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Indian Polity
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वित्त आयोग (Finance Commission) का गठन किस अनुच्छेद के तहत और कितने वर्षों में होता है?

Detailed Explanation

अनुच्छेद 280 के तहत हर 5 वर्ष में एक वित्त आयोग का गठन किया जाता है, जो केंद्र-राज्य के बीच राजस्व वितरण की सिफारिश करता है।
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भारतीय संविधान के अंतर्गत महत्वपूर्ण संवैधानिक संशोधनों (विशेषकर 38वें, 42वें और 44वें संशोधन) तथा आपातकालीन उपबंधों (अनुच्छेद 352 से 360) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. 38वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1975 द्वारा यह प्रावधान किया गया कि राष्ट्रपति द्वारा राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा को किसी भी न्यायालय में न्याययिक समीक्षा (Judicial Review) के दायरे से बाहर रखा जाएगा, जिसे बाद में 44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 द्वारा समाप्त कर दिया गया। 2. 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 के माध्यम से आपातकाल के दौरान अनुच्छेद 19 द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारों के स्वतः निलंबन के दायरे का विस्तार करते हुए यह उपबंधित किया गया कि राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान देश के किसी भी हिस्से में विधायी और कार्यकारी उपाय केवल इसलिए अमान्य नहीं होंगे कि वे अनुच्छेद 14 और 19 का उल्लंघन करते हैं। 3. 44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 द्वारा यह अनिवार्य किया गया कि राष्ट्रीय आपातकाल की उद्घोषणा या उसके जारी रहने के अनुमोदन से संबंधित प्रस्ताव संसद के प्रत्येक सदन द्वारा अपने कुल सदस्य संख्या के बहुमत तथा उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत द्वारा ही पारित किया जाना चाहिए। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? भारतीय संविधान की प्रस्तावना (उद्देशिका) में उल्लिखित विभिन्न आयामों और उससे संबंधित ऐतिहासिक न्यायिक दृष्टांतों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. प्रस्तावना में उल्लिखित 'न्याय' (सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक) के आदर्श को वर्ष 1917 की रूसी क्रांति से प्रेरणा लेकर शामिल किया गया था, जबकि 'स्वतंत्रता, समता और बंधुता' के आदर्श फ्रांसीसी क्रांति पर आधारित हैं। 2. 'गोलकनाथ वाद (1967)' में उच्चतम न्यायालय ने पहली बार यह स्पष्ट रूप से निर्धारित किया था कि प्रस्तावना संविधान का एक अभिन्न अंग है और संसद को अनुच्छेद 368 के अंतर्गत इसमें संशोधन करने की पूर्ण शक्ति प्राप्त है। 3. प्रस्तावना न तो विधायिका की शक्ति का स्रोत है और न ही उसकी शक्तियों पर कोई प्रतिबंध लगाती है, तथा इसकी प्रकृति गैर-न्यायोचित (Non-justiciable) है, जिसका अर्थ है कि इसके प्रावधानों को अदालतों में सीधे लागू नहीं कराया जा सकता है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? भारतीय संविधान के अंतर्गत राज्य की कार्यपालिका, विशेष रूप से राज्यपाल की विधाई शक्तियों और मुख्यमंत्री तथा मंत्रिपरिषद के संबंधों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 213 के तहत राज्यपाल को अध्यादेश प्रख्यापित करने की शक्ति प्राप्त है, और यह शक्ति राज्य विधानमंडल के सत्र में न होने पर ही प्रयोग की जा सकती है, किंतु राज्यपाल द्वारा प्रख्यापित प्रत्येक अध्यादेश को राज्य विधानमंडल के पुनः समवेत होने पर छह सप्ताह के भीतर उसके समक्ष रखा जाना अनिवार्य है, अन्यथा इस अवधि की समाप्ति से पहले ही यह निष्प्रभावी हो जाता है। 2. अनुच्छेद 164(1) के प्रावधान के अनुसार, किसी राज्य के मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है, और अन्य मंत्रियों की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा मुख्यमंत्री की सलाह पर की जाती है, तथा छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश और ओडिशा राज्यों में जनजातीय कल्याण के लिए पृथक् से एक मंत्री का होना अनिवार्य किया गया है, जिसके पास इन राज्यों के अतिरिक्त बिहार का प्रभार भी होना संविधान द्वारा अनिवार्य रूप से तय किया गया है। 3. राज्यपाल को यह संवैधानिक अधिकार प्राप्त है कि वह राज्य विधानमंडल द्वारा पारित किसी विधेयक को राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित (Reserve) कर सकता है, और यदि कोई ऐसा विधेयक राज्य की उच्च न्यायालय की शक्तियों को इस प्रकार derogate करता है कि जिससे उच्च न्यायालय की संविधान-प्रदत्त स्थिति खतरे में पड़ जाए, तो ऐसे विधेयक को राष्ट्रपति के लिए आरक्षित करना राज्यपाल के लिए अनिवार्य होता है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? भारतीय संविधान की प्रस्तावना (उद्देशिका) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा प्रस्तुत और संविधान सभा द्वारा पारित 'उद्देश्य प्रस्ताव' (Objective Resolution) ही अंततः भारतीय संविधान की प्रस्तावना बना, जिसमें 'समाजवादी' और 'धर्मनिरपेक्ष' शब्दों को मूल संविधान में ही शामिल कर लिया गया था। 2. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 'केशवानंद भारती वाद (1973)' में यह स्पष्ट किया गया कि प्रस्तावना संविधान का एक अभिन्न अंग है और इसमें अनुच्छेद 368 के तहत संशोधन किया जा सकता है, बशर्ते इसके 'मूल ढांचे' (Basic Structure) को क्षति न पहुँचे। 3. प्रस्तावना न तो विधायिका की शक्तियों का स्रोत है और न ही उसकी शक्तियों पर कोई प्रतिबंध लगाती है, तथा यह प्रकृति से गैर-न्यायोचित (Non-justiciable) है, जिसका अर्थ है कि इसके प्रावधानों को देश के किसी भी न्यायालय में प्रवर्तित (Enforced) नहीं कराया जा सकता। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) और राज्य लोक सेवा आयोग (SPSC) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 316 के अनुसार संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है, जबकि राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और अन्य सदस्यों की नियुक्ति संबंधित राज्य के राज्यपाल द्वारा की जाती है, और इनमें से किसी भी आयोग के सदस्यों को अपने कार्यकाल की समाप्ति के बाद भारत सरकार या किसी राज्य सरकार के अधीन किसी भी अन्य नियोजन (Employment) के लिए पात्र नहीं माना जाता है। 2. संघ लोक सेवा आयोग या किसी राज्य लोक सेवा आयोग के किसी सदस्य को केवल साबित कदाचार (Proved Misbehavior) या असमर्थता के आधार पर राष्ट्रपति द्वारा हटाया जा सकता है, और इसके लिए उच्चतम न्यायालय द्वारा की गई जाँच रिपोर्ट का राष्ट्रपति के लिए मानना अनिवार्य होता है, भले ही राज्यपाल राज्य आयोग के मामले में हटाने की प्रक्रिया शुरू करता हो। 3. अनुच्छेद 323 के प्रावधानों के अनुसार संघ लोक सेवा आयोग अपने कार्यों की वार्षिक रिपोर्ट राष्ट्रपति को प्रस्तुत करता है, जिसे राष्ट्रपति संसद के दोनों सदनों के समक्ष रखवाते हैं, तथा राज्य लोक सेवा आयोग अपनी रिपोर्ट राज्यपाल को सौंपता है, जिसे राज्यपाल राज्य के विधानमंडल के समक्ष रखवाते हैं। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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