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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 21' के अंतर्गत 'निजता के अधिकार' (Right to Privacy) और इसके व्यापक न्यायिक अर्थघटन के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त 'प्राण और दैहिक स्वतंत्रता के संरक्षण' के दायरे में निजता के अधिकार को एक मौलिक अधिकार के रूप में 'के.एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ (2017)' मामले में उच्चतम न्यायालय की नौ-न्यायाधीशों की संविधान पीठ द्वारा सर्वसम्मति से मान्यता दी गई थी।
- 2. पुट्टस्वामी निर्णय से पहले, सर्वोच्च न्यायालय ने अपने ऐतिहासिक निर्णयों जैसे 'एम.पी. शर्मा मामला (1954)' और 'खड़क सिंह मामला (1962)' में यह स्पष्ट रूप से प्रतिपादित किया था कि भारतीय संविधान में निजता का एक स्वतंत्र और स्पष्ट मौलिक अधिकार निहित है।
- 3. न्यायालय द्वारा यह भी निर्धारित किया गया है कि निजता का अधिकार एक पूर्ण (Absolute) अधिकार नहीं है, और इस पर राज्य द्वारा तभी प्रतिबंध लगाया जा सकता है जब यह तीन सूत्रीय परीक्षण—वैधानिकता (Legality), आनुपातिकता (Proportionality) और वैध राज्य उद्देश्य (Legitimate State Aim)—को संतुष्ट करता हो।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: 'के.एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ (2017)' मामले में उच्चतम न्यायालय की नौ-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से यह निर्णय दिया था कि निजता का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का एक अंतर्निहित और अभिन्न हिस्सा है। कथन 2 गलत है: 'एम.पी. शर्मा (1954)' और 'खड़क सिंह (1962)' मामलों में शुरुआती पीठों ने यह राय दी थी कि संविधान में निजता का कोई स्पष्ट या स्वतंत्र मौलिक अधिकार नहीं है। पुट्टस्वामी मामले की नौ-न्यायाधीशों की पीठ ने ही अपने इन पुराने फैसलों को खारिज (overrule) किया था। कथन 3 सही है: न्यायालय ने यह स्पष्ट किया है कि निजता का अधिकार कोई पूर्ण (absolute) अधिकार नहीं है, बल्कि इस पर राष्ट्रीय सुरक्षा, अपराध की रोकथाम या सामाजिक कल्याण जैसे वैध उद्देश्यों के लिए विधिनुसार आनुपातिक प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं, बशर्ते वे 'वैधानिकता, आवश्यकता और आनुपातिकता' के तीन सूत्रीय मानदंडों को पूरा करते हों।
Related Questions
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भारतीय अर्थव्यवस्था और पर्यावरण के संदर्भ में, 'हरित BONDS' (Green Bonds) और भारत में इसके विनियामक ढांचे के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. हरित बॉन्ड (Green Bonds) एक ऐसा निश्चित आय वाला वित्तीय उपकरण है जिसका उपयोग विशेष रूप से जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी परियोजनाओं, जैसे कि नवीकरणीय ऊर्जा, ऊर्जा दक्षता और सतत कृषि के वित्तपोषण के लिए किया जाता है।
2. भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने भारत में हरित ऋण पत्रों (Green Debt Securities) के निर्गम और विनियमन को नियंत्रित करने के लिए 'SEBI (Debt Securities and Non-Convertible Redeemable Preference Shares) Regulations' के तहत व्यापक दिशा-निर्देश और प्रकटीकरण मानक निर्धारित किए हैं।
3. भारत सरकार द्वारा जारी किए गए सॉवरेन ग्रीन बॉन्ड (Sovereign Green Bonds) से प्राप्त होने वाले फंड को केंद्रीय बजट के समेकित निधि (Consolidated Fund of India) में जमा किया जाता है और इसका उपयोग देश के किसी भी विकासात्मक या रक्षा क्षेत्र के कार्य के लिए किया जा सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय अर्थव्यवस्था एवं सतत विकास के संदर्भ में, 'ग्लोबल वार्मिंग पोटेंशियल' (GWP) तथा विभिन्न ग्रीनहाउस गैसों (GHGs) के पर्यावरणीय प्रभावों के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. 'ग्लोबल वार्मिंग पोटेंशियल' (GWP) किसी विशिष्ट ग्रीनहाउस गैस की ऊष्मा-धारण क्षमता को कार्बन डाइऑक्साइड ($ ext{CO}_2$) के सापेक्ष एक निश्चित समय क्षितिज (सामान्यतः 100 वर्ष) में मापता है, जिसका अर्थ है कि $ ext{CO}_2$ का GWP मान हमेशा 1 होता है।
