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फीफा विश्व कप 2026 की मेज़बानी कौन-से देश करेंगे?

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फीफा विश्व कप 2026 की मेज़बानी कनाडा, अमेरिका और मेक्सिको मिलकर करेंगे.
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 142' के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय की 'पूर्ण न्याय' (Complete Justice) प्रदान करने की शक्ति और इसके प्रयोग के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान का अनुच्छेद 142 उच्चतम न्यायालय को अपनी अधिकारिता का प्रयोग करते हुए कोई ऐसी डिक्री पारित करने या ऐसा आदेश देने की शक्ति देता है जो उसके समक्ष लंबित किसी वाद या विषय में 'पूर्ण न्याय' करने के लिए आवश्यक हो, और ऐसा प्रत्येक आदेश पूरे भारत में प्रवर्तनीय (Enforceable) होता है। 2. उच्चतम न्यायालय की अनुच्छेद 142 के तहत निहित यह शक्ति अत्यंत व्यापक है, जिसके कारण यह किसी भी मौजूदा संसदीय कानून या वैधानिक प्रावधान के स्पष्ट निषेध (Express Prohibition) को भी पूरी तरह से दरकिनार कर सकती है या उसे निष्प्रभावी बना सकती है। 3. ऐतिहासिक 'अयोध्ये राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद' विवाद मामले के निर्णय सहित पर्यावरण संरक्षण, औद्योगिक दुर्घटनाओं और कैदियों के मानवाधिकारों जैसे कई संवेदनशील मामलों में उच्चतम न्यायालय ने अनुच्छेद 142 का प्रयोग करके ऐतिहासिक और नीति-निर्धारक निर्देश जारी किए हैं। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग XVIII' के अंतर्गत 'आपातकालीन उपबंध' (Emergency Provisions - Articles 352-360) से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 352 के अनुसार राष्ट्रपति संपूर्ण भारत या उसके किसी भाग में राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा कर सकता है, यदि उसे इस बात का समाधान हो गया है कि युद्ध, बाह्य आक्रमण या 'सशस्त्र विद्रोह' (Armed Rebellion) के कारण भारत की सुरक्षा को गंभीर खतरा है, तथा मूल संविधान में 'सशस्त्र विद्रोह' शब्द के स्थान पर 'आंतरिक अशांति' (Internal Disturbance) शब्द का प्रयोग किया गया था जिसे 44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 द्वारा बदला गया था। 2. अनुच्छेद 356 के तहत यदि किसी राज्य के राज्यपाल की रिपोर्ट पर या अन्यथा राष्ट्रपति का यह समाधान हो जाता है कि उस राज्य की सरकार संविधान के उपबंधों के अनुसार नहीं चलाई जा सकती है, तो राष्ट्रपति उस राज्य में राष्ट्रपति शासन की घोषणा कर सकता है, और इस प्रकार की घोषणा के अनुमोदन के लिए संसद के दोनों सदनों द्वारा इसे जारी होने की तारीख से दो माह के भीतर साधारण बहुमत (Simple Majority) से पारित किया जाना अनिवार्य होता है। 3. अनुच्छेद 360 के अंतर्गत वित्तीय आपातकाल की घोषणा करने की शक्ति राष्ट्रपति को प्राप्त है, यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई है जिससे भारत या उसके राज्यक्षेत्र के किसी भाग का वित्तीय स्थायित्व या साख खतरे में है, तथा वित्तीय आपातकाल की घोषणा को भी संसद के दोनों सदनों द्वारा अनुमोदन मिलना आवश्यक होता है, और एक बार अनुमोदित होने के बाद यह अनिश्चित काल तक तब तक प्रवृत्त रहता है जब तक कि राष्ट्रपति इसे स्वयं एक नई घोषणा द्वारा वापस नहीं ले लेता। भारतीय अर्थव्यवस्था और वित्तीय समावेशन (Financial Inclusion) के संदर्भ में, भारत में 'डिजिटल ऋण' (Digital Lending) और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के विधिक एवं नियामक दिशा-निर्देशों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के डिजिटल ऋण पर दिशा-निर्देशों के अनुसार, सभी विनियमित संस्थाओं (Regulated Entities - REs) और उनके द्वारा नियुक्त डिजिटल ऋणदाताओं (Lending Service Providers - LSPs) के लिए यह अनिवार्य किया गया है कि ऋण से संबंधित सभी भुगतानों और संवितरणों का आदान-प्रदान सीधे उधारकर्ता (Borrower) के बैंक खाते और विनियमित संस्था के खाते के बीच ही होना चाहिए, तथा बीच में किसी भी तीसरे पक्ष (Third-party) के पूल खातों या पास-थ्रू खातों का उपयोग पूरी तरह से प्रतिबंधित है। 