त्वरित लिंक्स
Civil services
6 views
भारतीय अर्थव्यवस्था और सामाजिक विकास के संदर्भ में, 'सार्वजनिक ऋण प्रबंधन' (Public Debt Management) तथा राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन अधिनियम, 2003 (FRBM Act) के विधिक एवं संस्थागत प्रावधानों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. FRBM अधिनियम, 2003 के संशोधित प्रावधानों के अनुसार, केंद्र सरकार का लक्ष्य वर्ष 2024-25 तक राजकोषीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 4.5 प्रतिशत या उससे कम तक सीमित करना है, तथा केंद्र सरकार के कुल ऋण (Public Debt) और राज्य सरकारों के संयुक्त ऋण के लिए सकल घरेलू उत्पाद का क्रमशः 40% और 20% का सांविधिक लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
- 2. भारत में केंद्र सरकार के आंतरिक और बाह्य ऋण के प्रबंधन का दायित्व पूर्ण रूप से भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के पास निहित है, और RBI 'सार्वजनिक ऋण कार्यालय' (Public Debt Office) के माध्यम से सरकारी प्रतिभूतियों (G-Secs) के निर्गम और प्रबंधन का कार्य संभालता है, जिसमें केंद्र के साथ-साथ सभी राज्यों के ऋण का प्रबंधन भी अनिवार्य रूप से शामिल है।
- 3. 'एन.के. सिंह समिति' (2016), जिसे FRBM अधिनियम की समीक्षा के लिए गठित किया गया था, ने यह सिफारिश की थी कि सरकार को राजकोषीय घाटे के लक्ष्य के बजाय 'ऋण-से-जीडीपी अनुपात' (Debt-to-GDP Ratio) को अपने राजकोषीय नीति का मुख्य लंगर (Anchor) बनाना चाहिए, जिसके तहत केंद्र सरकार के लिए वर्ष 2023 तक 40% और राज्यों के लिए 20% ऋण अनुपात का लक्ष्य सुझाया गया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 गलत है: FRBM अधिनियम (संशोधित) के तहत केंद्र सरकार के लिए राजकोषीय घाटे को 2025-26 तक 4.5% तक लाने का लक्ष्य रखा गया है, न कि 2024-25 तक। साथ ही, अधिनियम में केंद्र और राज्यों के संयुक्त ऋण के लिए 60% (केंद्र के लिए लगभग 40% और राज्यों के लिए लगभग 20%) का कुल लक्ष्य एन.के. सिंह समिति द्वारा सुझाया गया था, किंतु व्यक्तिगत रूप से राज्य सरकारों का ऋण प्रबंधन उनके अपने वित्तीय दायरे में आता है और सभी राज्यों का ऋण प्रबंधन RBI द्वारा अनिवार्य रूप से एकमुश्त नहीं संभाला जाता (यद्यपि RBI राज्य सरकारों के लिए बैंकर और ऋण प्रबंधक के रूप में कार्य करता है)।
कथन 2 गलत है: भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) केवल केंद्र सरकार और अधिकांश राज्य सरकारों (समझौतों के आधार पर) के लोक ऋण का प्रबंधन करता है, किंतु 'पूर्ण रूप से' सभी राज्यों के ऋण का अनिवार्य प्रबंधन RBI के पास नहीं होता, और केंद्र सरकार के आंतरिक एवं बाह्य ऋण प्रबंधन में अब वित्त मंत्रालय के तहत 'सार्वजनिक ऋण प्रबंधन प्रकोष्ठ' (PDMC) की भी महत्वपूर्ण भूमिका है।
कथन 3 सही है: एन.के. सिंह समिति (2016) ने FRBM अधिनियम की समीक्षा करते हुए यह प्रमुख सिफारिश की थी कि भारत को 'राजकोषीय घाटे' के लक्ष्य के स्थान पर 'ऋण-से-जीडीपी अनुपात' (Debt-to-GDP Ratio) को राजकोषीय नीति का मुख्य लंगर (Anchor) बनाना चाहिए। समिति ने वर्ष 2023 तक केंद्र सरकार के लिए 40% और राज्यों के लिए 20% (कुल 60%) ऋण-से-जीडीपी अनुपात का लक्ष्य प्राप्त करने की सिफारिश की थी। अत: केवल कथन 3 सही है।
Related Questions
→
भारतीय अर्थव्यवस्था एवं सतत विकास के संदर्भ में, 'मुस्फीति' (Inflation), 'मुद्रास्फीति जनित मंदी' (Stagflation) तथा केंद्रीय बैंकों द्वारा उपयोग किए जाने वाले मौद्रिक नीति उपकरणों के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. मुद्रास्फीति जनित मंदी (Stagflation) एक ऐसी आर्थिक स्थिति है जहाँ अर्थव्यवस्था में उच्च मुद्रास्फीति (High Inflation) के साथ-साथ आर्थिक विकास की गति धीमी (Stagnant Economic Growth) हो जाती है और बेरोजगारी का स्तर भी उच्च बना रहता है।
