधनों द्वारा वस्तुतः पलट दिया गया और यह स्पष्ट किया गया कि गरिमा और स्वतंत्रता का अधिकार आपातकाल में भी पूरी तरह मनमाने ढंग से छीना नहीं जा सकता।
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