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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग V' के अंतर्गत 'संसद के विशेषाधिकार' (Parliamentary Privileges - अनुच्छेद 105) और 'विधानमंडल के विशेषाधिकार' (अनुच्छेद 194) से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 105 के तहत संसद के दोनों सदनों, उसके सदस्यों और समितियों को कुछ विशेष अधिकार और उन्मुक्तियाँ प्रदान की गई हैं, और ये विशेषाधिकार संसद के सदस्यों को सदन के भीतर उनके द्वारा कही गई किसी बात या दिए गए किसी मत के संबंध में न्यायालय में किसी भी प्रकार की कानूनी कार्रवाई से पूर्ण संरक्षण प्रदान करते हैं, भले ही वह बात सदन के नियमों के विपरीत क्यों न हो।
- 2. 'संसदीय विशेषाधिकारों' के अंतर्गत प्रत्येक सदन को यह अनन्य अधिकार प्राप्त है कि वह अपनी कार्यवाही के प्रकाशन को रोक सकता है और सदन के सदस्यों या बाहरी व्यक्तियों द्वारा विशेषाधिकार हनन (Breach of Privilege) या सदन की अवमानना (Contempt of the House) के लिए उन्हें दंडित या भर्त्सना कर सकता है, तथा इस प्रकार के दंडात्मक मामलों में न्यायालयों को सदन के निर्णय की न्यायिक समीक्षा करने का पूर्ण अधिकार प्राप्त है।
- 3. यद्यपि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 105(3) में यह प्रावधान किया गया था कि जब तक संसद विशेषाधिकारों को संहिताबद्ध (Codify) नहीं करती है, तब तक इसके विशेषाधिकार वही माने जाएंगे जो ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमन्स के पास संविधान लागू होने के समय थे, तथापि 44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 द्वारा इस संदर्भ में ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमन्स के संदर्भ को हटाकर इसे संसद के सदनों, उसके सदस्यों और समितियों की उस समय की शक्ति और विशेषाधिकारों के समतुल्य कर दिया गया।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: संविधान के अनुच्छेद 105(2) के अनुसार, संसद में या उसकी किसी समिति में कही गई किसी बात या दिए गए किसी मत के संबंध में संसद के किसी भी सदस्य के विरुद्ध किसी भी न्यायालय में कोई कानूनी कार्यवाही (Civil or Criminal proceedings) नहीं की जा सकती। यह उन्मुक्ति सदन के भीतर की गई अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सुनिश्चित करती है।
कथन 2 गलत है: संसदीय विशेषाधिकारों के तहत सदन को विशेषाधिकार हनन या अवमानना के लिए दंडित करने का अनन्य अधिकार प्राप्त है। हालांकि, भारतीय सर्वोच्च न्यायालय के कई निर्णयों (जैसे केशव सिंह मामला, 1964) के अनुसार, यदि कोई सदन किसी व्यक्ति को विशेषाधिकार हनन के लिए दंडित करता है और वह मामला मौलिक अधिकारों (विशेषकर अनुच्छेद 21) या संवैधानिक सीमाओं के उल्लंघन से जुड़ा है, तो न्यायालय उस निर्णय की न्यायिक समीक्षा कर सकता है; सदन के विशेषाधिकार पूरी तरह से न्यायिक समीक्षा से परे नहीं हैं।
कथन 3 सही है: मूल रूप से अनुच्छेद 105(3) में ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमन्स के विशेषाधिकारों का संदर्भ दिया गया था। परंतु 44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 द्वारा इस व्यवस्था में संशोधन किया गया और यह प्रावधान किया गया कि संसद (या राज्य विधानमंडल) के विशेषाधिकार वही होंगे जो इस संशोधन के लागू होने के समय उस सदन, उसके सदस्यों और समितियों के पास थे, जब तक कि संसद द्वारा उन्हें विधिवत संहिताबद्ध नहीं किया जाता।
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भारतीय पर्यावरण, पारिस्थितिकी और जैव विविधता के संदर्भ में, 'राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण' (National Biodiversity Authority - NBA) और इसके विधिक ढांचे के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (NBA) का गठन वर्ष 2003 में 'जैविक विविधता अधिनियम, 2002' के प्रावधानों के तहत एक सांविधिक, स्वायत्त निकाय के रूप में किया गया था, जिसका मुख्यालय चेन्नई, तमिलनाडु में स्थित है।
2. यह प्राधिकरण जैव विविधता अधिनियम के उपबंधों के कार्यान्वयन, संरक्षण और जैविक संसाधनों के सतत उपयोग के लिए केंद्र सरकार को सलाह देने के साथ-साथ विदेशी नागरिकों या कंपनियों द्वारा देश के जैविक संसाधनों और उससे जुड़ी पारंपरिक ज्ञान तक पहुँच को विनियमित करने का विशेष अधिकार रखता है।