2. जब केंद्रीय बैंक अर्थव्यवस्था में बढ़ती मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिए 'मात्रात्मक मौद्रिक नीति उपकरणों' (Quantitative Monetary Policy Tools) के तहत बैंक दर और रेपो रेट में वृद्धि करते हैं, तो वाणिज्यिक बैंकों के लिए ऋण लेना महंगा हो जाता है, जिससे समग्र माँग में कमी आती है और इसे मौद्रिक नीति का 'संकोचकारी रुख' (Contractionary Stance) कहा जाता है।
3. भारत में खुदरा मुद्रास्फीति (Retail Inflation) का आकलन मुख्य रूप से 'थोक मूल्य सूचकांक' (WPI) के आधार पर किया जाता है, जिसका संकलन और प्रकाशन आर्थिक सलाहकार कार्यालय, उद्योग और आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग (DPIIT) द्वारा मासिक आधार पर किया जाता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
→
भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग IX' (पंचायती राज - अनुच्छेद 243 से 243-O) तथा 73वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 के प्रावधानों के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. 73वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा संविधान में एक नया ग्यारहवीं अनुसूची जोड़ी गई, जिसमें पंचायतों के प्रशासनिक नियंत्रण के लिए कुल 29 कार्यात्मक विषयों को सूचबद्ध किया गया है, और इन विषयों पर कानून बनाने की शक्ति अनन्य रूप से राज्य के विधानमंडल को प्रदान की गई है।
2. संविधान के अनुच्छेद 243-G के अंतर्गत पंचायतों को आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय के लिए योजनाएं तैयार करने तथा उन्हें लागू करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है, किंतु इन योजनाओं को क्रियान्वित करने के लिए कर, शुल्क, और टोल (Tolls) लगाने की वित्तीय शक्तियां देना अनिवार्य (Mandatory) नहीं बल्कि राज्य विधानमंडल के विवेक पर निर्भर है।
3. संविधान के अनुच्छेद 243-I के अनुसार प्रत्येक राज्य के राज्यपाल द्वारा हर पांच वर्ष की समाप्ति पर एक 'वित्त आयोग' (Finance Commission) का गठन किया जाएगा, जो राज्य और पंचायतों के बीच करों, शुल्कों और फीसों के विभाजन के सिद्धांतों की संप्रभुता के साथ अंतिम रूप से समीक्षा करता है और इसके द्वारा की गई सिफारिशें राज्य सरकार के लिए कानूनी रूप से बाध्यकारी (Binding) होती हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
→
भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग V' के अंतर्गत 'संसद के विशेषाधिकार' (Parliamentary Privileges - अनुच्छेद 105) और 'विधानमंडल के विशेषाधिकार' (अनुच्छेद 194) से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 105 के तहत संसद के दोनों सदनों, उसके सदस्यों और समितियों को कुछ विशेष अधिकार और उन्मुक्तियाँ प्रदान की गई हैं, और ये विशेषाधिकार संसद के सदस्यों को सदन के भीतर उनके द्वारा कही गई किसी बात या दिए गए किसी मत के संबंध में न्यायालय में किसी भी प्रकार की कानूनी कार्रवाई से पूर्ण संरक्षण प्रदान करते हैं, भले ही वह बात सदन के नियमों के विपरीत क्यों न हो।
2. 'संसदीय विशेषाधिकारों' के अंतर्गत प्रत्येक सदन को यह अनन्य अधिकार प्राप्त है कि वह अपनी कार्यवाही के प्रकाशन को रोक सकता है और सदन के सदस्यों या बाहरी व्यक्तियों द्वारा विशेषाधिकार हनन (Breach of Privilege) या सदन की अवमानना (Contempt of the House) के लिए उन्हें दंडित या भर्त्सना कर सकता है, तथा इस प्रकार के दंडात्मक मामलों में न्यायालयों को सदन के निर्णय की न्यायिक समीक्षा करने का पूर्ण अधिकार प्राप्त है।
