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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 161' के अंतर्गत राज्यपाल की 'क्षमादान की शक्ति' (Pardoning Power) तथा राष्ट्रपति की शक्ति के साथ इसकी तुलना के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. संविधान के अनुच्छेद 161 के तहत किसी राज्य के राज्यपाल को उस राज्य की कार्यकारी शक्ति के विस्तार वाले विषयों से संबंधित विधियों के विरुद्ध किसी अपराध के लिए दोषी ठहराए गए व्यक्ति के दंडादेश को क्षमा, प्रविलंबन, विराम या परिहार करने अथवा उसके निलंबन, परिहार या लघुकरण की शक्ति प्राप्त है।
  2. 2. राष्ट्रपति के विपरीत, राज्यपाल को किसी भी मामले में—चाहे वह मृत्युदंड (Death Sentence) का मामला हो या सैन्य न्यायालय (Court Martial) द्वारा दिया गया दंड—क्षमादान या मृत्युदंड को माफ करने की संवैधानिक शक्ति प्राप्त नहीं है, और मृत्युदंड के मामले में केवल भारत के राष्ट्रपति को ही अनुच्छेद 72 के तहत अनन्य क्षमादान शक्ति प्राप्त है।
  3. 3. 'महिपाल सिंह बनाम राजस्थान राज्य (2013)' और अन्य न्यायिक निर्णयों में उच्चतम न्यायालय ने यह स्पष्ट किया है कि राज्यपाल की क्षमादान शक्ति का प्रयोग राज्य मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह के अधीन ही किया जाता है, किंतु यदि राज्यपाल इस शक्ति का प्रयोग स्वविवेक से करते हैं, तो उनकी निर्णय प्रक्रिया न्यायिक समीक्षा के दायरे से पूर्णतः परे होती है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 सही है: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 161 के अनुसार, राज्य के राज्यपाल को उस राज्य की कार्यकारी शक्ति के विस्तार वाले मामलों (अर्थात राज्य सूची और समवर्ती सूची के विषयों से संबंधित राज्य कानूनों) के विरुद्ध दिए गए दंड को क्षमा, प्रविलंबन, विराम, परिहार, निलंबन या लघुकरण करने की शक्ति प्राप्त है। कथन 2 सही है: राष्ट्रपति (अनुच्छेद 72 के तहत) और राज्यपाल (अनुच्छेद 161 के तहत) की शक्तियों में दो मुख्य अंतर हैं: पहला, राज्यपाल को सैन्य न्यायालयों (Court Martial) द्वारा दिए गए दंड के मामलों में कोई क्षमादान शक्ति प्राप्त नहीं है, यह केवल राष्ट्रपति के पास है। दूसरा, राज्यपाल को मृत्युदंड (Death Sentence) को क्षमा करने की शक्ति प्राप्त नहीं है, भले ही वह राज्य विधि के अंतर्गत ही क्यों न दिया गया हो; मृत्युदंड को पूरी तरह से माफ करने का अधिकार एकमात्र राष्ट्रपति के पास है (हालाँकि राज्यपाल मृत्युदंड को अन्य दंडों में परिहार या लघुकरण कर सकते हैं, पर क्षमा नहीं)। कथन 3 गलत है: 'शमशेर सिंह बनाम पंजाब राज्य (1974)' और 'श्रीकांत चंद्रकांत आचार्य बनाम महाराष्ट्र राज्य' जैसे मामलों में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि राज्यपाल अपनी सभी शक्तियों का प्रयोग (क्षमादान सहित) राज्य मंत्रिपरिषद की सलाह के अनुसार ही करते हैं। इसके अतिरिक्त, राज्यपाल या राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति का प्रयोग यदि दुर्भावनापूर्ण (Malafide), असंगत या भेदभावपूर्ण पाया जाता है, तो वह 'न्यायिक समीक्षा' (Judicial Review) के दायरे में आता है, और न्यायालय इस शक्ति के दुरुपयोग को रद्द कर सकता है। अतः कथन 3 का यह भाग गलत है कि निर्णय न्यायिक समीक्षा से पूर्णतः परे है।
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