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Indian Polity
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भारतीय संसद की विधाई प्रक्रिया और सदनों की शक्तियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. संविधान के अनुच्छेद 109 के अनुसार धन विधेयक (Money Bill) केवल लोकसभा में ही प्रस्तुत किया जा सकता है, राज्यसभा में नहीं; और यदि राज्यसभा किसी धन विधेयक को बिना किसी संशोधन के लौटा देती है या चौदह दिन की समयावधि बीत जाती है, तो वह विधेयक संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित मान लिया जाता है, भले ही राज्यसभा ने उस पर औपचारिक मतदान न किया हो।
  2. 2. संविधान के अनुच्छेद 108 के अंतर्गत राष्ट्रपति संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक (Joint Sitting) केवल साधारण विधेयकों और वित्तीय विधेयकों (श्रेणी-I) के मामलों में ही आहत कर सकता है, जबकि संविधान संशोधन विधेयकों तथा धन विधेयकों के संदर्भ में संयुक्त बैठक बुलाने का कोई प्रावधान नहीं है।
  3. 3. लोकसभा द्वारा पारित और राज्यसभा को प्रेषित किसी साधारण विधेयक के संबंध में यदि दोनों सदनों के बीच गतिरोध उत्पन्न होता है और राष्ट्रपति संयुक्त बैठक बुलाने की मंशा की सूचना दे देता है, तो राज्यसभा द्वारा विधेयक को छह महीने तक रोक लेने की स्थिति में ही संयुक्त बैठक आहूत की जा सकती है, भले ही इस अवधि के दौरान लोकसभा विघटित हो गई हो।
  4. 4. संसद में विधाई प्रक्रिया के दौरान यदि कोई विधेयक लोकसभा में लंबित है और लोकसभा के विघटन के कारण वह व्यपगत (Lapse) हो जाता है, किंतु राष्ट्रपति ने उसके संबंध में संयुक्त बैठक बुलाने की अपनी मंशा अधिसूचित कर दी है, तो ऐसा विधेयक व्यपगत नहीं होगा और वह संयुक्त बैठक में विचार के लिए जीवित बना रहेगा।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 सही है क्योंकि संविधान के अनुच्छेद 109 के अनुसार धन विधेयक केवल लोकसभा में ही पेश हो सकता है और राज्यसभा इसे अधिकतम 14 दिन तक रोक सकती है। यदि इस अवधि में राज्यसभा इसे वापस नहीं करती, तो दोनों सदनों द्वारा पारित मान लिया जाता है। कथन 2 सही है क्योंकि अनुच्छेद 108 के तहत संयुक्त बैठक केवल साधारण और वित्तीय विधेयकों के लिए बुलाई जा सकती है, संविधान संशोधन और धन विधेयकों के लिए नहीं। कथन 3 गलत है क्योंकि यदि लोकसभा विघटित हो जाती है, तो दोनों सदनों के बीच गतिरोध समाप्त हो जाता है और संयुक्त बैठक का प्रावधान व्यपगत हो जाता है। कथन 4 गलत है क्योंकि लोकसभा के विघटन से लोकसभा में लंबित विधेयक व्यपगत हो जाते हैं, और संयुक्त बैठक की अधिसूचना के बावजूद वे समाप्त हो जाते हैं। अधिक जानकारी के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पोर्टल पर विजिट करें।
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संविधान का कौन सा भाग निर्वाचन से संबंधित है? भारतीय संविधान के अंतर्गत उपराष्ट्रपति की शक्तियों, प्रधानमंत्री की स्थिति तथा मंत्रिपरिषद और उनके सामूहिक उत्तरदायित्व के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 63 के अनुसार भारत का एक उपराष्ट्रपति होगा, और अनुच्छेद 64 के तहत वह राज्यसभा का पदेन सभापति (Ex-officio Chairman) होगा तथा राष्ट्रपति के पद पर आकस्मिक रिक्ति के दौरान वह राष्ट्रपति के रूप में कार्य करते समय राज्यसभा के सभापति के रूप में किसी भी कर्तव्य का पालन नहीं करेगा और न ही उसे राज्यसभा के सभापति के वेतन या भत्ते प्राप्त होंगे। 