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Indian Polity
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भारतीय संविधान की प्रस्तावना (उद्देशिका) में उल्लिखित विभिन्न आयामों और उससे संबंधित ऐतिहासिक न्यायिक दृष्टांतों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. प्रस्तावना में उल्लिखित 'न्याय' (सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक) के आदर्श को वर्ष 1917 की रूसी क्रांति से प्रेरणा लेकर शामिल किया गया था, जबकि 'स्वतंत्रता, समता और बंधुता' के आदर्श फ्रांसीसी क्रांति पर आधारित हैं।
- 2. 'गोलकनाथ वाद (1967)' में उच्चतम न्यायालय ने पहली बार यह स्पष्ट रूप से निर्धारित किया था कि प्रस्तावना संविधान का एक अभिन्न अंग है और संसद को अनुच्छेद 368 के अंतर्गत इसमें संशोधन करने की पूर्ण शक्ति प्राप्त है।
- 3. प्रस्तावना न तो विधायिका की शक्ति का स्रोत है और न ही उसकी शक्तियों पर कोई प्रतिबंध लगाती है, तथा इसकी प्रकृति गैर-न्यायोचित (Non-justiciable) है, जिसका अर्थ है कि इसके प्रावधानों को अदालतों में सीधे लागू नहीं कराया जा सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: भारतीय संविधान की प्रस्तावना में 'सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय' का आदर्श 1917 की रूसी (बोल्शेविक) क्रांति से लिया गया है, जबकि 'स्वतंत्रता, समता और बंधुता' के आदर्श 1789 की फ्रांसीसी क्रांति से प्रेरित हैं।
कथन 2 गलत है: 'बेरूबारी यूनियन वाद (1960)' में सर्वोच्च न्यायालय ने यह कहा था कि प्रस्तावना संविधान का अंग नहीं है। इसके पश्चात, 'केशवानंद भारती वाद (1973)' में न्यायालय ने अपने पूर्ववर्ती निर्णय को बदलते हुए यह स्पष्ट किया कि प्रस्तावना संविधान का एक अभिन्न अंग है और इसमें अनुच्छेद 368 के तहत संशोधन किया जा सकता है (बशर्ते 'मूल ढांचा' प्रभावित न हो)। गोलकनाथ वाद में प्रस्तावना को संविधान का अंग नहीं माना गया था।
कथन 3 सही है: प्रस्तावना न तो देश की विधायिका को कोई शक्ति प्रदान करती है और न ही उसकी शक्तियों पर कोई प्रतिबंध लगाती है। इसके अलावा, प्रस्तावना के प्रावधान गैर-न्यायोचित (Non-justiciable) हैं, अर्थात इन्हें न्यायालयों द्वारा कानूनी रूप से लागू नहीं कराया जा सकता है।
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कथन 2 गलत है: 'बेरूबारी यूनियन वाद (1960)' में सर्वोच्च न्यायालय ने यह कहा था कि प्रस्तावना संविधान का अंग नहीं है। इसके पश्चात, 'केशवानंद भारती वाद (1973)' में न्यायालय ने अपने पूर्ववर्ती निर्णय को बदलते हुए यह स्पष्ट किया कि प्रस्तावना संविधान का एक अभिन्न अंग है और इसमें अनुच्छेद 368 के तहत संशोधन किया जा सकता है (बशर्ते 'मूल ढांचा' प्रभावित न हो)। गोलकनाथ वाद में प्रस्तावना को संविधान का अंग नहीं माना गया था।
कथन 3 सही है: प्रस्तावना न तो देश की विधायिका को कोई शक्ति प्रदान करती है और न ही उसकी शक्तियों पर कोई प्रतिबंध लगाती है। इसके अलावा, प्रस्तावना के प्रावधान गैर-न्यायोचित (Non-justiciable) हैं, अर्थात इन्हें न्यायालयों द्वारा कानूनी रूप से लागू नहीं कराया जा सकता है।
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भारतीय संविधान के अंतर्गत राज्य की कार्यपालिका, विशेष रूप से राज्यपाल की शक्तियों, मुख्यमंत्री की नियुक्ति और मंत्रिपरिषद के गठन के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 164 के अंतर्गत मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है और अन्य मंत्रियों की नियुक्ति राज्यपाल मुख्यमंत्री की सलाह पर करता है, तथा छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश और ओडिशा राज्यों में जनजातीय कल्याण मंत्री का भारसाधक एक पृथक मंत्री होना अनिवार्य किया गया है।
2. राज्यपाल को राज्य के उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति, स्थानांतरण तथा उनकी सेवा शर्तों को निर्धारित करने की पूर्ण एवं अंतिम कार्यकारी शक्ति प्राप्त है, और इस प्रक्रिया में राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति लेना राज्यपाल के लिए वैकल्पिक होता है।
3. अनुच्छेद 163 के अनुसार राज्यपाल को अपनी कृत्यों के निर्वहन में सहायता और सलाह देने के लिए एक मंत्रिपरिषद होगी जिसका प्रधान मुख्यमंत्री होगा, किंतु यदि कोई प्रश्न यह उठता है कि कोई विषय राज्यपाल के विवेकानुसार है या नहीं, तो राज्यपाल का इस पर किया गया निर्णय अंतिम होगा और उसकी वैधता को किसी भी न्यायालय में इस आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती है कि उसे अपना विवेक का प्रयोग करना चाहिए था या नहीं।
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1. संविधान के अनुच्छेद 263 के तहत राष्ट्रपति को यह शक्ति प्राप्त है कि वह एक अंतर-राज्यीय परिषद् की स्थापना कर सकता है, जिसका मुख्य कार्य राज्यों के बीच उत्पन्न विवादों की जाँच करना, उन विषयों पर सलाह देना जिनमें राज्यों का समान हित हो, तथा बेहतर नीति समन्वय हेतु संस्तुति करना है, और यह परिषद् एक स्थायी संवैधानिक निकाय है।
2. सरकारी आयोग (Sarkaria Commission, 1983-88) की सिफारिशों के आधार पर वर्ष 1990 में राष्ट्रपति के आदेश द्वारा अंतर-राज्यीय परिषद् की स्थापना की गई थी, जिसके अध्यक्ष भारत के प्रधानमंत्री होते हैं तथा सभी राज्यों के मुख्यमंत्री और विधानमंडल वाले केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्यमंत्री इसके सदस्य होते हैं।
3. अनुच्छेद 258 के अंतर्गत राष्ट्रपति, किसी राज्य की सरकार की सहमति से, उस सरकार को या उसके अधिकारियों को ऐसे कृत्यों को सौंप सकता है जो संघ की कार्यकारी शक्ति के अंतर्गत आते हैं, किंतु ऐसा करने के लिए संबंधित राज्य के विधानमंडल से विशेष बहुमत द्वारा अनुमोदन प्राप्त करना अनिवार्य होता है।
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