2. डिजिटल ऋण देने वाली कंपनियों या ऐप्स (Apps) के माध्यम से उपयोगकर्ताओं के मोबाइल डेटा, संपर्क सूचियों (Contact Lists) और मीडिया फाइलों तक अत्यधिक और अवांछित पहुंच (Excessive Data Harvesting) को रोकने के लिए आरबीआई के नियमों में यह स्पष्ट किया गया है कि ऋणदाताओं को न्यूनतम आवश्यक जानकारी ही एकत्र करनी होगी और वे उपयोगकर्ताओं की अनुमति के बिना उनके फोन की संपूर्ण संपर्क सूची या अन्य संवेदनशील व्यक्तिगत डेटा तक पहुंच प्राप्त नहीं कर सकते हैं। 3. आरबीआई के इन नए विधिक नियमों के तहत, यदि कोई डिजिटल ऋण प्रदाता (LSP) बिना किसी पूर्व सूचना या अनुचित तरीके से ऋण वसूली के लिए उधारकर्ता या उसके संपर्कों को परेशान करता है, तो ऐसी स्थिति में उधारकर्ता के पास केवल दीवानी न्यायालय (Civil Court) में हर्जाने का दावा करने का कानूनी विकल्प होता है, क्योंकि भारतीय रिजर्व बैंक के पास ऐसे मध्यस्थों के खिलाफ प्रत्यक्ष दंडात्मक कार्रवाई करने या उनकी डिजिटल सेवाओं को निलंबित करने का कोई विधिक अधिकार नहीं है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग IX' और 'भाग IX-A' के अंतर्गत 'पंचायतों' और 'नगरपालिकाओं' से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. 73वें और 74वें संविधान संशोधन अधिनियमों द्वारा क्रमशः पंचायतों और नगरपालिकाओं को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया गया, और इन दोनों ही स्तरों पर स्थानीय निकायों के चुनावों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की शक्ति भारत के निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) में निहित की गई है। 2. संविधान के अनुच्छेद 243-G और अनुच्छेद 243-W के अनुसार, राज्य के विधानमंडल विधि द्वारा पंचायतों और नगरपालिकाओं को आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय के लिए योजनाएं तैयार करने तथा आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय के लिए ऐसी योजनाएं लागू करने के लिए उत्तरदायी बना सकते हैं, जिनमें ग्यारहवीं और बारहवीं अनुसूची में सूचीबद्ध विषय शामिल हैं। 3. प्रत्येक पंचायत और नगरपालिका का कार्यकाल उसकी पहली बैठक के लिए नियत तारीख से पाँच वर्ष का होता है, और यदि किसी स्थानीय निकाय को समय से पहले विघटित कर दिया जाता है, तो उसके विघटन की तारीख से छह मास की अवधि के भीतर चुनाव कराना अनिवार्य होता है, बशर्ते कि उस निकाय का शेष कार्यकाल छह मास से कम का न हो। भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 32' के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय के 'रिट अधिकारिता' (Writ Jurisdiction) और 'अनुच्छेद 226' के अंतर्गत उच्च न्यायालयों की रिट अधिकारिता के बीच तुलना के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान का अनुच्छेद 32 स्वयं में एक मौलिक अधिकार है, जिसके तहत सर्वोच्च न्यायालय केवल मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए ही रिट जारी कर सकता है, और वह किसी अन्य उद्देश्य के लिए रिट जारी नहीं कर सकता है। 2. अनुच्छेद 226 के अंतर्गत उच्च न्यायालयों की रिट अधिकारिता का दायरा सर्वोच्च न्यायालय की तुलना में अधिक व्यापक है, क्योंकि उच्च न्यायालय न केवल मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए बल्कि 'किसी अन्य प्रयोजन' (जैसे सामान्य कानूनी अधिकारों के उल्लंघन पर) के लिए भी रिट जारी कर सकता है। 3. सर्वोच्च न्यायालय अपनी रिट अधिकारिता के प्रयोग से किसी व्यक्ति या प्राधिकारी को आदेश देने से इनकार कर सकता है क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय के लिए रिट जारी करना एक विवेकीय (Discretionary) शक्ति है, जबकि उच्च न्यायालयों के लिए मौलिक अधिकारों के हनन के मामले में रिट जारी करना एक बाध्यकारी कर्तव्य (Mandatory Duty) है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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