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History of India
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अकबर ने "इलाही संवत" (कैलेंडर) की शुरुआत किस वर्ष की थी?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
1583 ई. में इलाही संवत की शुरुआत हुई।
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महात्मा गांधी के भारत आगमन के पश्चात उनके शुरुआती सत्याग्रह आंदोलनों और उनसे जुड़ी प्रमुख घटनाओं के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. चंपारण सत्याग्रह (1917) के दौरान राजकुमार शुक्ल के आम्रण पर गांधीजी ने चंपारण का दौरा किया और यूरोपीय बागान मालिकों द्वारा किसानों पर जबरन थोपी गई 'तीनकठिया पद्धति' के विरोध में सफलतापूर्वक नेतृत्व किया, जिसके बाद सरकार ने जाँच के लिए 'चंपारण अग्रैरियन कमेटी' का गठन किया।
2. वर्ष 1918 के खेड़ा सत्याग्रह में फसल खराब होने के बावजूद ब्रिटिश प्रशासन द्वारा लगान माफी से इनकार किए जाने पर गांधीजी ने किसानों को 'लगान न दो' (No-Tax Campaign) का स्पष्ट निर्देश दिया, जिसमें वल्लभभाई पटेल और इंदुलाल याग्निक ने प्रमुख सहयोग किया।
3. अहमदाबाद मिल मजदूर आंदोलन (1918) के दौरान गांधीजी ने पहली बार भारत में किसी भूख हड़ताल का प्रयोग 'प्लैग बोनस' को लेकर मिल मालिकों के खिलाफ किया था, जिसके परिणामस्वरूप मजदूरों को 35 प्रतिशत वेतन वृद्धि प्राप्त हुई।
4. असहयोग आंदोलन (1920-22) के दौरान चौरी-चौरा की हिंसक घटना से आहत होकर गांधीजी ने फरवरी 1922 में बारडोली प्रस्ताव के माध्यम से आंदोलन को अचानक स्थगित कर दिया, जिससे क्षुब्ध होकर सुभाष चंद्र बोस ने इस निर्णय को 'राष्ट्रीय आपदा' करार दिया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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1857 के महान विद्रोह के राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक कारणों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राजनीतिक कारणों के अंतर्गत लॉर्ड डलहौजी की 'व्यपगत सिद्धांत' (Doctrine of Lapse) नीति ने सतारा, नागपुर और झाँसी जैसी रियासत्यों के साथ-साथ अवध के अधिग्रहण को भी प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित किया, क्योंकि अवध का विलय कुशासन के आरोप में किया गया था जिससे वहाँ के सैनिकों और पारंपरिक अभिजात वर्ग में गहरा असंतोष फैल गया।
2. सामाजिक और धार्मिक कारणों में वर्ष 1850 में पारित 'धार्मिक अशक्तता अधिनियम' (Religious Disabilities Act) ने ईसाई धर्म अपनाने वाले व्यक्ति को पैतृक संपत्ति से वंचित करने के पुराने हिंदू कानून को बदल दिया, जिससे रूढ़िवादी भारतीयों में यह आशंका उत्पन्न हो गई कि ब्रिटिश सरकार जानबूझकर उनका धर्म परिवर्तन कराना चाहती है।
3. आर्थिक कारणों के तहत ब्रिटिश भू-राजस्व नीतियों और उद्योगों के वि-औद्योगीकरण (De-industrialisation) ने पारंपरिक हस्तशिल्प और हथकरघा उद्योगों को पूरी तरह तबाह कर दिया, तथा किसानों पर अत्यधिक करों के बोझ ने उन्हें महाजनों के शिकंजे में फँसा दिया, जिससे समाज का हर वर्ग त्रस्त था।