2. अनुच्छेद 75(1) के अंतर्गत प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है और अन्य मंत्रियों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा प्रधानमंत्री की सलाह पर की जाती है, किंतु संविधान में यह स्पष्ट रूप से उपबंधित किया गया है कि प्रधानमंत्री या किसी भी अन्य मंत्री के लिए यह अनिवार्य है कि वह नियुक्ति के समय संसद के किसी भी सदन का सदस्य अवश्य होना चाहिए, अन्यथा छह माह के भीतर उसकी सदस्यता समाप्त हो जाएगी। 3. अनुच्छेद 75(3) के अनुसार केंद्रीय मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होती है, जिसका विधिक और संवैधानिक अर्थ यह है कि लोकसभा में मंत्रिपरिषद के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पारित होने पर संपूर्ण मंत्रिपरिषद को त्यागपत्र देना पड़ता है, और यदि प्रधानमंत्री अपने पद से त्यागपत्र दे देता है या उसकी मृत्यु हो जाती है, तो मंत्रिपरिषद स्वतः विघटित हो जाती है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? भारतीय संविधान के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) के अभिलेख न्यायालय (Court of Record) होने की स्थिति, अवमानना (Contempt of Court) की शक्ति और न्यायिक सक्रियता के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 129 के अनुसार उच्चतम न्यायालय एक अभिलेख न्यायालय होगा और उसको अपने अवमानना के लिए दंड देने की शक्ति सहित ऐसी न्यायालय की सभी शक्तियां होंगी, जिसके तहत न्यायालय को न केवल अपनी अवमानना के लिए बल्कि अधीनस्थ न्यायालयों की अवमानना के लिए भी दंडित करने की पूर्ण संवैधानिक शक्ति प्राप्त है। 2. 'न्यायिक अवमानना अधिनियम, 1971' के अंतर्गत दी गई परिभाषा के अनुसार, 'सिविल अवमानना' (Civil Contempt) का तात्पर्य उच्चतम न्यायालय के किसी निर्णय, डिक्री, आदेश, रिट या अन्य आदेश की wilfully (जानबूझकर) अवज्ञा करना है, जबकि 'आपराधिक अवमानना' (Criminal Contempt) के अंतर्गत ऐसा प्रकाशन या कृत्य शामिल है जो न्यायालय की गरिमा को कम करता है या न्याय के प्रशासन में हस्तक्षेप करता है। 3. संविधान के अनुच्छेद 142 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय को अपनी अधिकारिता का प्रयोग करते हुए ऐसा डिक्री या आदेश पारित करने की पूर्ण शक्ति प्राप्त है जो उसके समक्ष लंबित किसी वाद या विषय में पूर्ण न्याय (Complete Justice) करने के लिए आवश्यक हो, और संसद द्वारा बनाई गई किसी विधि के उपबंधों के अधीन रहते हुए ही ऐसा आदेश पूरे भारत में प्रवर्तनीय होता है। 4. उच्चतम न्यायालय ने 'प्रशांत भूषण अवमानना मामले (2020)' और अन्य ऐतिहासिक निर्णयों में यह प्रतिपादित किया है कि न्यायालय के अधिकार क्षेत्र और निष्पक्षता पर रचनात्मक, निष्पक्ष और सद्भावनापूर्ण आलोचना (Fair Criticism) करने वाले तार्किक बयानों को भी आपराधिक अवमानना के दायरे में माना जाएगा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 19(1)(a)) इसे पूर्ण संरक्षण प्रदान करती है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? भारतीय संविधान के