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Civil services
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स्वतंत्र भारत के प्रशासनिक इतिहास में अखिल भारतीय सेवाओं (All India Services) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 312 के तहत राज्यसभा को यह विशेष अधिकार प्राप्त है कि वह उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत से एक नया अखिल भारतीय सेवा सृजित करने का प्रस्ताव पारित कर सके।
- 2. भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) और भारतीय पुलिस सेवा (IPS) को संविधान के लागू होने के साथ ही स्वतः अखिल भारतीय सेवा का दर्जा प्राप्त हो गया था, जबकि भारतीय वन सेवा (IFS) को वर्ष 1966 में तीसरी अखिल भारतीय सेवा के रूप में सृजित किया गया।
उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 312 के अनुसार, यदि राज्यसभा ने उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत से यह संकल्प पारित कर दिया हो कि राष्ट्रीय हित में ऐसा करना आवश्यक है, तो संसद कानून द्वारा अखिल भारतीय सेवाओं (संघ और राज्यों के लिए उभयनिष्ठ) का सृजन कर सकती है। वर्तमान में भारत में तीन अखिल भारतीय सेवाएँ हैं: IAS, IPS और IFS (भारतीय वन सेवा, जिसे 1966 में ऑल इंडिया सर्विसेज एक्ट, 1951 के तहत जोड़ा गया)। अतः दोनों कथन पूर्णतः सत्य हैं।
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग IV-A' (मूल कर्तव्य - अनुच्छेद 51A) तथा इनसे संबंधित विभिन्न कानूनी और न्यायिक पहलों के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के मूल पाठ में 'मूल कर्तव्यों' का कोई प्रावधान नहीं था, इन्हें स्वर्ण सिंह समिति (Swaran Singh Committee) की सिफारिशों के आधार पर 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा संविधान में जोड़ा गया था, और वर्तमान में संविधान में कुल 11 मूल कर्तव्य हैं जिन्हें अनुच्छेद 51A के अंतर्गत एक ही खंड में शामिल किया गया है।
2. 'वर्षा कुमार बनाम भारत संघ' और अन्य ऐतिहासिक सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों के अनुसार, मूल कर्तव्य प्रकृति में केवल नागरिकों के लिए बाध्यकारी (Enforceable by law) हैं, जिसका अर्थ है कि विधायिका या कार्यपालिका द्वारा इन कर्तव्यों के उल्लंघन पर सीधे दंडात्मक कार्रवाई करने के लिए कानून बनाए जा सकते हैं, और अदालतें भी नागरिकों को इन कर्तव्यों का पालन करने के लिए रिट (Writs) जारी कर सकती हैं।
3. न्यायमूर्ति जे.एस. वर्मा समिति (1999), जिसे 'मूल कर्तव्यों के शिक्षण और पुनरुत्थान' के लिए गठित किया गया था, ने यह सिफारिश की थी कि मूल कर्तव्यों के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए मौजूदा कानूनों (जैसे वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, पर्यावरण संरक्षण अधिनियम और राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम) का व्यापक प्रचार-प्रसार किया जाना चाहिए ताकि नागरिक अपने संवैधानिक दायित्वों के प्रति जागरूक हो सकें।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संसद के 'विशेषाधिकार प्रस्ताव' (Privilege Motion) तथा संसद सदस्यों के विशेषाधिकारों के हनन (Breach of Privilege) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. विशेषाधिकार प्रस्ताव संसद के किसी भी सदन के किसी भी सदस्य द्वारा उस मंत्री या सदस्य के विरुद्ध लाया जा सकता है, जिस पर यह आरोप हो कि उसने सदन या उसके किसी सदस्य के विशेषाधिकारों का हनन किया है या सदन के समक्ष तथ्यात्मक रूप से गलत, भ्रामक या तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत किए गए तथ्यों के माध्यम से सदन को गुमराह किया है।