4. सैन्य कारणों में वर्ष 1856 में लॉर्ड कैनिंग द्वारा पारित 'सामान्य सेवा enlistment अधिनियम' (General Service Enlistment Act) ने भारतीय सिपाहियों के लिए समुद्र पार (काला पानी) जाकर सेवा करना अनिवार्य कर दिया, जिसे तत्कालीन पारंपरिक समाज में जाति और धर्मभ्रष्ट होने का प्रतीक माना गया।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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19वीं शताब्दी के सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों के संदर्भ में, ब्रह्म समाज, आर्य समाज और सत्यशोधक समाज की स्थापना, उनके वैचारिक सिद्धांतों तथा सामाजिक सुधार एजेंडे के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राजा राममोहन राय द्वारा 1828 में स्थापित 'ब्रह्म समाज' ने मूर्तिपूजा, बहुदेववाद, पुरोहितवाद और सती प्रथा जैसी कुप्रथाओं का कड़ा विरोध करते हुए एकेश्वरवाद और उपनिषदों के तार्किक दर्शन पर बल दिया, किंतु यह संगठन वेदों की अचूकता या infallibility में विश्वास नहीं रखता था।
2. स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा 1875 में स्थापित 'आर्य समाज' ने 'वेदों की ओर लौटो' (Back to the Vedas) का नारा दिया और वेदों को अपौरुषेय तथा ज्ञान का एकमात्र स्रोत मानते हुए मूर्तिपूजा, अवतारवाद, बाल विवाह और जाति व्यवस्था की जन्मगत कठोरताओं को खारिज किया, साथ ही शुद्धि आंदोलन के माध्यम से धर्मांतरित हिंदुओं की वापसी का मार्ग प्रशस्त किया।
3. ज्योतिराव फुले द्वारा 1873 में स्थापित 'सत्यशोधक समाज' ने ब्राह्मणवादी वर्चस्व, धार्मिक पाखंड और सामाजिक असमानता को चुनौती दी, तथा शूद्रों एवं अति-शूद्रों (दलितों) के अधिकारों के लिए संघर्ष करते हुए पारंपरिक धार्मिक कर्मकांडों के बिना विवाह संस्कारों (सत्यशोधक विवाह) का संचालन किया।
4. प्रार्थना समाज (जो केशव चंद्र सेन की प्रेरणा से बंबई में स्थापित हुआ था) और ब्रह्म समाज दोनों ने ही रूढ़िवादी हिंदू समाज के पुनरुत्थान और वेदों के पूर्ण अधिकार को स्वीकार करते हुए पश्चिमी आधुनिक शिक्षा और ईसाई मिशनरियों की गतिविधियों का पूर्ण रूप से बहिष्कार किया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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फिरोज शाह तुगलक के समय "इक्ता" प्रणाली की क्या स्थिति थी?
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मुगलकालीन प्रशासनिक व्यवस्था और मनसबदारी प्रथा के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. अकबर द्वारा प्रशासनिक दक्षता बढ़ाने के लिए शुरू की गई मनसबदारी व्यवस्था में 'जात' और 'सवार' श्रेणियों का निर्धारण किया जाता था, जहाँ 'जात' पदधिकारी के व्यक्तिगत स्तर (पर्सनल रैंक) और वेतन को इंगित करती थी, जबकि 'सवार' उसके द्वारा रखे जाने वाले घोड़ों और घुड़सवार सैनिकों की संख्या को दर्शाती थी।
2. जहांगीर के शासनकाल में मनसबदारी प्रथा के अंतर्गत 'दु-अस्मेह सिंह-अस्मेह' (Do-aspa Sih-aspa) प्रणाली की शुरुआत की गई, जिसके तहत कुछ चुनिंदा मनसबदारों को बिना 'जात' रैंक बढ़ाए ही अपने 'सवार' रैंक की संख्या को दोगुना करने की अनुमति मिल जाती थी।
3. शाहजहां के शासनकाल में आते-आते वित्तीय संकट (जागीर संकट) से निपटने के लिए 'माहवार' (Month-scale) वेतन प्रणाली लागू की गई, जिसके अंतर्गत मनसबदारों को उनकी जागीर से मिलने वाली वार्षिक आय को महीनों के अनुपात में विभाजित कर दिया गया था, क्योंकि साम्राज्य में उपलब्ध खाली जागीरें (पाइबाइयों) की तुलना में मनसबदारों की संख्या बहुत अधिक हो गई थी।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
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