3. यद्यपि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 105(3) में यह प्रावधान किया गया था कि जब तक संसद विशेषाधिकारों को संहिताबद्ध (Codify) नहीं करती है, तब तक इसके विशेषाधिकार वही माने जाएंगे जो ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमन्स के पास संविधान लागू होने के समय थे, तथापि 44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 द्वारा इस संदर्भ में ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमन्स के संदर्भ को हटाकर इसे संसद के सदनों, उसके सदस्यों और समितियों की उस समय की शक्ति और विशेषाधिकारों के समतुल्य कर दिया गया।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
→
भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग XI' (संघ और राज्यों के बीच विधायी संबंध - अनुच्छेद 245 से 255) के अंतर्गत विधायी शक्तियों के वितरण तथा अवशिष्ट शक्तियों (Residuary Powers) के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 245 के अनुसार संसद को भारत के संपूर्ण राज्यक्षेत्र या उसके किसी भाग के लिए विधि बनाने की शक्ति प्राप्त है, तथा किसी राज्य के विधानमंडल को उस राज्य के संपूर्ण राज्यक्षेत्र या उसके किसी भाग के लिए विधि बनाने की शक्ति है, किंतु संसद द्वारा बनाई गई कोई भी विधि इस आधार पर अमान्य (Void) नहीं समझी जाएगी कि उसका बहिःक्षेत्रीय प्रवर्तन (Extraterritorial Operation) होता है।
2. संविधान की सातवीं अनुसूची में विधायी शक्तियों को तीन सूचियों (संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची) में विभाजित किया गया है, और 'अवशिष्ट शक्तियाँ' (वे विषय जो तीनों सूचियों में स्पष्ट रूप से शामिल नहीं हैं) संविधान के अनुच्छेद 248 के तहत विशेष रूप से राज्यों के विधानमंडलों को प्रदान की गई हैं, जो अमेरिकी और ऑस्ट्रेलियाई संविधान की पद्धति के अनुरूप है।
3. जब राज्यसभा अपने उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम-से-कम दो-तिहाई बहुमत द्वारा यह संकल्प पारित कर देती है कि राष्ट्रीय हित में यह आवश्यक या समीचीन है कि संसद को राज्य सूची में प्रगणित किसी भी विषय पर विधि बनानी चाहिए, तब संसद को उस विषय पर पूरे देश या उसके किसी भाग के लिए विधि बनाने की शक्ति प्राप्त हो जाती है, और ऐसा संकल्प अधिकतम एक वर्ष की अवधि के लिए प्रवृत्त रहता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
→
भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 161' के अंतर्गत राज्यपाल की 'क्षमादान की शक्ति' (Pardoning Power) तथा सर्वोच्च न्यायालय के न्यायिक निर्णयों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 161 के अनुसार किसी राज्य के राज्यपाल को उस विषय से संबंधित, जिस पर राज्य की कार्यकारी शक्ति का विस्तार होता है, किसी अपराध के लिए दोषी ठहराए गए किसी भी व्यक्ति के दंड को क्षमा करने, उसका प्रविलಂಬन (Reprieve), विराम (Respite) या परिहार (Remission) करने अथवा दंडादेश का निलंबन, परिहार या commutation करने की शक्ति प्राप्त है।
2. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 'श्रीकांत चंद्रकांत चिपलुकर बनाम महाराष्ट्र राज्य' तथा अन्य ऐतिहासिक मामलों में यह स्पष्ट किया गया है कि राज्यपाल की क्षमादान की शक्ति की न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) का दायरा अत्यंत सीमित है, और राज्यपाल मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह (Aid and Advice) के बिना अपनी स्वतंत्र इच्छा से किसी भी आजीवन कारावास के कैदी की सजा को माफ कर सकते हैं।
3. 'राज्य सरकार बनाम एम.पी. प्रीतम सिंह' और 'मैरी विमला बनाम सुंदराथन' जैसे मामलों में न्यायालय ने यह व्यवस्था दी है कि यदि किसी अपराधी को भारतीय दंड संहिता (IPC) के अंतर्गत मृत्युदंड (Death Sentence) की सजा सुनाई गई है, तो ऐसी स्थिति में भी राज्य का राज्यपाल उस मृत्युदंड को क्षमा या commute कर सकता है, क्योंकि राज्यपाल की यह शक्ति राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति (अनुच्छेद 72) के बिल्कुल समकक्ष होती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Log in
to add to quiz, bookmark, or report issues.