संघ एवं उसके राज्य क्षेत्र (अनुच्छेद 1-4) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 2 के अंतर्गत संसद को यह शक्ति प्राप्त है कि वह संघ में नए राज्यों का प्रवेश या उनकी स्थापना ऐसे निबंधनों और शर्तों पर कर सके जो वह ठीक समझे, जबकि अनुच्छेद 3 के अंतर्गत संसद किसी राज्य के क्षेत्र को बढ़ा सकती है, उसके नाम में परिवर्तन कर सकती है या किसी राज्य के राज्यक्षेत्र को किसी अन्य राज्य के साथ मिलाकर नया राज्य बना सकती है। 2. अनुच्छेद 3 के तहत नए राज्यों के निर्माण या वर्तमान राज्यों के क्षेत्रों, सीमाओं या नामों में परिवर्तन से संबंधित कोई भी विधेयक राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश के बिना संसद के किसी भी सदन में पुनः स्थापित नहीं किया जा सकता, तथा राष्ट्रपति इस विधेयक को संबंधित राज्य के विधानमंडल के पास उसके विचार भेजने के लिए बाध्य होता है और राज्य विधानमंडल द्वारा व्यक्त किया गया विचार संसद के लिए पूर्णतः बाध्यकारी होता है। 3. अनुच्छेद 4 यह स्पष्ट रूप से प्रावधान करता है कि अनुच्छेद 2 और अनुच्छेद 3 के अधीन बनाए गए नए राज्यों के प्रवेश, स्थापना या पुनर्गठन से संबंधित विधियों को संविधान के अनुच्छेद 368 के प्रयोजन के लिए 'संविधान संशोधन' नहीं माना जाएगा, जिसका अर्थ है कि इन्हें साधारण बहुमत द्वारा पारित किया जा सकता है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? भारतीय संविधान के भाग-IV के अंतर्गत वर्णित राज्य के नीति निर्देशक तत्वों (DPSP) और उनके न्यायिक प्रवर्तन, दार्शनिक आधार तथा संविधान संशोधनों द्वारा जोड़े गए नए प्रावधानों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 37 में यह स्पष्ट रूप से उपबंधित है कि नीति निर्देशक तत्व देश के शासन में मूलभूत हैं और विधि बनाने में इन तत्वों को लागू करना राज्य का कर्तव्य होगा, किंतु ये किसी भी न्यायालय द्वारा न्यायसंगत (Justiciable) नहीं हैं, जिसका अर्थ है कि इनके उल्लंघन या क्रियान्वयन न होने पर किसी भी नागरिक द्वारा न्यायालय की शरण नहीं ली जा सकती है। 2. 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा नीति निर्देशक तत्वों में महत्वपूर्ण संशोधन करते हुए अनुच्छेद 39A (समान न्याय और निःशुल्क विधिक सहायता), अनुच्छेद 43A (उद्योगों के प्रबंधन में श्रमिकों की भागीदारी), और अनुच्छेद 48A (पर्यावरण का संरक्षण और संवर्धन तथा वन एवं वन्यजीवों की रक्षा) को जोड़ा गया था, जबकि 44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 द्वारा अनुच्छेद 38 में यह निर्देश जोड़ा गया कि राज्य आय, प्रतिष्ठा, सुविधाओं और अवसरों की असमानताओं को कम करेगा। 3. सर्वोच्च न्यायालय ने अपने ऐतिहासिक निर्णयों (विशेषकर 'केशवानंद भारती वाद' और 'मिनर्वा मिल्स वाद') में यह प्रतिपादित किया है कि यदि संसद अनुच्छेद 39(b) तथा 39(c) में वर्णित सामाजिक-आर्थिक लक्ष्यों (संसाधनों का न्यायसंगत वितरण) को प्रभावी बनाने के लिए कोई कानून बनाती है और वह कानून अनुच्छेद 14 या अनुच्छेद 19 के मूल अधिकारों का अतिक्रमण करता है, तो ऐसा कानून अनुच्छेद 31C के संरक्षण के कारण असंवैधानिक घोषित नहीं किया जा सकता है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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