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भारतीय राजव्यवस्था के अंतर्गत 'संसदीय समितियों' (Parliamentary Committees) और विशेष रूप से 'लोक लेखा समिति' (Public Accounts Committee - PAC) के कार्यकरण तथा वित्तीय नियंत्रण के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. लोक लेखा समिति में कुल 22 सदस्य होते हैं, जिनमें से 15 लोकसभा द्वारा और 7 राज्यसभा द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व के सिद्धांत के आधार पर एकल संक्रमणीय मत द्वारा चुने जाते हैं, और किसी भी मंत्री को इस समिति के सदस्य के रूप में निर्वाचित या नियुक्त नहीं किया जा सकता है।
  2. 2. नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) द्वारा प्रस्तुत भारत के विनियोग लेखा (Appropriation Accounts) और वित्त लेखा (Finance Accounts) से संबंधित ऑडिट रिपोर्टों की तकनीकी और वित्तीय अनियमिता की दृष्टि से केवल तथ्यात्मक जाँच करना लोक लेखा समिति का मुख्य कार्य है, किंतु इसके पास यह शक्ति प्राप्त नहीं है कि यह नीतिगत मामलों के औचित्य (wisdom of policy) पर कोई प्रश्न उठाए।
  3. 3. वर्ष 1967 की संसदीय परंपरा के अनुसार, लोक लेखा समिति का अध्यक्ष हमेशा शासक दल (Ruling Party) के सत्ता पक्ष के वरिष्ठ सांसदों में से ही लोकसभा अध्यक्ष द्वारा नियुक्त किया जाता है, ताकि सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में सुगमता बनी रहे।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 सही है: लोक लेखा समिति (PAC) में कुल 22 सदस्य होते हैं—15 लोकसभा से और 7 राज्यसभा से। इनका चुनाव आनुपातिक प्रतिनिधित्व के सिद्धांत के अनुसार एकल संक्रमणीय मत के द्वारा होता है। इसके अलावा, कोई भी मंत्री इस समिति का सदस्य नहीं बन सकता है। कथन 2 सही है: लोक लेखा समिति CAG की रिपोर्टों (विशेषकर विनियोग और वित्त लेखा) की जाँच करती है। इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि सार्वजनिक धन का व्यय संसद द्वारा स्वीकृत सीमाओं के भीतर हुआ है या नहीं। हालांकि, यह समिति 'नीतिगत मामलों के औचित्य' (questions of policy) की आलोचना करने से बचती है क्योंकि नीति निर्धारण कार्यपालिका और विधायिका का नीतिगत क्षेत्र है। कथन 3 गलत है: वर्ष 1967 की परंपरा के अनुसार, लोक लेखा समिति का अध्यक्ष हमेशा 'मुख्य विपक्षी दल' (Main Opposition Party) के सदस्यों में से ही लोकसभा अध्यक्ष द्वारा नियुक्त किया जाता है, न कि सत्ता पक्ष के दल से। अतः कथन 3 असत्य है।
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