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Civil services
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किस गवर्नर जनरल के कार्यकाल में 'डाक व्यवस्था' (Postal System) में सुधार किए गए?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
लॉर्ड डलहौजी ने आधुनिक डाक प्रणाली की शुरुआत की थी।
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SJFI (भारतीय खेल पत्रकार महासंघ) स्वर्ण पदक 2026 से किसे सम्मानित किया गया है?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग XIV' (संघ और राज्यों کے अधीन सेवाएँ - अनुच्छेद 308 से 323) और उससे संबंधित प्रावधानों के अंतर्गत निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 312 के अनुसार, यदि राज्य सभा उपस्थित और मतदान करने वाले कम से कम दो-तिहाई सदस्यों के समर्थन से एक संकल्प पारित करती है कि राष्ट्रीय हित में यह आवश्यक या समीचीन है, तो संसद विधि द्वारा अखिल भारतीय सेवाओं (All India Services) के सृजन का उपबंध कर सकती है, तथा इसके अंतर्गत भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS), भारतीय पुलिस सेवा (IPS) के साथ-साथ 'भारतीय न्यायिक सेवा' (All India Judicial Service) का भी सृजन किया जा सकता है।
2. संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) के अध्यक्ष या किसी अन्य सदस्य को उनके पद से राष्ट्रपति द्वारा केवल साबित कदाचार (Proved Misbehavior) या असमर्थता के आधार पर ही हटाया जा सकता है, और ऐसे मामलों में राष्ट्रपति को उच्चतम न्यायालय से जाँच कराने की आवश्यकता नहीं होती है, बल्कि राष्ट्रपति का निर्णय अंतिम और सर्वोपरि होता है।
3. अनुच्छेद 323 के प्रावधानों के तहत संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) का यह कर्तव्य है कि वह प्रत्येक वर्ष राष्ट्रपति को आयोग के किए गए कार्यों की रिपोर्ट प्रस्तुत करे, और राष्ट्रपति इस रिपोर्ट को संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष रखवाते हैं, जिसके साथ उस हिस्से का विवरण भी होता है जिसमें यह बताया जाता है कि आयोग की सलाह को क्यों अस्वीकार किया गया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 32' के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय की रिट अधिकारक्षेत्र (Writ Jurisdiction) तथा 'सार्वजनिक हित याचिका' (PIL) के विकास के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 32 के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय को मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus), परमादेश (Mandamus), प्रतिषेध (Prohibition), अधिकार पृच्छा (Quo-Warranto) और उत्प्रेषण (Certiorari) जैसी रिट जारी करने की शक्ति प्राप्त है, और यह अधिकार क्षेत्र सर्वोच्च न्यायालय का एक मौलिक (Original) किंतु अनन्य (Exclusive) अधिकार नहीं है, क्योंकि उच्च न्यायालयों को भी अनुच्छेद 226 के तहत इससे व्यापक रिट अधिकार क्षेत्र प्राप्त है।
2. 'पी. एन. भगवती' और अन्य न्यायविदों के प्रयासों से 1980 के दशक में विकसित 'सार्वजनिक हित याचिका' (PIL) की अवधारणा ने 'लोकस स्टैंडी' (Locus Standi - यानी पीड़ित व्यक्ति द्वारा ही अदालत जाने का नियम) को शिथिल कर दिया, जिसके तहत अब समाज का कोई भी जिम्मेदार व्यक्ति या संस्था समाज के शोषित, वंचित या गरीबों के मौलिक अधिकारों के हनन के खिलाफ न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकती है।
3. 'बंडारू मुक्ति राव बनाम भारत संघ' और अन्य संबंधित निर्णयों में सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया है कि अनुच्छेद 32 के तहत केवल उन्हीं मामलों में याचिका स्वीकार की जा सकती है जहाँ किसी व्यक्ति के 'संवैधानिक अधिकारों' का उल्लंघन हुआ हो, किंतु नीति निदेशक तत्वों (DPSP) या सामान्य विधकीय अधिकारों के उल्लंघन के मामलों में सीधे सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष रिट याचिका दायर नहीं की जा सकती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग III' (मूल अधिकार - अनुच्छेद 12 से 35) तथा 'रिट अधिकारक्षेत्र' (Writ Jurisdiction - अनुच्छेद 32 और 226) के प्रावधानों के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 32 के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय को और अनुच्छेद 226 के अंतर्गत उच्च न्यायालयों को मूल अधिकारों के प्रवर्तन के लिए बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus), परमादेश (Mandamus), प्रतिषेध (Prohibition), अधिकार-पृच्छा (Quo-Warranto) और उत्प्रेषण (Certiorari) जैसी रिट जारी करने की शक्ति प्राप्त है, जिसमें उच्च न्यायालय का अधिकारक्षेत्र इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय से अधिक व्यापक है क्योंकि उच्च न्यायालय मूल अधिकारों के अलावा अन्य कानूनी अधिकारों के उल्लंघन पर भी रिट जारी कर सकता है।
2. 'बंदी प्रत्यक्षीकरण' (Habeas Corpus) रिट का शाब्दिक अर्थ 'को शरीर को प्रस्तुत किया जाए' है, जिसे किसी ऐसे व्यक्ति की अवैध नजरबंदी या गिरफ्तारी के खिलाफ जारी किया जाता है जो सार्वजनिक प्राधिकरण या किसी निजी व्यक्ति दोनों के विरुद्ध उपलब्ध है।
3. 'अधिकार-पृच्छा' (Quo-Warranto) रिट किसी सार्वजनिक पद पर किसी व्यक्ति के दावे की वैधता की जाँच करने के लिए जारी की जाती है, और इस रिट को दायर करने के लिए यह आवश्यक है कि याचिकाकर्ता स्वयं उस पद का दावेदार या उससे सीधे प्रभावित व्यक्ति हो, अन्यथा कोई अन्य तीसरा व्यक्ति जनहित में इस रिट को दायर नहीं कर सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय पर्यावरण कानून और 'जैव विविधता अधिनियम, 2002' (Biological Diversity Act, 2002) के प्रावधानों तथा उनके संस्थागत तंत्र के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. यह अधिनियम भारत के जैविक संसाधनों के संरक्षण, उनके संधारणीय उपयोग और उनके उपयोग से होने वाले लाभों के न्यायसंगत और निष्पक्ष बँटवारे को सुनिश्चित करने के लिए बनाया गया है, और इसके तहत त्रि-स्तरीय (Three-tier) संस्थागत ढाँचे की स्थापना का प्रावधान है जिसमें राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (NBA), राज्य जैव विविधता बोर्ड (SBBs) और स्थानीय स्तर पर जैव विविधता प्रबंधन समितियाँ (BMCs) शामिल हैं।
2. 'जैव विविधता प्रबंधन समितियाँ' (BMCs) स्थानीय निकायों द्वारा अपने अधिकार क्षेत्र में जैविक संसाधनों की उपलब्धता और उनके पारंपरिक ज्ञान से संबंधित 'जन जैव विविधता रजिस्टर' (People's Biodiversity Register - PBR) तैयार करने और उसका दस्तावेजीकरण करने के लिए अनिवार्य रूप से गठित की जाती हैं।
3. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए विभिन्न निर्णयों और अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार, भारत के किसी भी नागरिक या संस्था को देश के भीतर जैविक संसाधनों का उपयोग करने या व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए उनका दोहन करने से पहले राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (NBA) से पूर्व अनुमति लेना कानूनी रूप से अनिवार्य है, भले ही वह स्थानीय समुदाय का पारम्परिक संग्रही (Collector) क्यों न हो।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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