2. वायुमंडल में मीथेन ($ ext{CH}_4$) का GWP मान 100 वर्ष की अवधि में कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में काफी अधिक होता है, किंतु मीथेन का वायुमंडलीय जीवनकाल (Atmospheric Lifetime) $ ext{CO}_2$ की तुलना में बहुत कम (लगभग 12 वर्ष) होता है।
3. क्योटो प्रोटोकॉल और पेरिस समझौते के अंतर्गत विभिन्न देशों द्वारा अपने राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDCs) और उत्सर्जन रिपोर्टिंग में ग्रीनहाउस गैसों के प्रभावों को मानक रूप से मापने के लिए इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (IPCC) द्वारा अनुशंसित GWP मूल्यों का उपयोग किया जाता है, जिसमें नाइट्रस ऑक्साइड ($ ext{N}_2 ext{O}$) का GWP मान मीथेन से भी कम होता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग V' के अंतर्गत संसद की वित्तीय समितियों (Financial Committees) से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. प्राक्कलन समिति (Estimates Committee) संसद की सबसे बड़ी समिति है, जिसमें कुल 30 सदस्य होते हैं और इसके सभी सदस्य केवल लोकसभा से चुने जाते हैं, जबकि राज्यसभा का कोई भी सदस्य इस समिति में शामिल नहीं होता है।
2. लोक लेखा समिति (Public Accounts Committee - PAC) में कुल 22 सदस्य होते हैं, जिनमें 15 लोकसभा से और 7 राज्यसभा से होते हैं, तथा परंपरा के अनुसार इस समिति के अध्यक्ष की नियुक्ति लोकसभा अध्यक्ष द्वारा विपक्ष के सदस्यों में से ही की जाती है।
3. सार्वजनिक उपक्रम समिति (Committee on Public Undertakings) की स्थापना मूल संविधान में ही की गई थी, किंतु वर्ष 1964 में कृष्ण मेनन समिति की संस्तुति के बाद इसके स्वरूप में संशोधन किया गया, और इस समिति के प्रतिवेदन पर नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) द्वारा संसद में बहस कराई जाती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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संघ की कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित होगी, यह किस अनुच्छेद में वर्णित है?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 32' के अंतर्गत प्रदत्त 'संवैधानिक उपचारों के अधिकार' (Right to Constitutional Remedies) और रिट अधिकारक्षेत्र (Writ Jurisdiction) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत केवल मूल अधिकारों के प्रवर्तन के लिए ही उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया जा सकता है, और डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने इसी अनुच्छेद को 'संविधान का हृदय और आत्मा' (Heart and Soul of the Constitution) कहा था।
2. 'बंदी प्रत्यक्षीकरण' (Habeas Corpus) रिट का शाब्दिक अर्थ 'कोशिश करना या प्रस्तुत करना' है, जिसे केवल सार्वजनिक प्राधिकरण (Public Authority) के विरुद्ध जारी किया जा सकता है, और यह निजी व्यक्तियों (Private Individuals) के अवैध निरोध के खिलाफ कभी भी जारी नहीं की जा सकती है।
3. 'उत्प्रेषण' (Certiorari) और 'प्रतिषेध' (Prohibition) दोनों ही रिटें न्याययिक और अर्द्ध-न्यायिक प्राधिकरणों के विरुद्ध जारी की जाती हैं, जहाँ प्रतिषेध मुख्य रूप से एक निवारक (Preventive) उपाय है जो निचली अदालत को अपनी अधिकारिता से बाहर जाने से रोकता है, जबकि उत्प्रेषण निवारक के साथ-साथ उपचारात्मक (Curative) दोनों प्रकृति की होती है जो लंबित मामले के निर्णय को रद्द करने के लिए जारी की जाती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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