2. लोकसभा में विशेषाधिकार प्रस्ताव की ग्राह्यता (Admissibility) पर अंतिम निर्णय लेने का अधिकार लोकसभा अध्यक्ष (Speaker) के पास होता है, और अध्यक्ष इस मामले को सीधे तौर पर प्रारंभिक जांच के लिए 'विशेषाधिकार समिति' (Privilege Committee) के पास भेज सकते हैं या स्वयं सदन में इस पर बहस की अनुमति दे सकते हैं।
3. 'संसद में प्रक्रिया तथा कार्य संचालन नियम' के अनुसार, यदि किसी मंत्री के विरुद्ध विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव लोकसभा अध्यक्ष द्वारा स्वीकार कर लिया जाता है, तो उस संबंधित मंत्री को अपने बचाव में सदन में व्यक्तिगत स्पष्टीकरण देने का कोई संवैधानिक या प्रक्रियात्मक अवसर नहीं दिया जाता है, क्योंकि सामूहिक उत्तरदायित्व के सिद्धांत के तहत मंत्रिपरिषद स्वतः दोषी मानी जाती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय अर्थव्यवस्था और सामाजिक विकास के संदर्भ में, 'सार्वजनिक ऋण प्रबंधन' (Public Debt Management) तथा राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन अधिनियम, 2003 (FRBM Act) के विधिक एवं संस्थागत प्रावधानों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. FRBM अधिनियम, 2003 के संशोधित प्रावधानों के अनुसार, केंद्र सरकार का लक्ष्य वर्ष 2024-25 तक राजकोषीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 4.5 प्रतिशत या उससे कम तक सीमित करना है, तथा केंद्र सरकार के कुल ऋण (Public Debt) और राज्य सरकारों के संयुक्त ऋण के लिए सकल घरेलू उत्पाद का क्रमशः 40% और 20% का सांविधिक लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
2. भारत में केंद्र सरकार के आंतरिक और बाह्य ऋण के प्रबंधन का दायित्व पूर्ण रूप से भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के पास निहित है, और RBI 'सार्वजनिक ऋण कार्यालय' (Public Debt Office) के माध्यम से सरकारी प्रतिभूतियों (G-Secs) के निर्गम और प्रबंधन का कार्य संभालता है, जिसमें केंद्र के साथ-साथ सभी राज्यों के ऋण का प्रबंधन भी अनिवार्य रूप से शामिल है।
3. 'एन.के. सिंह समिति' (2016), जिसे FRBM अधिनियम की समीक्षा के लिए गठित किया गया था, ने यह सिफारिश की थी कि सरकार को राजकोषीय घाटे के लक्ष्य के बजाय 'ऋण-से-जीडीपी अनुपात' (Debt-to-GDP Ratio) को अपने राजकोषीय नीति का मुख्य लंगर (Anchor) बनाना चाहिए, जिसके तहत केंद्र सरकार के लिए वर्ष 2023 तक 40% और राज्यों के लिए 20% ऋण अनुपात का लक्ष्य सुझाया गया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय इतिहास, कला एवं संस्कृति के संदर्भ में, विजयनगर साम्राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था, भू-राजस्व प्रणाली और सिक्कों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. विजयनगर साम्राज्य में केंद्रीय प्रशासन का सर्वोच्च अधिकारी 'महामंडलेश्वर' होता था, जो सीधे राजा के प्रति उत्तरदायी था, तथा संपूर्ण साम्राज्य को प्रांतों (मंडलों), जिन्हें 'वलनाडु' और 'नाडु' में विभाजित किया गया था, में प्रशासनिक सुविधा की दृष्टि से बांटा गया था।
2. विजयनगर साम्राज्य की आय का मुख्य स्रोत भू-राजस्व था, जिसे सामान्यतः उपज का एक-छठवां हिस्सा (1/6th) निर्धारित किया गया था, किंतु भूमि की उर्वरता, फसल के प्रकार और सिंचाई के साधनों (जैसे नहरें और तालाब जो स्थानीय नायकों द्वारा निर्मित होते थे) के आधार पर इसमें भिन्नता पाई जाती थी।
3. कृष्णदेवराय के शासनकाल में जारी किए गए प्रसिद्ध स्वर्ण सिक्के, जिन्हें 'पगोडा' या 'वाराह' कहा जाता था, साम्राज्य की अर्थव्यवस्था की सुदृढ़ता के प्रतीक थे, जिन पर अक्सर कन्नड़, तेलुगु या नागरी लिपि में देवी-देवताओं के चित्र तथा राजाओं के नाम अंकित होते थे।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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