3. जैविक विविधता अधिनियम, 2002 के तहत स्थापित त्रि-स्तरीय प्रशासनिक ढांचे में राष्ट्रीय स्तर पर NBA, राज्य स्तर पर राज्य जैव विविधता बोर्ड (SBB) और स्थानीय स्तर पर जैव विविधता प्रबंधन समितियाँ (BMC) शामिल हैं, किंतु स्थानीय निकायों (BMC) को जैविक संसाधनों के व्यावसायिक उपयोग पर स्थानीय स्तर पर कर या शुल्क लगाने का कोई कानूनी अधिकार प्राप्त नहीं है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 355' के अंतर्गत केंद्र सरकार के कर्तव्यों और राज्यों में 'आपातकालीन प्रावधानों' के अनुप्रयोग के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान का अनुच्छेद 355 केंद्र सरकार पर यह संवैधानिक कर्तव्य आरोपित करता है कि वह बाहरी आक्रमण और आंतरिक अशांति से प्रत्येक राज्य की रक्षा करे तथा यह सुनिश्चित करे कि प्रत्येक राज्य की सरकार इस संविधान के उपबंधों के अनुसार ही चलाई जा रही है।
2. ऐतिहासिक 'एस.आर. बोम्मय बनाम भारत संघ (1994)' मामले के निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया था कि अनुच्छेद 355 के अंतर्गत 'आंतरिक अशांति' या 'संवैधानिक मशीनरी की विफलता' का मूल्यांकन करने और राष्ट्रपति शासन (अनुच्छेद 356) लागू करने की केंद्र की शक्ति पूर्णतः अविवेकी (Absolute and Immune from Judicial Review) है।
3. यदि कोई राज्य सरकार अनुच्छेद 355 के तहत केंद्र द्वारा दिए गए किसी वैध निर्देश का पालन करने में असफल रहती है, तो केंद्र सरकार के पास इस आधार पर अनुच्छेद 356 का प्रयोग करके उस राज्य की मंत्रिपरिषद को बर्खास्त करने और राष्ट्रपति शासन लागू करने की संवैधानिक शक्ति प्राप्त हो जाती है, जैसा कि अनुच्छेद 365 में प्रावधानित है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 143' के अंतर्गत 'उच्चतम न्यायालय से परामर्श करने की राष्ट्रपति की शक्ति' (Power of President to consult Supreme Court) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 143 के तहत राष्ट्रपति को यह शक्ति प्राप्त है कि यदि उसे प्रतीत होता है कि विधि या तथ्य का कोई ऐसा प्रश्न उत्पन्न हुआ है या उत्पन्न होने की संभावना है, जो लोक महत्व का है, तो वह उस प्रश्न पर उच्चतम न्यायालय की राय प्राप्त करने के लिए उसे विचारार्थ भेज सकता है।
2. अनुच्छेद 143 के तहत उच्चतम न्यायालय के लिए यह अनिवार्य (Mandatory) है कि वह राष्ट्रपति द्वारा परामर्श के लिए भेजे गए प्रत्येक मामले (चाहे वह संवैधानिक मामलों से जुड़ा हो या पूर्व-संविधान संधियों और करारों से उत्पन्न विवादों से) पर अपनी राय राष्ट्रपति को अवश्य दे।
3. उच्चतम न्यायालय द्वारा अनुच्छेद 143 के अधीन दी गई सलाह या राय राष्ट्रपति पर किसी भी स्थिति में बाध्यकारी (Binding) नहीं होती है, और न ही यह सलाह भारतीय न्यायक्षेत्र के अंतर्गत एक 'पूर्ण निर्णय' (Judgment) या दृष्टांत (Precedent) होती है।
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग XVII' (राजभाषा - अनुच्छेद 343 से 351) के अंतर्गत संसद में प्रयोग की जाने वाली भाषा और 'राजभाषा अधिनियम, 1963' से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 120 के अनुसार, संसद में कार्य-निष्पादन की भाषा हिंदी या अंग्रेजी होगी, किंतु लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा के सभापति ऐसे किसी सदस्य को सदन में अपनी मातृभाषा में बोलने की अनुमति दे सकते हैं जो हिंदी या अंग्रेजी में अपनी पर्याप्त अभिव्यक्ति नहीं कर सकता है।
2. संविधान के अनुच्छेद 343 में यह उपबंध किया गया था कि संविधान के प्रारंभ से 15 वर्ष की अवधि (अर्थात 26 जनवरी 1965 तक) के बाद संघ के सभी शासकीय प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी का प्रयोग स्वतः समाप्त हो जाएगा, बशर्ते संसद विधि द्वारा इसके आगे भी अंग्रेजी के प्रयोग को अधिकृत न करे।
3. राजभाषा अधिनियम, 1963 के प्रावधानों के तहत यह सुनिश्चित किया गया कि 26 जनवरी 1965 के बाद भी संघ के शासकीय प्रयोजनों के लिए और संसद में कार्य-व्यवहार के लिए हिंदी के अतिरिक्त अंग्रेजी भाषा का निरंतर प्रयोग अनिश्चितकाल तक किया जा सकता है।
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